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Wednesday, September 4, 2024

मसूद अख्तर

#05sep #05march 
मसूद अख्तर
🎂05 सितम्बर 1940
साहीवाल , पंजाब , ब्रिटिश राज
⚰️05 मार्च 2022
 (आयु 82)
लाहौर , पंजाब, पाकिस्तान
पेशा
अभिनेता
सक्रिय वर्ष
1960 – 2022
पुरस्कार
2006 में पाकिस्तान के राष्ट्रपति द्वारा प्राइड ऑफ परफॉरमेंस अवार्ड
एक पाकिस्तानी फिल्म और टेलीविजन अभिनेता थे जिन्हें उद्योग के बहुमुखी अभिनेताओं में से एक माना जाता था।
मसूद अख्तर का जन्म 5 सितंबर 1940 को साहीवाल में हुआ था।  स्थानीय स्कूल से अपनी प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद, उन्होंने मिलिट्री कॉलेज मुर्री में प्रवेश लिया । बाद में, उन्होंने एमएओ कॉलेज लाहौर में दाखिला लिया । स्नातक होने के बाद, उन्होंने एक बैंक में काम करना शुरू कर दिया, जबकि उन्होंने कानून में स्नातक की डिग्री हासिल करने के लिए अपनी पढ़ाई जारी रखी ।
अख्तर ने अपने अभिनय करियर की शुरुआत 1960 के दशक में थिएटर से की और जल्द ही मंच पर लोकप्रिय कलाकारों में से एक बन गए।  1968 में, निर्देशक और निर्माता शबाब किरनवी ने उन्हें फिल्म उद्योग में पेश किया। उन्होंने लगभग 135 फिल्मों में काम किया - 78 उर्दू , 51 पंजाबी , तीन डबल संस्करण और दो पश्तो ।  अख्तर अलहमरा आर्ट्स काउंसिल में स्टेज ड्रामा शुरू करने के अग्रदूत हैं । उनके शुरुआती नाटकों में से एक, पैसा बोलता है (अनुवाद: मनी स्पीक्स), जिसे 1970 के दशक में अलहमरा में मंचित किया गया था, ने उन्हें बहुत लोकप्रियता दिलाई।
अख्तर के लिए प्राइड ऑफ परफॉरमेंस अवार्ड की घोषणा पाकिस्तान सरकार द्वारा 14 अगस्त 2005 को की गई थी और फिर यह पुरस्कार वास्तव में 23 मार्च 2006 को प्रदान किया गया।
मसूद अख्तर का 5 मार्च 2022 को 82 वर्ष की आयु में लाहौर में फेफड़ों के कैंसर से निधन हो गया। अपनी मृत्यु से दो महीने पहले वे अस्पताल में भर्ती थे। उन्हें गुलशन-ए-रवि डी ब्लॉक कब्रिस्तान में दफनाया गया । जीवित बचे लोगों में उनकी विधवा और दो बेटियाँ थीं। उनके 26 वर्षीय बेटे अली रजा की सितंबर 2021 में दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गई थी।
🎥
संगदिल (1968) 
मेरा नाम है मोहब्बत (1975) 
शबाना (1976)
वादों की जंजीर (1979)
छोटे नवाब (1980)
अमानत (1981) 
ये आदम - नासिर (1986)
इंसानियत के दुश्मन (1990)
बारा मियां के रूप में वतन के रखवाले (1991)
मैडम रानी (1995)
मूसा खान (2001)

Saturday, August 31, 2024

डॉ राही मासूम रज़ा

#01sep #15march 
राही मासूम रज़ा 
🎂01सितंबर 1925
⚰️15 मार्च 1992
बच्चे: नदीम खान
पेशा
उपन्यासकार, उर्दू कवि
सक्रिय वर्ष
1945–1992
उल्लेखनीय पुरस्कार
1979 फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ संवाद पुरस्कार : मैं तुलसी तेरे आँगन की
रिश्तेदार
पार्वती खान (बहू)
उनका जन्म गाजीपुर जिले के गंगौली गांव में हुआ था और प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा गंगा किनारे गाजीपुर शहर के एक मुहल्ले में हुई थी। बचपन में पैर में पोलियो हो जाने के कारण उनकी पढ़ाई कुछ सालों के लिए छूट गयी, लेकिन इंटरमीडियट करने के बाद वह अलीगढ़ आ गये और यहीं से एमए करने के बाद उर्दू में `तिलिस्म-ए-होशरुबा' पर पीएच.डी. की। पीएच.डी. करने के बाद राही अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़ के उर्दू विभाग में प्राध्यापक हो गये और अलीगढ़ के ही एक मुहल्ले बदरबाग में रहने लगे। अलीगढ़ में रहते हुए ही राही ने अपने भीतर साम्यवादी दृष्टिकोण का विकास कर लिया था और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के वे सदस्य भी हो गए थे। अपने व्यक्तित्व के इस निर्माण-काल में वे बड़े ही उत्साह से साम्यवादी सिद्धान्तों के द्वारा समाज के पिछड़ेपन को दूर करना चाहते थे और इसके लिए वे सक्रिय प्रयत्न भी करते रहे थे।

राही मासूम रज़ा
राष्ट्रीयता भारतीय
1968से राही बम्बई में रहने लगे थे। वे अपनी साहित्यिक गतिविधियों के साथ-साथ फिल्मों के लिए भी लिखते थे जो उनकी जीविका का प्रश्न बन गया था। राही स्पष्टतावादी व्यक्ति थे और अपने धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय दृष्टिकोण के कारण अत्यन्त लोकप्रिय हो गए थे। यहीं रहते हुए राही ने आधा गांव, दिल एक सादा कागज, ओस की बूंद, हिम्मत जौनपुरी उपन्यास व 1965के भारत-पाक युद्ध में शहीद हुए वीर अब्दुल हमीद की जीवनी छोटे आदमी की बड़ी कहानी लिखी। उनकी ये सभी कृतियाँ हिंदी में थीं। इससे पहले वह उर्दू में एक महाकाव्य 1857 जो बाद में हिन्दी में क्रांति कथा नाम से प्रकाशित हुआ तथा छोटी-बड़ी उर्दू नज़्में व गजलें लिखे चुके थे। आधा गाँव, नीम का पेड़, कटरा बी आर्ज़ू, टोपी शुक्ला, ओस की बूंद और सीन 75 उनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं।पिछले कुछ वर्षों प्रसिद्धि में रहीं हिन्दी पॉप गायिका पार्वती खान का विवाह इनके पुत्र नदीम खान, हिन्दी फिल्म निर्देशक एवं सिनेमैटोग्राफर से हुआ था।

उन्होंने एक टीवी धारावाहिक महाभारत की पटकथा और संवाद लिखे।टीवी धारावाहिक महाकाव्य महाभारत पर आधारित था। धारावाहिक भारत के सबसे लोकप्रिय टीवी धारावाहिकों में से एक बन गया, जिसमें लगभग 86% की चोटी की टेलीविजन रेटिंग थी।

उनकी कृतियों में शामिल हैं:

