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Saturday, August 31, 2024

डॉ राही मासूम रज़ा

#01sep #15march 
राही मासूम रज़ा 
🎂01सितंबर 1925
⚰️15 मार्च 1992
बच्चे: नदीम खान
पेशा
उपन्यासकार, उर्दू कवि
सक्रिय वर्ष
1945–1992
उल्लेखनीय पुरस्कार
1979 फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ संवाद पुरस्कार : मैं तुलसी तेरे आँगन की
रिश्तेदार
पार्वती खान (बहू)
उनका जन्म गाजीपुर जिले के गंगौली गांव में हुआ था और प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा गंगा किनारे गाजीपुर शहर के एक मुहल्ले में हुई थी। बचपन में पैर में पोलियो हो जाने के कारण उनकी पढ़ाई कुछ सालों के लिए छूट गयी, लेकिन इंटरमीडियट करने के बाद वह अलीगढ़ आ गये और यहीं से एमए करने के बाद उर्दू में `तिलिस्म-ए-होशरुबा' पर पीएच.डी. की। पीएच.डी. करने के बाद राही अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़ के उर्दू विभाग में प्राध्यापक हो गये और अलीगढ़ के ही एक मुहल्ले बदरबाग में रहने लगे। अलीगढ़ में रहते हुए ही राही ने अपने भीतर साम्यवादी दृष्टिकोण का विकास कर लिया था और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के वे सदस्य भी हो गए थे। अपने व्यक्तित्व के इस निर्माण-काल में वे बड़े ही उत्साह से साम्यवादी सिद्धान्तों के द्वारा समाज के पिछड़ेपन को दूर करना चाहते थे और इसके लिए वे सक्रिय प्रयत्न भी करते रहे थे।

राही मासूम रज़ा
राष्ट्रीयता भारतीय
1968से राही बम्बई में रहने लगे थे। वे अपनी साहित्यिक गतिविधियों के साथ-साथ फिल्मों के लिए भी लिखते थे जो उनकी जीविका का प्रश्न बन गया था। राही स्पष्टतावादी व्यक्ति थे और अपने धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय दृष्टिकोण के कारण अत्यन्त लोकप्रिय हो गए थे। यहीं रहते हुए राही ने आधा गांव, दिल एक सादा कागज, ओस की बूंद, हिम्मत जौनपुरी उपन्यास व 1965के भारत-पाक युद्ध में शहीद हुए वीर अब्दुल हमीद की जीवनी छोटे आदमी की बड़ी कहानी लिखी। उनकी ये सभी कृतियाँ हिंदी में थीं। इससे पहले वह उर्दू में एक महाकाव्य 1857 जो बाद में हिन्दी में क्रांति कथा नाम से प्रकाशित हुआ तथा छोटी-बड़ी उर्दू नज़्में व गजलें लिखे चुके थे। आधा गाँव, नीम का पेड़, कटरा बी आर्ज़ू, टोपी शुक्ला, ओस की बूंद और सीन 75 उनके प्रसिद्ध उपन्यास हैं।पिछले कुछ वर्षों प्रसिद्धि में रहीं हिन्दी पॉप गायिका पार्वती खान का विवाह इनके पुत्र नदीम खान, हिन्दी फिल्म निर्देशक एवं सिनेमैटोग्राफर से हुआ था।

उन्होंने एक टीवी धारावाहिक महाभारत की पटकथा और संवाद लिखे।टीवी धारावाहिक महाकाव्य महाभारत पर आधारित था। धारावाहिक भारत के सबसे लोकप्रिय टीवी धारावाहिकों में से एक बन गया, जिसमें लगभग 86% की चोटी की टेलीविजन रेटिंग थी।

उनकी कृतियों में शामिल हैं:

उपन्यास
आधा गाँव ( विभाजित गाँव ) 
दिल एक सादा कागज़
टोपी शुक्ला 
ओस की बूंद
कटरा बी आरज़ू 
दृश्य क्रमांक 75
कविता
मौज-ए-ग़ुल मौज-ए-सबा (उर्दू) 
अजनबी शहर: अजनबी रास्ते (उर्दू) 
मैं एक फेरीवाला (हिन्दी) 
शीशे के मकान वाले (हिन्दी)
आत्मकथा
छोटे आदमी की बड़ी कहानी ("एक छोटे आदमी की बड़ी कहानी") 
फिल्म और टीवी स्क्रिप्ट
नीम का पेड़ – इसी नाम का उपन्यास और टीवी धारावाहिक 
किसी से ना कहना
मैं तुलसी तेरे आँगन की
डिस्को डांसर (1982)
महाभारत (1988)
फिल्म संवाद
अलाप (1977)
गोलमाल (1979)
कर्ज (1980)
जुदाई (1980)
हम पाँच (1980)
अनोखा रिश्ता (1986)
बात बन जाए (1986)
नाचे मयूरी (1986)
आवाम (1987)
लम्हे (1991)
परम्परा (1992)
आइना (1993)
फ़िल्म के बोल
अलाप (1977)
देस में निकला होगा चाँद ( जगजीत सिंह और चित्रा सिंह ) 

Thursday, August 29, 2024

चित्रांगदा सिंह

#28march 
चित्रंगदा सिंह
28 मार्च 1976
जोधपुर, राजस्थान, भारत
राष्ट्रीयता
भारतीय
पेशा
अभिनेत्री
कार्यकाल
2003 – अबतक
जीवनसाथी
ज्योति रंधावा (वि॰ 2001 – 2014 तलाक; एक बच्चा)
माता-पिता
कर्नल निरंजन सिंह चहल (पिता)
हिन्दी फ़िल्मों की एक अभिनेत्री हैं। वह2005 में बनी फ़िल्म हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी में गीता राव की भूमिका अदा करने के लिए जानी जाती है।उनकी शादी भारतीय गोल्फ़ खिलाडी ज्योति रंधावा से हो चुकी है।
चित्रांगदा चहल का जन्म राजस्थान के जोधपुर में हुआ था। उनके पिता कर्नल निरंजन सिंह चहल एक भारतीय सेना अधिकारी हैं। उसका भाई दिग्विजय सिंह चहल एक गोल्फ़र हैं। सोफिया गर्ल्स स्कूल में मेरठ में स्कूली शिक्षा के बाद, उन्होंने लेडी इरविन कॉलेज, नई दिल्ली से गृह विज्ञान (भोजन और पोषण) में स्नातक की पढ़ाई पूरी की।उन्होंने कथक में औपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त किया है।
🎥
2003 हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी 
2005 कल: यैस्टर्डे एंड टुमॉरो 
2008 सौरी भाई !
2010 बसरा 
2011 ये साली जिन्दगी 
2011 देसी बॉयज 
2012 जोकर
2013 इनकार 
2013 आय, मी और मैं

Monday, August 26, 2024

रघुपति सहाय गोरखपुरी

#28aug #03march 

रघुपति सहाय 'फ़िराक़ गोरखपुरी'
जन्म 28 अगस्त, 1896
जन्म भूमि गोरखपुर, उत्तर प्रदेश
मृत्यु 3 मार्च, 1982
मृत्यु स्थान दिल्ली
अभिभावक पिता- मुंशी गोरख प्रसाद
पति/पत्नी किशोरी देवी
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र साहित्य
मुख्य रचनाएँ गुल-ए-नगमा, गुले-ए-रअना, रूहे-कायनात, मशअल, रूप (रुबाई), शबिस्तान, सरगम, बज़्म-ए-ज़िंदगी रंग-ए-शायरी, परछाइयाँ, तरान-ए-इश्क़ आदि।
भाषा उर्दू, फ़ारसी, हिंदी, ब्रजभाषा
विद्यालय इलाहाबाद विश्वविद्यालय
शिक्षा एम. ए. (अंग्रेज़ी साहित्य)
पुरस्कार-उपाधि साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार, पद्म भूषण
प्रसिद्धि उर्दू शायर, शिक्षक
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी गांधी जी के साथ असहयोग आन्दोलन में सम्मिलित हुए और जेल भी गये। कुछ दिनों आनन्द भवन, इलाहाबाद में पंडित नेहरू के सहायक के रूप में कांग्रेस का कामकाज भी देखा।
फिराक' उनका तख़ल्लुस था। उन्हें उर्दू कविता को बोलियों से जोड़ कर उसमें नई लोच और रंगत पैदा करने का श्रेय दिया जाता है। फ़िराक़ गोरखपुरी ने अपने साहित्यिक जीवन का आरंभ ग़ज़ल से किया था। फ़ारसी, हिन्दी, ब्रजभाषा और भारतीय संस्कृति की गहरी समझ होने के कारण उनकी शायरी में भारत की मूल पहचान रच-बस गई है। उन्हें 'साहित्य अकादमी पुरस्कार', 'ज्ञानपीठ पुरस्कार' और 'सोवियत लैण्ड नेहरू अवार्ड' से भी सम्मानित किया गया था। वर्ष 1970 में उन्हें 'साहित्य अकादमी' का सदस्य भी मनोनीत किया गया था।