उपन्यास
आधा गाँव ( विभाजित गाँव ) 
दिल एक सादा कागज़
टोपी शुक्ला 
ओस की बूंद
कटरा बी आरज़ू 
दृश्य क्रमांक 75
कविता
मौज-ए-ग़ुल मौज-ए-सबा (उर्दू) 
अजनबी शहर: अजनबी रास्ते (उर्दू) 
मैं एक फेरीवाला (हिन्दी) 
शीशे के मकान वाले (हिन्दी)
आत्मकथा
छोटे आदमी की बड़ी कहानी ("एक छोटे आदमी की बड़ी कहानी") 
फिल्म और टीवी स्क्रिप्ट
नीम का पेड़ – इसी नाम का उपन्यास और टीवी धारावाहिक 
किसी से ना कहना
मैं तुलसी तेरे आँगन की
डिस्को डांसर (1982)
महाभारत (1988)
फिल्म संवाद
अलाप (1977)
गोलमाल (1979)
कर्ज (1980)
जुदाई (1980)
हम पाँच (1980)
अनोखा रिश्ता (1986)
बात बन जाए (1986)
नाचे मयूरी (1986)
आवाम (1987)
लम्हे (1991)
परम्परा (1992)
आइना (1993)
फ़िल्म के बोल
अलाप (1977)
देस में निकला होगा चाँद ( जगजीत सिंह और चित्रा सिंह ) 

Thursday, August 29, 2024

चित्रांगदा सिंह

#28march 
चित्रंगदा सिंह
28 मार्च 1976
जोधपुर, राजस्थान, भारत
राष्ट्रीयता
भारतीय
पेशा
अभिनेत्री
कार्यकाल
2003 – अबतक
जीवनसाथी
ज्योति रंधावा (वि॰ 2001 – 2014 तलाक; एक बच्चा)
माता-पिता
कर्नल निरंजन सिंह चहल (पिता)
हिन्दी फ़िल्मों की एक अभिनेत्री हैं। वह2005 में बनी फ़िल्म हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी में गीता राव की भूमिका अदा करने के लिए जानी जाती है।उनकी शादी भारतीय गोल्फ़ खिलाडी ज्योति रंधावा से हो चुकी है।
चित्रांगदा चहल का जन्म राजस्थान के जोधपुर में हुआ था। उनके पिता कर्नल निरंजन सिंह चहल एक भारतीय सेना अधिकारी हैं। उसका भाई दिग्विजय सिंह चहल एक गोल्फ़र हैं। सोफिया गर्ल्स स्कूल में मेरठ में स्कूली शिक्षा के बाद, उन्होंने लेडी इरविन कॉलेज, नई दिल्ली से गृह विज्ञान (भोजन और पोषण) में स्नातक की पढ़ाई पूरी की।उन्होंने कथक में औपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त किया है।
🎥
2003 हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी 
2005 कल: यैस्टर्डे एंड टुमॉरो 
2008 सौरी भाई !
2010 बसरा 
2011 ये साली जिन्दगी 
2011 देसी बॉयज 
2012 जोकर
2013 इनकार 
2013 आय, मी और मैं

Monday, August 26, 2024

रघुपति सहाय गोरखपुरी

#28aug #03march 

रघुपति सहाय 'फ़िराक़ गोरखपुरी'
जन्म 28 अगस्त, 1896
जन्म भूमि गोरखपुर, उत्तर प्रदेश
मृत्यु 3 मार्च, 1982
मृत्यु स्थान दिल्ली
अभिभावक पिता- मुंशी गोरख प्रसाद
पति/पत्नी किशोरी देवी
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र साहित्य
मुख्य रचनाएँ गुल-ए-नगमा, गुले-ए-रअना, रूहे-कायनात, मशअल, रूप (रुबाई), शबिस्तान, सरगम, बज़्म-ए-ज़िंदगी रंग-ए-शायरी, परछाइयाँ, तरान-ए-इश्क़ आदि।
भाषा उर्दू, फ़ारसी, हिंदी, ब्रजभाषा
विद्यालय इलाहाबाद विश्वविद्यालय
शिक्षा एम. ए. (अंग्रेज़ी साहित्य)
पुरस्कार-उपाधि साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार, पद्म भूषण
प्रसिद्धि उर्दू शायर, शिक्षक
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी गांधी जी के साथ असहयोग आन्दोलन में सम्मिलित हुए और जेल भी गये। कुछ दिनों आनन्द भवन, इलाहाबाद में पंडित नेहरू के सहायक के रूप में कांग्रेस का कामकाज भी देखा।
फिराक' उनका तख़ल्लुस था। उन्हें उर्दू कविता को बोलियों से जोड़ कर उसमें नई लोच और रंगत पैदा करने का श्रेय दिया जाता है। फ़िराक़ गोरखपुरी ने अपने साहित्यिक जीवन का आरंभ ग़ज़ल से किया था। फ़ारसी, हिन्दी, ब्रजभाषा और भारतीय संस्कृति की गहरी समझ होने के कारण उनकी शायरी में भारत की मूल पहचान रच-बस गई है। उन्हें 'साहित्य अकादमी पुरस्कार', 'ज्ञानपीठ पुरस्कार' और 'सोवियत लैण्ड नेहरू अवार्ड' से भी सम्मानित किया गया था। वर्ष 1970 में उन्हें 'साहित्य अकादमी' का सदस्य भी मनोनीत किया गया था।

जन्म तथा शिक्षा
उर्दू के मशहूर शायर फ़िराक़ गोरखपुरी का जन्म 28 अगस्त, वर्ष 1896 ई. में गोरखपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ था। फ़िराक़ का पूरा नाम 'रघुपति सहाय फ़िराक़' था, किंतु अपनी शायरी में वे अपना उपनाम 'फ़िराक़' लिखते थे। उनके पिता का नाम मुंशी गोरख प्रसाद था, जो पेशे से वकील थे। मुंशी गोरख प्रसाद भले ही वकील थे, किंतु शायरी में भी उनका बहुत नाम था। इस प्रकार यह कह सकते हैं कि शायरी फ़िराक़ साहब को विरासत में मिली थी। फ़िराक़ गोरखपुरी ने 'इलाहाबाद विश्वविद्यालय' में शिक्षा प्राप्त की थी। उन्होंने बी. ए. में पूरे प्रदेश में चौथा स्थान प्राप्त किया था। इसके बाद वे डिप्टी कलेक्टर के पद पर नियुक्त हुए।

विवाह
फ़िराक़ जी का विवाह 29 जून, 1914 को प्रसिद्ध ज़मींदार विन्देश्वरी प्रसाद की बेटी किशोरी देवी से हुआ। वो भी तब जब पत्नी के साथ एक छत के नीचे रहते हुए भी उनकी व्यक्तिगत ज़िंदगी एकाकी ही बीती। युवावस्था में हुआ उनका विवाह उनके लिए जीवन की सबसे कष्टप्रद घटना थी।

सुनते हैं इश्क़ नाम के गुजरे हैं इक बुजुर्ग
हम लोग भी मुरीद इसी सिलसिले के हैं

व्यक्तित्व
फ़िराक़ जी का विवाह 29 जून, 1914 को प्रसिद्ध ज़मींदार विन्देश्वरी प्रसाद की बेटी किशोरी देवी से हुआ। वो भी तब जब पत्नी के साथ एक छत के नीचे रहते हुए भी उनकी व्यक्तिगत ज़िंदगी एकाकी ही बीती। युवावस्था में हुआ उनका विवाह उनके लिए जीवन की सबसे कष्टप्रद घटना थी।