जन्म तथा शिक्षा
उर्दू के मशहूर शायर फ़िराक़ गोरखपुरी का जन्म 28 अगस्त, वर्ष 1896 ई. में गोरखपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ था। फ़िराक़ का पूरा नाम 'रघुपति सहाय फ़िराक़' था, किंतु अपनी शायरी में वे अपना उपनाम 'फ़िराक़' लिखते थे। उनके पिता का नाम मुंशी गोरख प्रसाद था, जो पेशे से वकील थे। मुंशी गोरख प्रसाद भले ही वकील थे, किंतु शायरी में भी उनका बहुत नाम था। इस प्रकार यह कह सकते हैं कि शायरी फ़िराक़ साहब को विरासत में मिली थी। फ़िराक़ गोरखपुरी ने 'इलाहाबाद विश्वविद्यालय' में शिक्षा प्राप्त की थी। उन्होंने बी. ए. में पूरे प्रदेश में चौथा स्थान प्राप्त किया था। इसके बाद वे डिप्टी कलेक्टर के पद पर नियुक्त हुए।

विवाह
फ़िराक़ जी का विवाह 29 जून, 1914 को प्रसिद्ध ज़मींदार विन्देश्वरी प्रसाद की बेटी किशोरी देवी से हुआ। वो भी तब जब पत्नी के साथ एक छत के नीचे रहते हुए भी उनकी व्यक्तिगत ज़िंदगी एकाकी ही बीती। युवावस्था में हुआ उनका विवाह उनके लिए जीवन की सबसे कष्टप्रद घटना थी।

सुनते हैं इश्क़ नाम के गुजरे हैं इक बुजुर्ग
हम लोग भी मुरीद इसी सिलसिले के हैं

व्यक्तित्व
फ़िराक़ जी का विवाह 29 जून, 1914 को प्रसिद्ध ज़मींदार विन्देश्वरी प्रसाद की बेटी किशोरी देवी से हुआ। वो भी तब जब पत्नी के साथ एक छत के नीचे रहते हुए भी उनकी व्यक्तिगत ज़िंदगी एकाकी ही बीती। युवावस्था में हुआ उनका विवाह उनके लिए जीवन की सबसे कष्टप्रद घटना थी।

सुनते हैं इश्क़ नाम के गुजरे हैं इक बुजुर्ग
हम लोग भी मुरीद इसी सिलसिले के हैं

व्यक्तित्व
फ़िराक़ का व्यक्तित्व बहुत जटिल था। 'तद्भव' के सातवें अंक में फ़िराक गोरखपुरी पर 'विश्वनाथ त्रिपाठी' ने बहुत विस्तार से संस्मरण लिखा है। फिराक साहब मिलनसार थे, हाजिरजवाब थे और विटी थे। अपने बारे में तमाम उल्टी-सीधी बातें खुद करते थे। उनके यहाँ उनके द्वारा ही प्रचारित चुटकुले आत्मविज्ञापन प्रमुख हो गये । अपने दु:ख को बढ़ा-चढ़ाकर बताते थे। स्वाभिमानी हमेशा रहे। पहनावे में अजीब लापरवाही झलकती थी- 'टोपी से बाहर झाँकते हुये बिखरे बाल, शेरवानी के खुले बटन,ढीला-ढाला(और कभी-कभी बेहद गंदा और मुसा हुआ) पैजामा, लटकता हुआ इजारबंद, एक हाथ में सिगरेट और दूसरे में घड़ी, गहरी-गहरी और गोल-गोल- डस लेने वाली-सी आँखों में उनके व्यक्तित्व का फक्कड़पन खूब जाहिर होता था।'
लेकिन बीसवीं सदी के इस महान् शायर की गहन गंभीरता और विद्वता का अंदाज़उनकी शायरी से ही पता चलता है। जब वे लिखते हैं :-
जाओ न तुम हमारी इस बेखबरी पर कि हमारे
हर ख्‍़वाब से इक अह्‌द की बुनियाद पड़ी है।
फिराक साहब की कविता में सौन्दर्य के बड़े कोमल और अछूते अनुभव व्यक्त हुये हैं। एक शेर है:-
किसी का यूँ तो हुआ कौन उम्र भर फिर भी
ये हुस्नों इश्क धोखा है सब मगर फिर भी।
1962 की चीन की लड़ाई के समय फिराक साहब की यह गजल बहुत मशहूर हुई:-
सुखन की शम्मां जलाओ बहुत उदास है रात
नवाए मीर सुनाओ बहुत उदास है रात
कोई कहे ये खयालों और ख्वाबों से
दिलों से दूर न जाओ बहुत उदास है रात
पड़े हो धुंधली फिजाओं में मुंह लपेटे हुये