सुनते हैं इश्क़ नाम के गुजरे हैं इक बुजुर्ग
हम लोग भी मुरीद इसी सिलसिले के हैं

व्यक्तित्व
फ़िराक़ का व्यक्तित्व बहुत जटिल था। 'तद्भव' के सातवें अंक में फ़िराक गोरखपुरी पर 'विश्वनाथ त्रिपाठी' ने बहुत विस्तार से संस्मरण लिखा है। फिराक साहब मिलनसार थे, हाजिरजवाब थे और विटी थे। अपने बारे में तमाम उल्टी-सीधी बातें खुद करते थे। उनके यहाँ उनके द्वारा ही प्रचारित चुटकुले आत्मविज्ञापन प्रमुख हो गये । अपने दु:ख को बढ़ा-चढ़ाकर बताते थे। स्वाभिमानी हमेशा रहे। पहनावे में अजीब लापरवाही झलकती थी- 'टोपी से बाहर झाँकते हुये बिखरे बाल, शेरवानी के खुले बटन,ढीला-ढाला(और कभी-कभी बेहद गंदा और मुसा हुआ) पैजामा, लटकता हुआ इजारबंद, एक हाथ में सिगरेट और दूसरे में घड़ी, गहरी-गहरी और गोल-गोल- डस लेने वाली-सी आँखों में उनके व्यक्तित्व का फक्कड़पन खूब जाहिर होता था।'
लेकिन बीसवीं सदी के इस महान् शायर की गहन गंभीरता और विद्वता का अंदाज़उनकी शायरी से ही पता चलता है। जब वे लिखते हैं :-
जाओ न तुम हमारी इस बेखबरी पर कि हमारे
हर ख्‍़वाब से इक अह्‌द की बुनियाद पड़ी है।
फिराक साहब की कविता में सौन्दर्य के बड़े कोमल और अछूते अनुभव व्यक्त हुये हैं। एक शेर है:-
किसी का यूँ तो हुआ कौन उम्र भर फिर भी
ये हुस्नों इश्क धोखा है सब मगर फिर भी।
1962 की चीन की लड़ाई के समय फिराक साहब की यह गजल बहुत मशहूर हुई:-
सुखन की शम्मां जलाओ बहुत उदास है रात
नवाए मीर सुनाओ बहुत उदास है रात
कोई कहे ये खयालों और ख्वाबों से
दिलों से दूर न जाओ बहुत उदास है रात
पड़े हो धुंधली फिजाओं में मुंह लपेटे हुये

सितारों सामने आओ बहुत उदास है रात।
शायद अपने जीवन के आखिरी दिनों में फिराक साहब ने लिखा:-
अब तुमसे रुख़सत होता हूँ आओ सँभालो साजे़- गजल,
नये तराने छेडो़, मेरे नग्‍़मों को नींद आती है।
अपने बारे में अपने ख़ास अंदाज़में लिखते हुये फिराक साहब ने लिखा था:-
आने वाली नस्लें तुम पर रश्क करेंगी हमअस्रों
जब ये ख्याल आयेगा उनको, तुमने फ़िराक़ को देखा था

आन्दोलन में भागेदारी
इसी बीच देश की आज़ादी के लिए संघर्षरत राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने 'असहयोग आन्दोलन' छेड़ा तो फ़िराक़ गोरखपुरी ने अपनी नौकरी त्याग दी और आन्दोलन में कूद पड़े। उन्हें गिरफ्तार किया गया और डेढ़ साल की सज़ा भी हुई। जेल से छूटने के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 'अखिल भारतीय कांग्रेस' के दफ्तर में 'अण्डर सेक्रेटरी' की जगह पर उन्हें रखवा दिया। बाद में नेहरू जी के यूरोप चले जाने के बाद उन्होंने कांग्रेस का 'अण्डर सेक्रेटरी' का पद छोड़ दिया। इसके बाद 'इलाहाबाद विश्वविद्यालय' में वर्ष 1930 से लेकर 1959 तक अंग्रेज़ी के अध्यापक रहे।अंग्रेजो को अंग्रेजी सिखाते थे।

Friday, August 23, 2024

कल्याण जी आनंद जी 🎂02 मार्च

#24aug #30jun #02मार्च आनंद जी
कल्याणजी (संगीतकार)
कल्याणजी
पूरा नाम कल्याणजी वीरजी शाह
प्रसिद्ध नाम कल्याणजी
🎂जन्म 30 जून, 1928
जन्म भूमि कच्छ, गुजरात
⚰️मृत्यु 24 अगस्त, 2000
और उनके भाई आनंद वीर जी शाह(जन्म 02 मार्च 1933) अभी जीवित चल रहे है।
अभिभावक पिता- वीरजी शाह
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र भारतीय सिनेमा
मुख्य रचनाएँ 'उपकार', 'छलिया', 'हिमालय की गोद में', 'पूरब-पश्चिम', 'सट्टा बाज़ार', 'सच्चा झूठा' तथा 'जॉनी मेरा नाम' आदि।
पुरस्कार-उपाधि 1968 तथा 1974 में सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का 'राष्ट्रीय पुरस्कार' तथा 'फ़िल्म फेयर पुरस्कार', 'पद्मश्री' (1992)
प्रसिद्धि संगीतकार
नागरिकता भारतीय
संबंधित लेख कल्याणजी आनंदजी, हेमंत कुमार, सचिन देव बर्मन, मदन मोहन, नौशाद
अन्य जानकारी कल्याणजी ने हेमंत कुमार के सहायक के तौर पर फ़िल्मी दुनिया में कदम रखा था और वर्ष 1954 में आई फ़िल्म ‘नागिन’ के गीतों के कुछ छंद संगीतबद्ध किए थे।
कल्याणजी वीरजी शाह
जन्म- 30 जून, 1928, कच्छ, गुजरात; मृत्यु- 24 अगस्त, 2000) हिन्दी सिनेमा के प्रसिद्ध संगीतकार थे। वे भारतीय हिन्दी फ़िल्मों की प्रसिद्ध संगीतकार जोड़ी 'कल्याणजी आनंदजी' में से एक थे। कल्याणजी ने हेमंत कुमार के सहायक के तौर पर फ़िल्मी दुनिया में कदम रखा था और वर्ष 1954 में आई फ़िल्म ‘नागिन’ के गीतों के कुछ छंद संगीतबद्ध किए थे। भारतीय फ़िल्मों में इलेक्ट्रॉनिक संगीत की शुरुआत करने का श्रेय कल्याणजी को ही जाता है। वर्ष 1992 में संगीत के क्षेत्र में बहुमूल्य योगदान के लिए उन्हें भारत सरकार ने 'पद्मश्री' से सम्मानित किया था।

जन्म
कल्याणजी का जन्म 30 जून, सन 1928 ई. में गुजरात के कच्छ ज़िले में कुण्डरोडी नामक स्थान पर हुआ था। इनके पिता का नाम वीरजी शाह था। कल्याणजी बचपन से ही संगीतकार बनने का सपना देखा करते थे; हालांकि उन्होंने किसी उस्ताद से संगीत की शिक्षा नहीं ली थी। अपने इसी सपने को पूरा करने के लिये वे बाद में मुंबई आ गए थे।

संगीत की दुनिया से जुड़ाव
हिन्दी फ़िल्म जगत् की सफल संगीतकार जोड़ियों में से एक कल्याणजी आनंदजी अपनी किराने की दुकान पर नून तेल बेचते हुए ही जिंदगी गुजार देते, अगर एक तंगहाल ग्राहक ने उधारी चुकाने के बदले दोनों को संगीत की तालीम देने की पेशकश न की होती। वीरजी शाह का परिवार कच्छ से मुंबई आ गया था और आजीविका चलाने के लिए किराने की दुकान खोल ली। एक ग्राहक दुकान से सामान तो लेता था, लेकिन पैसे नहीं चुका पाता था।

वीरजी ने एक दिन जब उससे तकाजा किया तो उसने उधारी चुकाने के लिए वीरजी के दोनों बेटों कल्याणजी और आनंदजी को संगीत सिखाने का जिम्मा संभाला और इस तरह उधारी के पैसे से एक ऐसी संगीतकार जोड़ी की नींव पड़ी, जिसने अपने संगीत से हिन्दी फ़िल्म जगत् को हमेशा के लिए अपना कर्जदार बना लिया। हालाँकि उधारी के संगीत के उन गुरुजी को सुर और ताल की समझ कुछ खास नहीं थी, लेकिन उन्होंने वीरजी के पुत्रों कल्याणजी और आनंदजी में संगीत की बुनियादी समझ ज़रूर पैदा कर दी। इसके बाद संगीत में दोनों की रुचि बढ़ने लगी और दोनों भाई संगीत की दुनिया से जुड़ गए।

हेमंत कुमार के सहायक
कल्याणजी ने हेमंत कुमार के सहायक के तौर पर फ़िल्मी दुनिया में कदम रखा था और वर्ष 1954 में आई फ़िल्म ‘नागिन’ के गीतों के कुछ छंद संगीतबद्ध किए थे। भारतीय फ़िल्मों में इलेक्ट्रॉनिक संगीत की शुरुआत करने का श्रेय भी कल्याणजी को ही जाता है। कल्याणजी-आनंदजी की जोड़ी ने लगातार तीन दशकों 1960, 1970 और 1980 तक हिन्दी सिनेमा पर राज किया।

कल्याणजी ने कल्याणजी वीरजी के नाम से अपना ऑर्केस्ट्रा ग्रुप शुरू किया और मुंबई तथा उससे बाहर अपने संगीत शो आयोजित करने लगे। इसी दौरान वे फ़िल्म संगीतकारों के संपर्क में भी आए। इसके बाद दोनों भाई हिन्दी फ़िल्म जगत् के उस क्षेत्र में पहुँच गए, जहाँ सचिन देव बर्मन, मदन मोहन, हेमंत कुमार, नौशाद और रवि जैसे संगीतकारों के नाम की तूती बोलती थी। शुरू में कल्याणजी ने कल्याणजी वीरजी शाह के नाम से फ़िल्मों में संगीत देना शुरू किया और 'सम्राट चंद्रगुप्त' (1959) उनके संगीत से सजी पहली फ़िल्म थी। इसी साल आनंदजी भी उनके साथ जुड़ गए और कल्याणजी आनंदजी नाम से एक अमर संगीतकार जोड़ी बनी। कल्याणजी आनंदजी ने 1959 में फ़िल्म ‘सट्टा बाज़ार’ और ‘मदारी’ का संगीत दिया, जबकि 1961 में ‘छलिया’ का संगीत दिया। फ़िल्म 'छलिया' में उनके संगीत से सजा गीत "डम डम डिगा डिगा" और "छलिया मेरा नाम" श्रोताओं के बीच आज भी लोकप्रिय हैं।

वर्ष 1965 में प्रदर्शित संगीतमय फ़िल्म 'हिमालय की गोद में' की सफलता के बाद कल्याणजी-आनंदजी शोहरत की बुलंदियों पर जा पहुंचे। मनोज कुमार की फ़िल्म 'उपकार' में उन्होंने 'कसमे वादे प्यार वफा' जैसा दिल को छू लेने वाला संगीत देकर श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। इसके अलावा मनोज कुमार की ही फ़िल्म 'पूरब और पश्चिम' के लिए भी कल्याणजी ने 'दुल्हन चली वो पहन चली तीन रंग की चोली' और 'कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे' जैसा
सदाबहार संगीत देकर अलग ही समां बांध दिया। 1970 में विजय आनंद निर्देशित फ़िल्म 'जॉनी मेरा नाम' में 'नफरत करने वालों के सीने में प्यार भर दूं' और 'पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले' जैसे गीतों के लिए रूमानी संगीत देकर कल्याणजी-आनंदजी ने श्रोताओं का दिल जीत लिया। मनमोहन देसाई के निर्देशन में फ़िल्म 'सच्चा झूठा' के लिये कल्याणजी-आनंदजी ने बेमिसाल संगीत दिया। 'मेरी प्यारी बहनियाँ बनेगी दुल्हनियाँ' को आज भी शहरों और देहातों में विवाह आदि के मौके पर सुना जा सकता है।

पुरस्कार तथा सम्मान
वर्ष 1968 में प्रदर्शित फ़िल्म 'सरस्वती चंद्र' के लिए कल्याणजी आनंदजी को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के 'राष्ट्रीय पुरस्कार' के साथ-साथ 'फ़िल्म फेयर पुरस्कार' भी दिया गया। इसके अलावा 1974 में प्रदर्शित फ़िल्म 'कोरा काग़ज़' के लिए भी कल्याणजी आनंदजी को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का 'फ़िल्म फेयर पुरस्कार' मिला। कल्याणजी ने अपने सिने करियर में लगभग 250 फ़िल्मों में संगीत दिया। वर्ष 1992 में संगीत के क्षेत्र में बहुमूल्य योगदान के लिए उन्हें भारत सरकार ने 'पद्मश्री' से सम्मानित किया।

निधन
लगभग चार दशक तक अपने जादुई संगीत से श्रोताओं को भावविभोर करने वाले कल्याणजी 24 अगस्त, 2000 को इस दुनिया को अलविदा कह गए।

🎥उनके फिल्मी गीत🎙️

उनके गाने बार-बार बिनाका गीतमाला की शीर्ष लोकप्रियता रेटिंग में शामिल हुए और कई बार सूची में शीर्ष पर रहे। गीत शीर्षक के अनुसार उनकी कुछ उल्लेखनीय रचनाएँ इस प्रकार हैं:


"आँखों आँखों में हम तुम" ( महल , 1969)

"आज कल हम से रूठे हुए हैं सनम" ( आमने सामने , 1967)

"आज की रात साजन" ( विश्वास , 1969) 

"आओ तुम्हें मैं प्यार सिखा दूं" ( उपासना , 1971)

"आप से हमको बिछड़े हुए" ( विश्वास , 1969)

"अकेले है चले आओ" ( राज़ , 1967)

"अँखियों का नूर है तू" ( गोवा में जौहर महमूद , 1965)

"अपनी तो जैसे तैसे" ( लावारिस , 1978) 

"अरे दीवानो मुझे पहचानो" ( डॉन , 1978)

"अरे हुस्न चला कुछ ऐसी" ( ब्लफ़मास्टर , 1963) 

"अरे ओह रे, धरती की तरह" ( सुहाग रात , 1968)

"और इस दिल में क्या" ( इमानदार , 1987)

"अरे रफ़्ता रफ़्ता देखो मेरी" ( कहानी किस्मत की , 1973)

"बड़ी दूर से आये हैं" ( समझौता , 1973)

"बन के साथी प्यार की रहो में" ( जानेमन , 1971)

"बेखुदी में सनम" ( हसीना मान जाएगी , 1968)

"भारत का रहनेवाला हूँ" ( पूरब और पश्चिम , 1970)

"बिना बदरा के बिजुरिया" ( बंधन , 1969)

"बुरे भी हम भले भी हम" ( बनारसी बाबू , 1973)

"चाहे आज मुझे ना पसंद करो" ( दरिंदा , 1977)

"चाहे पास हो" ( सम्राट चंद्रगुप्त , 1959)

"चांद आहेन भरेगा" ( फूल बने अंगारे , 1963)

"चंदन सा बदन" ( सरस्वतीचंद्र , 1968) 