सितारों सामने आओ बहुत उदास है रात।
शायद अपने जीवन के आखिरी दिनों में फिराक साहब ने लिखा:-
अब तुमसे रुख़सत होता हूँ आओ सँभालो साजे़- गजल,
नये तराने छेडो़, मेरे नग्‍़मों को नींद आती है।
अपने बारे में अपने ख़ास अंदाज़में लिखते हुये फिराक साहब ने लिखा था:-
आने वाली नस्लें तुम पर रश्क करेंगी हमअस्रों
जब ये ख्याल आयेगा उनको, तुमने फ़िराक़ को देखा था

आन्दोलन में भागेदारी
इसी बीच देश की आज़ादी के लिए संघर्षरत राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने 'असहयोग आन्दोलन' छेड़ा तो फ़िराक़ गोरखपुरी ने अपनी नौकरी त्याग दी और आन्दोलन में कूद पड़े। उन्हें गिरफ्तार किया गया और डेढ़ साल की सज़ा भी हुई। जेल से छूटने के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 'अखिल भारतीय कांग्रेस' के दफ्तर में 'अण्डर सेक्रेटरी' की जगह पर उन्हें रखवा दिया। बाद में नेहरू जी के यूरोप चले जाने के बाद उन्होंने कांग्रेस का 'अण्डर सेक्रेटरी' का पद छोड़ दिया। इसके बाद 'इलाहाबाद विश्वविद्यालय' में वर्ष 1930 से लेकर 1959 तक अंग्रेज़ी के अध्यापक रहे।अंग्रेजो को अंग्रेजी सिखाते थे।

Friday, August 23, 2024

कल्याण जी आनंद जी 🎂02 मार्च

#24aug #30jun #02मार्च आनंद जी
कल्याणजी (संगीतकार)
कल्याणजी
पूरा नाम कल्याणजी वीरजी शाह
प्रसिद्ध नाम कल्याणजी
🎂जन्म 30 जून, 1928
जन्म भूमि कच्छ, गुजरात
⚰️मृत्यु 24 अगस्त, 2000
और उनके भाई आनंद वीर जी शाह(जन्म 02 मार्च 1933) अभी जीवित चल रहे है।
अभिभावक पिता- वीरजी शाह
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र भारतीय सिनेमा
मुख्य रचनाएँ 'उपकार', 'छलिया', 'हिमालय की गोद में', 'पूरब-पश्चिम', 'सट्टा बाज़ार', 'सच्चा झूठा' तथा 'जॉनी मेरा नाम' आदि।
पुरस्कार-उपाधि 1968 तथा 1974 में सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का 'राष्ट्रीय पुरस्कार' तथा 'फ़िल्म फेयर पुरस्कार', 'पद्मश्री' (1992)
प्रसिद्धि संगीतकार
नागरिकता भारतीय
संबंधित लेख कल्याणजी आनंदजी, हेमंत कुमार, सचिन देव बर्मन, मदन मोहन, नौशाद
अन्य जानकारी कल्याणजी ने हेमंत कुमार के सहायक के तौर पर फ़िल्मी दुनिया में कदम रखा था और वर्ष 1954 में आई फ़िल्म ‘नागिन’ के गीतों के कुछ छंद संगीतबद्ध किए थे।
कल्याणजी वीरजी शाह
जन्म- 30 जून, 1928, कच्छ, गुजरात; मृत्यु- 24 अगस्त, 2000) हिन्दी सिनेमा के प्रसिद्ध संगीतकार थे। वे भारतीय हिन्दी फ़िल्मों की प्रसिद्ध संगीतकार जोड़ी 'कल्याणजी आनंदजी' में से एक थे। कल्याणजी ने हेमंत कुमार के सहायक के तौर पर फ़िल्मी दुनिया में कदम रखा था और वर्ष 1954 में आई फ़िल्म ‘नागिन’ के गीतों के कुछ छंद संगीतबद्ध किए थे। भारतीय फ़िल्मों में इलेक्ट्रॉनिक संगीत की शुरुआत करने का श्रेय कल्याणजी को ही जाता है। वर्ष 1992 में संगीत के क्षेत्र में बहुमूल्य योगदान के लिए उन्हें भारत सरकार ने 'पद्मश्री' से सम्मानित किया था।