"चाँद सी मेहबूबा" ( हिमालय की गोद में , 1965)

"चाँदी की देवर ना तोड़ी" ( विश्वास , 1969)

"चले द साथ मिलकर" ( हसीना मान जाएगी , 1968)

"छलिया मेरा नाम" ( छलिया , 1960) 

"छुक छुक" ( रफू चक्कर , 1975)

"छोटी सी उमर में लग" ( बैराग , 1976)

"चुपके से दिल दाई दे" ( मर्यादा , 1971)

"डैम डैम डिगा डिगा" ( छलिया , 1960)

"दर्पण को देखा" ( उपासना , 1971)

"धीरे रे चलो गोरी" ( गोवा में जौहर महमूद , 1965)

"दिल बेकरार सा है" ( इशारा , 1964)

"दिल जालों का दिल जलाके" ( ज़ंजीर , 1973)

"दिल को देखो चेहरा ना देखो" ( सच्चा झूठा , 1970) 

"दिल लूटनेवाले जादूगर" ( मदारी , 1959)

"दिल ने दिल से" ( रखवाला , 1971)

"दिल तो दिल है" ( कब क्यों और कहाँ , 1970)

"दिलवाला दीवाना मुतवाला मस्ताना" ( प्रोफेसर प्यारेलाल , 1981)

"दो बेचारे बिना सहारे" ( विक्टोरिया नंबर 203 , 1972)

"दो कदम तुम भी चलो" ( एक हसीना दो दीवाने , 1971)

"दुल्हन चली" ( पूरब और पश्चिम , 1970)

"दुनिया में प्यार की सब को" ( सच्चा झूठा , 1970) 

"दुनिया मुझे कहती है कि पीना छोड़ दे" ( कहानी किस्मत की , 1973)

"एक बात पूछू दिल की बात" ( कठपुतली , 1971)

"एक से बढ़कर एक" ( एक से बढ़कर एक , 1976)

"एक तारा बोले" ( यादगार , 1970)

"एक था गुल और एक थी" ( जब जब फूल खिले , 1965) 

"एक तू ना मिला", ( हिमालय की गोद में , 1965)

"गा गा गा गए जा" ( प्रोफेसर प्यारेलाल , 1981)

"गली गली में" ( त्रिदेव , 1989) केएफजी

"गंगा मैया में जब तक" ( सुहाग रात , 1968)

"गज़ार ने किया है इशारा ( त्रिदेव , 1989) अज़हर (फ़िल्म)

"घोड़ी पे हो के सवार" ( गुलाम बेगम बादशाह , 1973)

"गोविंदा आला रे आला" ( ब्लफ़ मास्टर , 1963) 

"गुणी जानो भक्त जानो" ( अंशु और मुस्कान , 1970)

"हर किसिको नहीं मिलता" ( जांबाज , 1986) 

"हे रे कन्हैया" ( छोटी बहू , 1971)

"हम बोलेगा तो बोलोगे की" ( कसौटी , 1974)

"हम छोड़ चले हैं महफ़िल को" ( जी चाहता है , 1964)

"हमारे सिवा तुम्हारे और कितने दीवाने" ( अपराध , 1972)

"हम को मोहब्बत हो गई है" ( हाथ की सफाई , 1974)

"हम जिनके सहारे" ( सफ़र , 1970)

"हमसफ़र अब ये सफ़र का" ( जुआरी , 1968)

"हमसफ़र मेरे हमसफ़र" ( पूर्णिमा , 1965)

"हमने तुझको प्यार किया है" ( दूल्हा दुल्हन , 1964)

"हमने आज से तुम्हें ये नाम दे दिया" ( राजा साहब , 1969)

"हो गए हम आपके कसमसे" ( बॉम्बे 405 माइल्स , 1981)

"हुस्ना के लाखों रंग" ( जॉनी मेरा नाम , 1970)

"जा रे जा ओ हरजाई" ( कालीचरण , 1976)

"जीवन से भरी तेरी आँखें" ( सफ़र , 1970)

"जिसके सपने हमें रोज़ आते हैं ( गीत , 1971)

"जिस दिल में बसा था प्यार तेरा" ( सहेली , 1965)

"जिस पथ पे चला" ( यादगार , 1970)

"जो प्यार तूने मुझको दिया था" ( दूल्हा दुल्हन , 1964)

"जो तुमको हो पसंद वही बात करेंगे" ( सफ़र , 1970) 

"जो तुम हंसोगे तो" ( कठपुतली , 1971)

"जुबां पर दर्दभरी दास्तां" ( मर्यादा , 1971)

"कांकरिया मार के जगाया" ( हिमालय की गोद में , 1965)

"कभी रात दिन हम दूर थे" ( आमने सामने , 1978)

"करले प्यार करले आंखें चार" ( सच्चा झूठा , 1970) 

"कसम ना लो कोई हमसे" ( बॉम्बे 405 माइल्स , 1981)

"कौन रहा है कौन रहेगा" ( संकोच , 1976)

"खइके पान बनारसवाला" ( डॉन , 1978) 

"खाई थी कसम" ( दिल ने पुकारा , 1967)

"खुश रहो हर ख़ुशी हे" ( सुहाग रात , 1968)

"किसी राह में किसी मोड़ पर" ( मेरे हमसफ़र , 1970)

"कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे" ( पूरब और पश्चिम , 1970)

"कोई कोई आदमी दीवाना होता है" ( जानेमन , 1971)

"कोई कोई रात ऐसी होती है" ( बनारसी बाबू , 1973)

"कूब के बिछड़े हुए" ( लावारिस , 1981) 

"क्या हुआ क्या नहीं" ( युद्ध , 1985)

"क्या ख़ूब लगती हो" ( धर्मात्मा , 1975)

"लैला ओ लैला" ( कुर्बानी , 1980)

"ले चल मेरे जीवन साथी" ( विश्वास , 1969) 

"लुक छिप लुक छिप जाओना" ( दो अंजाने , 1976)

"मैं तो एक ख्वाब हूं" ( हिमालय की गोद में , 1965)

"मैं बैरागी नाचूँ गाऊँ" ( बैराग , 1976)

"मैं डूब जाता हूं" ( ब्लैक मेल , 1973)

"मैं प्यासा तुम सावन" ( फरार , 1975)

"मैं तेरी मोहब्बत में" ( त्रिदेव , 1989)

"मैं तो भूल चली बाबुल का देश" ( सरस्वतीचंद्र , 1968) 

"मैं तुझे मिलने आयी मंदिर" ( हीरा , 1973)

"मेरे देश की धरती" ( उपकार , 1967) 

"मेरे दिल ने जो माँगा" ( रखवाला , 1971)

मेरा जीवन कोरा कागज ( कोरा कागज , 1973) - इस साउंडट्रैक ने फिल्मफेयर पुरस्कार जीता और वर्ष 1974 के लिए बिनाका गीतमाला में शीर्ष स्थान हासिल किया। 

"मेरी लॉटरी लग" ( होली आई रे , 1970)

"मेरे मितवा मेरे मीत रे" ( गीत , 1970)

"मेरे टूटे हुए दिल से" ( छलिया , 1960)

"मेरी जान कुछ भी लीजिए" ( छलिया , 1960) 

"मेरी प्यारी बहनिया" ( सच्चा झूठा , 1970)

"मिले मिले दो बदन" ( ब्लैक मेल , 1973)

"मुझे कहते है कल्लू कवल" ( दूल्हा दुल्हन , 1964)

"मुझको इस रात की तन्हाई में आवाज़ ना दो" ( दिल भी तेरा हम भी तेरे , 1960) 

"माई गुरु" ( थिकॅर दैन वॉटर , 2003)

"ना ना करते प्यार तुम्हीं से" ( जब जब फूल खिले , 1965)

"नफ़रत करने वालों के" ( जॉनी मेरा नाम , 1970)

"ना कोई रहा है ना कोई रहेगा" ( गोवा में जौहर महमूद , 1965)

"नैनों में निंदिया है" ( जोरू का गुलाम , 1972)

"नज़र का झुक जाना" ( पासपोर्ट , 1961)

"ओ दिलबर जानिये" ( हसीना मान जायेगी , 1968)

"ओ मेरे राजा" ( जॉनी मेरा नाम , 1970)

ओ नींद ना मुझको आये ( पोस्ट बॉक्स 999 , 1958)

ओ साथी रे तेरे बिना भी क्या जीना ( मुकद्दर का सिकंदर , 1978)

"ओ तुमसे दूर रहके" ( अदालत , 1976)

"पल पल दिल के पास" ( ब्लैक मेल , 1973)

"पल भर के लिए" ( जॉनी मेरा नाम , 1970)

"परदेसियों से अखियाँ मिलाना" ( जब जब फूल खिले , 1965) 

"पीने ​​वालो को पीने का बहाना" ( हाथ की सफाई , 1974)

"पीते-पीते कभी-कभी" ( बैराग , 1976)

"फूल तुम्हें भेजा है ख़त मैं" ( सरस्वतीचंद्र , 1968)

"प्रिय प्राणेश्वरी" ( हम तुम और वो , 1971)

"प्यार तो एक दिन होना था" ( एक श्रीमान एक श्रीमती , 1969)

"प्यार से दिल भर दे" ( कब क्यों और कहाँ , 1970)

"क़स्मे वादे प्यार वफ़ा" ( उपकार , 1967)

"रफ़्ता राफ़्ता देखो मेरी" ( कहानी किस्मत की , 1973)

"रहने दो रहने दो, गइल शिकवे" ( रखवाला , 1971)

"साज़-ए-दिल छेड़ दे" ( पासपोर्ट , 1961)

"सबके रहते लगता है जैसे" ( समझौता , 1973)

"समझौता गेमों से कार्लो" ( समझौता , 1973)

"सलाम-ए-इश्क मेरी जान" ( मुकद्दर का सिकंदर 1978) 

"समा हे सुहाना सुहाना" ( घर घर की कहानी , 1970)

"सुख के सब साथी" ( गोपी , 1970)

"तेरा साथ कितना प्यारा" ( जांबाज , 1986)

"तेरे चेहरे में वो" ( धर्मात्मा , 1975)

"तेरे होठों के दो फूल" ( पारस , 1971)

"तेरे नैना क्यों भर आये" ( गीत , 1971)

"तेरी रहो मैं खड़े है दिल थाम के" ( छलिया , 1960)

"तेरी जुल्फें परेशां" ( प्रीत ना जाने रीत , 1963)

"थोड़ा सा ठहरो" ( विक्टोरिया नं. 203 , 1973)

"तिरची टोपीवाले" ( त्रिदेव , 1989)

"तुम को मेरे दिल ने पुकारा" ( रफू चक्कर , 1975)

"तुम मिले प्यार से" ( अपराध , 1972)

"तुम से दूर रह के" ( अदालत , 1976)

"तू क्या जाने" ( हादसा , 1983)

"तू क्या जाने वफ़ा ओ बेवफ़ा" ( हाथ की सफाई , 1974)

"तू ना मिलि तो हम जोगी बाण जायेंगे" ( विक्टोरिया नंबर 203 , 1972)

"तू यार है मेरा" ( कहानी किस्मत की , 1973)

"वादा कर ले सजना" ( हाथ की सफाई , 1974)

"वक्त करता जो वफ़ा" ( दिल ने पुकारा , 1967)

यारी है ईमान मेरा ( जंजीर , 1973)

"ये बॉम्बे सहर है हादसा" ( हादसा , 1983)

"ये दुनियावाले पूछेंगे" ( महल ), 1969) 

"ये मेरा दिल" ( डॉन , 1978)

"ये रात है प्यासी प्यासी" ( छोटी बहू , 1971)

"ये समा, समा है ये प्यार का" ( जब जब फूल खिले , 1965) 

"योग करो योग योग" ( हादसा , 1983)

"ये दो दीवाने दिलके, चले" ( गोवा में जौहर महमूद , 1965)

"ये वादा रहा" ( प्रोफेसर प्यारेलाल , 1981)

"यूंही तुम मुझसे बात करती हो" ( सच्चा झूठा , 1970) 

"युद्ध कर" ( युद्ध , 1985)

"ज़िंदगी का सफ़र है ये कैसा सफ़र" ( सफ़र , 1970)

"जुबान पर दर्द भरी दास्तान" ( मर्यादा , 1971)


Tuesday, August 20, 2024

शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खान

#21aug 
#21march 
उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ
🎂जन्म 21 मार्च 1916
जन्म भूमि डुमरांव, बिहार
⚰️मृत्यु 21 अगस्त, 2006 (90 वर्ष)
अभिभावक पैंगबर ख़ाँ
कर्म भूमि बनारस
कर्म-क्षेत्र शहनाई वादक
मुख्य फ़िल्में ‘सन्नादी अपन्ना’ (कन्नड़), ‘गूंज उठी शहनाई’ और ‘जलसाघर’ (हिंदी)
विद्यालय 'बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय' और 'शांतिनिकेतन'
पुरस्कार-उपाधि 'भारत रत्न', 'रोस्टम पुरस्कार', 'पद्म श्री', 'पद्म भूषण', 'पद्म विभूषण', 'तानसेन पुरस्कार'
विशेष योगदान 1947 में आजादी की पूर्व संध्या पर जब लालकिले पर देश का झंडा फहरा रहा था, तब बिस्मिल्लाह ख़ाँ की शहनाई भी वहाँ आज़ादी का संदेश बाँट रही थी। तब से लगभग हर साल 15 अगस्त को प्रधानमंत्री के भाषण के बाद बिस्मिल्लाह ख़ाँ का शहनाई वादन एक प्रथा बन गयी।
नागरिकता भारतीय
उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ 
🎂 जन्म- 21 मार्च, 1916, बिहार;⚰️ मृत्यु- 21 अगस्त, 2006) 'भारत रत्न' से सम्मानित प्रख्यात शहनाई वादक थे। सन 1969 में 'एशियाई संगीत सम्मेलन' के 'रोस्टम पुरस्कार' तथा अनेक अन्य पुरस्कारों से सम्मानित बिस्मिल्लाह खाँ ने शहनाई को भारत के बाहर एक विशिष्ट पहचान दिलवाने में मुख्य योगदान दिया। वर्ष 1947 में देश की आज़ादी की पूर्व संध्या पर जब लालकिले पर भारत का तिरंगा फहरा रहा था, तब बिस्मिल्लाह ख़ान की शहनाई भी वहाँ आज़ादी का संदेश बाँट रही थी। तब से लगभग हर साल 15 अगस्त को प्रधानमंत्री के भाषण के बाद बिस्मिल्लाह ख़ान का शहनाई वादन एक प्रथा बन गयी।