जन्म
कल्याणजी का जन्म 30 जून, सन 1928 ई. में गुजरात के कच्छ ज़िले में कुण्डरोडी नामक स्थान पर हुआ था। इनके पिता का नाम वीरजी शाह था। कल्याणजी बचपन से ही संगीतकार बनने का सपना देखा करते थे; हालांकि उन्होंने किसी उस्ताद से संगीत की शिक्षा नहीं ली थी। अपने इसी सपने को पूरा करने के लिये वे बाद में मुंबई आ गए थे।

संगीत की दुनिया से जुड़ाव
हिन्दी फ़िल्म जगत् की सफल संगीतकार जोड़ियों में से एक कल्याणजी आनंदजी अपनी किराने की दुकान पर नून तेल बेचते हुए ही जिंदगी गुजार देते, अगर एक तंगहाल ग्राहक ने उधारी चुकाने के बदले दोनों को संगीत की तालीम देने की पेशकश न की होती। वीरजी शाह का परिवार कच्छ से मुंबई आ गया था और आजीविका चलाने के लिए किराने की दुकान खोल ली। एक ग्राहक दुकान से सामान तो लेता था, लेकिन पैसे नहीं चुका पाता था।

वीरजी ने एक दिन जब उससे तकाजा किया तो उसने उधारी चुकाने के लिए वीरजी के दोनों बेटों कल्याणजी और आनंदजी को संगीत सिखाने का जिम्मा संभाला और इस तरह उधारी के पैसे से एक ऐसी संगीतकार जोड़ी की नींव पड़ी, जिसने अपने संगीत से हिन्दी फ़िल्म जगत् को हमेशा के लिए अपना कर्जदार बना लिया। हालाँकि उधारी के संगीत के उन गुरुजी को सुर और ताल की समझ कुछ खास नहीं थी, लेकिन उन्होंने वीरजी के पुत्रों कल्याणजी और आनंदजी में संगीत की बुनियादी समझ ज़रूर पैदा कर दी। इसके बाद संगीत में दोनों की रुचि बढ़ने लगी और दोनों भाई संगीत की दुनिया से जुड़ गए।

हेमंत कुमार के सहायक
कल्याणजी ने हेमंत कुमार के सहायक के तौर पर फ़िल्मी दुनिया में कदम रखा था और वर्ष 1954 में आई फ़िल्म ‘नागिन’ के गीतों के कुछ छंद संगीतबद्ध किए थे। भारतीय फ़िल्मों में इलेक्ट्रॉनिक संगीत की शुरुआत करने का श्रेय भी कल्याणजी को ही जाता है। कल्याणजी-आनंदजी की जोड़ी ने लगातार तीन दशकों 1960, 1970 और 1980 तक हिन्दी सिनेमा पर राज किया।

कल्याणजी ने कल्याणजी वीरजी के नाम से अपना ऑर्केस्ट्रा ग्रुप शुरू किया और मुंबई तथा उससे बाहर अपने संगीत शो आयोजित करने लगे। इसी दौरान वे फ़िल्म संगीतकारों के संपर्क में भी आए। इसके बाद दोनों भाई हिन्दी फ़िल्म जगत् के उस क्षेत्र में पहुँच गए, जहाँ सचिन देव बर्मन, मदन मोहन, हेमंत कुमार, नौशाद और रवि जैसे संगीतकारों के नाम की तूती बोलती थी। शुरू में कल्याणजी ने कल्याणजी वीरजी शाह के नाम से फ़िल्मों में संगीत देना शुरू किया और 'सम्राट चंद्रगुप्त' (1959) उनके संगीत से सजी पहली फ़िल्म थी। इसी साल आनंदजी भी उनके साथ जुड़ गए और कल्याणजी आनंदजी नाम से एक अमर संगीतकार जोड़ी बनी। कल्याणजी आनंदजी ने 1959 में फ़िल्म ‘सट्टा बाज़ार’ और ‘मदारी’ का संगीत दिया, जबकि 1961 में ‘छलिया’ का संगीत दिया। फ़िल्म 'छलिया' में उनके संगीत से सजा गीत "डम डम डिगा डिगा" और "छलिया मेरा नाम" श्रोताओं के बीच आज भी लोकप्रिय हैं।