जीवन परिचय

बिस्मिल्लाह ख़ाँ का जन्म 21 मार्च, 1916 को बिहार के डुमरांव नामक स्थान पर हुआ था। उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ विश्व के सर्वश्रेष्ठ शहनाई वादक माने जाते थे। उनके परदादा शहनाई नवाज़ उस्ताद सालार हुसैन ख़ाँ से शुरू यह परिवार पिछली पाँच पीढ़ियों से शहनाई वादन का प्रतिपादक रहा है। बिस्मिल्लाह ख़ाँ को उनके चाचा अली बक्श 'विलायतु' ने संगीत की शिक्षा दी, जो बनारस के पवित्र विश्वनाथ मन्दिर में अधिकृत शहनाई वादक थे।

नामकरण तथा शिक्षा

उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ के नाम के साथ एक दिलचस्प वाकया भी जुड़ा हुआ है। उनका जन्म होने पर उनके दादा रसूल बख्श ख़ाँ ने उनकी तरफ़ देखते हुए 'बिस्मिल्ला' कहा। इसके बाद उनका नाम 'बिस्मिल्ला' ही रख दिया गया। उनका एक और नाम 'कमरूद्दीन' था। उनके पूर्वज बिहार के भोजपुर रजवाड़े में दरबारी संगीतकार थे। उनके पिता पैंगबर ख़ाँ इसी प्रथा से जुड़ते हुए डुमराव रियासत के महाराजा केशव प्रसाद सिंह के दरबार में शहनाई वादन का काम करने लगे। छह साल की उम्र में बिस्मिल्ला को बनारस ले जाया गया। यहाँ उनका संगीत प्रशिक्षण भी शुरू हुआ और गंगा के साथ उनका जुड़ाव भी। ख़ाँ साहब 'काशी विश्वनाथ मंदिर' से जुड़े अपने चाचा अली बख्श ‘विलायतु’ से शहनाई वादन सीखने लगे।

जटिल संगीत रचना

बिस्मिल्लाह ख़ाँ ने जटिल संगीत की रचना, जिसे तब तक शहनाई के विस्तार से बाहर माना जाता था, में परिवर्द्धन करके अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया और शीघ्र ही उन्हें इस वाद्य से ऐसे जोड़ा जाने लगा, जैसा किसी अन्य वादक के साथ नहीं हुआ। उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ ने भारत के पहले गणतंत्र दिवस समारोह की पूर्व संध्या पर नई दिल्ली में लाल क़िले से अत्यधिक मर्मस्पर्शी शहनाई वादक प्रस्तुत किया।

उल्लेखनीय

उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ां पर जारी डाक टिकट
बिस्मिल्ला ख़ाँ ने 'बजरी', 'चैती' और 'झूला' जैसी लोकधुनों में बाजे को अपनी तपस्या और रियाज़ से ख़ूब सँवारा और क्लासिकल मौसिक़ी में शहनाई को सम्मानजनक स्थान दिलाया। इस बात का भी उल्लेख करना आवश्यक है कि जिस ज़माने में बालक बिस्मिल्लाह ने शहनाई की तालीम लेना शुरू की थी, तब गाने बजाने के काम को इ़ज़्जत की नज़रों से नहीं देखा जाता था। ख़ाँ साहब की माता जी शहनाई वादक के रूप में अपने बच्चे को कदापि नहीं देखना चाहती थीं। वे अपने पति से कहती थीं कि- "क्यों आप इस बच्चे को इस हल्के काम में झोक रहे हैं"।

उल्लेखनीय है कि शहनाई वादकों को तब विवाह आदि में बुलवाया जाता था और बुलाने वाले घर के आँगन या ओटले के आगे इन कलाकारों को आने नहीं देते थे। लेकिन बिस्मिल्लाह ख़ाँ साहब के पिता और मामू अडिग थे कि इस बच्चे को तो शहनाई वादक बनाना ही है। उसके बाद की बातें अब इतिहास हैं।


विदेशों में वादन

जितना भी कहूँगा बहुत कम होगा क्योंकि वो एक ऐसे इंसान थे जिन्होंने कभी दिखावे में यकीन नहीं किया। वो हमेशा सबको अच्छी राह दिखाते थे और बताते थे। वो ऑल इंडिया रेडियो को बहुत मानते थे और हमेशा कहा करते कि मुझे ऑल इंडिया रेडियो ने ही बनाया है। वो एक ऐसे फरिश्ते थे जो धरती पर बार-बार जन्म नहीं लेते हैं और जब जन्म लेते हैं तो अपनी अमिट छाप छोड़ जाते है।

मेरा मानना है कि उनका निधन नहीं हो सकता क्योंकि वो हमारी आत्मा में इस कदर रचे बसे हुए हैं कि उनको अलग करना नामुमकिन है।
हरिप्रसाद चौरसिया के श्रीमुख से
बाँसुरी वादक हरिप्रसाद चौरसिया का कहना है- बिस्मिल्ला ख़ाँ साहब भारत की एक महान् विभूति थे, अगर हम किसी संत संगीतकार को जानते है तो वो हैं बिस्मिल्ला खा़न साहब। बचपन से ही उनको सुनता और देखता आ रहा हूं और उनका आशीर्वाद सदा हमारे साथ रहा। वो हमें दिशा दिखाकर चले गए, लेकिन वो कभी हमसे अलग नहीं हो सकते हैं। उनका संगीत हमेशा हमारे साथ रहेगा। उनके मार्गदर्शन पर अनेक कलाकार चल रहे हैं। शहनाई को उन्होंने एक नई पहचान दी। शास्त्रीय संगीत में उन्होंने शहनाई को जगह दिलाई इससे बड़ी बात क्या हो सकती है। यह उनकी मेहनत और शहनाई के प्रति समर्पण ही था कि आज शहनाई को भारत ही नहीं बल्कि पूरे संसार में सुना और सराहा जा रहा है। उनकी कमी तो हमेशा ही रहेगी। मेरा मानना है कि उनका निधन नहीं हो सकता क्योंकि वो हमारी आत्मा में इस कदर रचे बसे हुए हैं कि उनको अलग करना नामुमकिन है।
सन 1956 में बिस्मिल्लाह ख़ाँ को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
सन 1961 में उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया।
सन 1968 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।
सन 1980 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।
2001 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
मध्य प्रदेश में उन्हें सरकार द्वारा तानसेन पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।
निधन
बिस्मिल्ला ख़ान ने एक संगीतज्ञ के रूप में जो कुछ कमाया था वो या तो लोगों की मदद में ख़र्च हो गया या अपने बड़े परिवार के भरण-पोषण में। एक समय ऐसा आया जब वो आर्थिक रूप से मुश्किल में आ गए थे, तब सरकार को उनकी मदद के लिए आगे आना पड़ा था। उन्होंने अपने अंतिम दिनों में दिल्ली के इंडिया गेट पर शहनाई बजाने की इच्छा व्यक्त की थी लेकिन उस्ताद की यह इच्छा पूरी नहीं हो पाई और 21 अगस्त, 2006 को 90 वर्ष की आयु में इनका देहावसान हो गया।

Sunday, August 18, 2024

उत्पल दत्त

#19aug 
#29march 
अन्य नाम उत्पल दा
उत्पल दत्त
🎂जन्म 29 मार्च, 1929
जन्म भूमि बारीसाल, पूर्वी बंगाल
⚰️मृत्यु 19 अगस्त, 1993
अभिभावक गिरिजारंजन दत्त
पति/पत्नी शोभा सेन
संतान बिष्णुप्रिया (पुत्री)
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र हिन्दी तथा बांग्ला सिनेमा
मुख्य फ़िल्में 'गोलमाल', 'सात हिन्दुस्तानी', 'रंग बिरंगी', 'अंगूर', 'कर्तव्य', 'ईमान धर्म', 'शुभ लग्न' आदि।
शिक्षा अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातक
विद्यालय 'सेंट जेवियर कॉलेज', कोलकाता
पुरस्कार-उपाधि 'फ़िल्म फ़ेयर बेस्ट कॉमेडियन अवार्ड', 'नेशनल फ़िल्म अवार्ड'।
प्रसिद्धि अभिनेता तथा फ़िल्म निर्देशक
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी 1940 में उत्पल दत्त अंग्रेज़ी थिएटर से जुड़े और अभिनय की शुरूआत कर दी। इस दौरान उन्होंने थिएटर कंपनी के साथ भारत और पाकिस्तान में कई नाटक मंचित किए। नाटक 'ओथेलो' से उन्हें काफ़ी वाहवाही मिली थी।
उत्पल दत्त (अंग्रेज़ी: Utpal Dutt ; जन्म- 29 मार्च, 1929, बारीसाल, पूर्वी बंगाल; मृत्यु- 19 अगस्त, 1993) भारतीय सिनेमा के ऐसे प्रसिद्ध अभिनेता थे, जिन्होंने हिन्दी और बांग्ला फ़िल्मों में अपनी अमिट छाप छोड़ी। एक अभिनेता के रूप में उत्पल दत्त ने लगभग हर किरदार को निभाया। हिन्दी पर्दे पर कभी पिता तो कभी चाचा, कहीं डॉक्टर तो कहीं सेठ, कभी बुरे तो बहुधा अच्छे बने 'उत्पल दा' को दर्शक किसी भी रूप में नहीं भूल सकेंगे। उत्पल दत्त को अधिकतर एक हास्य अभिनेता के रूप में याद किया जाता है। वर्ष 1979 की सुपरहिट फ़िल्म 'गोलमाल' में उनके द्वारा निभाया गया 'भवानी शंकर' का शानदार हास्य अभिनय आज भी याद किया जाता है। उत्पल दत्त एक उच्च दर्जे के अभिनेता ही नहीं, एक कुशल निर्देशक और नाटककार भी थे। सीरियल से लेकर कॉमेडी तक के हर रोल को उन्होंने बड़ी संजीदगी से निभाया था।
उत्पल दत्ता का जन्म 29 मार्च 1929 को बारीसाल में एक बंगाली कायस्थ परिवार में हुआ था । उनके पिता का नाम गिरिजरंजन दत्ता था। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय के सेंट जेवियर्स कॉलेज, कलकत्ता से अंग्रेजी साहित्य में ऑनर्स की डिग्री प्राप्त की।
19 अगस्त 1993 को,  दत्त की एसएसकेएम अस्पताल, कलकत्ता , पश्चिम बंगाल से घर लौटने के तुरंत बाद दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गई, जहां उनका डायलिसिस हुआ था।

🎥

यह उत्पल दत्त की अधूरी फिल्मोग्राफी है।

माइकल मधुसूदन (1950)
विद्यासागर (1950)
विक्रम उर्वशी (1954)
रानी रासमणि (1955)
ताका आना पे (1956)
सुभलग्ना (1956)
हरानो सुर (1957)
सप्तपदी (1961) (आवाज)
रक्त पलाश (1962)
शेष अंका (1963)
सूर्य शिखा (1963)
मोमर अलो (1964)
शेक्सपियर-वाला (1965)
चौरंगी (1968)
द गुरु (1969)
भुवन शोम (1969)
सात हिंदुस्तानी (1969)
बॉम्बे टॉकी (1970)
कलंकिता नायक (1970)
कलकत्ता 71 (1971)
गुड्डी (1971)
खुंजे बेराई (1971)
एक अधूरी कहानी (1972)
मेरे जीवन साथी (1972)
सबसे बड़ा सुख (1972)
हनीमून (1973)
मरजीना अब्दुल्ला (1973)
श्रीमान पृथ्वीराज (1973)
असाती (1974)
कोरस (1974)
मिस्टर रोमियो (1974)
जुक्ति, तक्को आर गप्पो (1974)
थगिनी (1974)
अमानुष (1975)
जूली (1975)
अनारी (1975)
पलंका (1975)
जन अरण्य (1976)
दत्ता (1976)
दो अनजाने (1976)
सनटैन (1976)
सेई चोख (1976)
शेक (1976)
कोतवाल साब (1977)
यही है जिंदगी (1977)
इम्मान धरम (1977) बलबीर सिंह, मिलिट्री मैन के रूप में
आनंद आश्रम (1977)
अनुरोध (1977)
दुल्हन वही जो पिया मन भाये (1977)
एक ही रास्ता
फरिश्ता या कातिल (1977)
किस्सा कुर्सी का (1977)
प्रियतमा (1977)
स्वामी (1977)
अतिथि (1978)
स्ट्राइकर (1978)
सफ़ेद हाथी (1978)
धनराज तमांग (1978)
जय बाबा फेलूनाथ (1978)
टूटे खिलोने (1978)
कर्तव्य (1979) दीवान धनपति राय के रूप में
गोलमाल (1979)
महान जुआरी (1979)
झोर (1979)
प्रेम विवाह (1979)
समझौता (1980)
हिरक राजार देशे (1980)
पाका देखा (1980)
अपने पराये (1980)
राम बलराम (1980)
अग्नि परीक्षा (1981)
नरम गरम (1981)
बरसात की एक रात (1981) उर्फ़ अनुसंधान (भारत: बंगाली शीर्षक)
चालचित्र (1981)
मेघमुक्ति (1981)
सुबर्ण गोलक (1981)
शौकीन (1981)
बैसाखी मेघ (1981) कर्नल मैनिंघम के रूप में
राजबाधु (1982)
रास्ते प्यार के (1982)
हमारी बहू अलका (1982)
अंगूर (1982)
अच्छा बुरा (1983)
रंग बिरंगी (1983)
दुती पाटा (1983)
किसी से ना कहना (1983)
पसंद अपनी अपनी (1983)
शुभ कामना (1983)
लव मैरिज (1984)
जॉन जानी जनार्दन (1984)
लाखों की बात (1984)
इंकलाब (1984)
पार (1984)
ये देश (1984)
साहेब (1985)
हरिश्चंद्र शैब्य (1985)
आर पार (1985)
अन्यय अभिचार (1985)
उल्टा सीधा (1985)
आप के साथ (1986)
बात बन जाए (1986)
किरायदार (1986)
मैं बलवान (1986)
पाठभोला (1986)
सदा सुहागन (1986)
किस्सा काठमांडू का (1986-1987, टीवी श्रृंखला)
प्यार के काबिल (1987)
आज का रॉबिन हुड (1987)
आशा ओ भालोबाशा (1988)
महावीर (1988)
ला नुइट बंगाली (1988)
बहुरानी (1989)
जवानी ज़िंदाबाद (1990)
मेरा पति सिर्फ मेरा है (1990)
आगन्तुक (1991)
जान पहचान (1991)
पथ-ओ-प्रसाद (1991)
पद्मा नादिर माझी (1992)
ब्योमकेश बक्शी (1993)
मिष्टी मधुर (1993)
अजान पथ (1994)
मेरा दामाद (1995) उनकी अंतिम फिल्म उनकी मृत्यु के 2 साल बाद रिलीज हुई

नाजिमा

नाजिमा  जनम  25 मार्च 1948  मृत्यु 11 अगस्त 2025 हिन्दी सिनेमा के स्वर्ण युग की प्यारी 'बहन' और सहेली, अभिनेत्री नाजिमा के निधन पर ए...