वर्ष 1965 में प्रदर्शित संगीतमय फ़िल्म 'हिमालय की गोद में' की सफलता के बाद कल्याणजी-आनंदजी शोहरत की बुलंदियों पर जा पहुंचे। मनोज कुमार की फ़िल्म 'उपकार' में उन्होंने 'कसमे वादे प्यार वफा' जैसा दिल को छू लेने वाला संगीत देकर श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। इसके अलावा मनोज कुमार की ही फ़िल्म 'पूरब और पश्चिम' के लिए भी कल्याणजी ने 'दुल्हन चली वो पहन चली तीन रंग की चोली' और 'कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे' जैसा
सदाबहार संगीत देकर अलग ही समां बांध दिया। 1970 में विजय आनंद निर्देशित फ़िल्म 'जॉनी मेरा नाम' में 'नफरत करने वालों के सीने में प्यार भर दूं' और 'पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले' जैसे गीतों के लिए रूमानी संगीत देकर कल्याणजी-आनंदजी ने श्रोताओं का दिल जीत लिया। मनमोहन देसाई के निर्देशन में फ़िल्म 'सच्चा झूठा' के लिये कल्याणजी-आनंदजी ने बेमिसाल संगीत दिया। 'मेरी प्यारी बहनियाँ बनेगी दुल्हनियाँ' को आज भी शहरों और देहातों में विवाह आदि के मौके पर सुना जा सकता है।

पुरस्कार तथा सम्मान
वर्ष 1968 में प्रदर्शित फ़िल्म 'सरस्वती चंद्र' के लिए कल्याणजी आनंदजी को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार के 'राष्ट्रीय पुरस्कार' के साथ-साथ 'फ़िल्म फेयर पुरस्कार' भी दिया गया। इसके अलावा 1974 में प्रदर्शित फ़िल्म 'कोरा काग़ज़' के लिए भी कल्याणजी आनंदजी को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का 'फ़िल्म फेयर पुरस्कार' मिला। कल्याणजी ने अपने सिने करियर में लगभग 250 फ़िल्मों में संगीत दिया। वर्ष 1992 में संगीत के क्षेत्र में बहुमूल्य योगदान के लिए उन्हें भारत सरकार ने 'पद्मश्री' से सम्मानित किया।

निधन
लगभग चार दशक तक अपने जादुई संगीत से श्रोताओं को भावविभोर करने वाले कल्याणजी 24 अगस्त, 2000 को इस दुनिया को अलविदा कह गए।

🎥उनके फिल्मी गीत🎙️

उनके गाने बार-बार बिनाका गीतमाला की शीर्ष लोकप्रियता रेटिंग में शामिल हुए और कई बार सूची में शीर्ष पर रहे। गीत शीर्षक के अनुसार उनकी कुछ उल्लेखनीय रचनाएँ इस प्रकार हैं:


"आँखों आँखों में हम तुम" ( महल , 1969)

"आज कल हम से रूठे हुए हैं सनम" ( आमने सामने , 1967)

"आज की रात साजन" ( विश्वास , 1969) 

"आओ तुम्हें मैं प्यार सिखा दूं" ( उपासना , 1971)

"आप से हमको बिछड़े हुए" ( विश्वास , 1969)

"अकेले है चले आओ" ( राज़ , 1967)

"अँखियों का नूर है तू" ( गोवा में जौहर महमूद , 1965)

"अपनी तो जैसे तैसे" ( लावारिस , 1978) 

"अरे दीवानो मुझे पहचानो" ( डॉन , 1978)

"अरे हुस्न चला कुछ ऐसी" ( ब्लफ़मास्टर , 1963) 

"अरे ओह रे, धरती की तरह" ( सुहाग रात , 1968)

"और इस दिल में क्या" ( इमानदार , 1987)

"अरे रफ़्ता रफ़्ता देखो मेरी" ( कहानी किस्मत की , 1973)

"बड़ी दूर से आये हैं" ( समझौता , 1973)

"बन के साथी प्यार की रहो में" ( जानेमन , 1971)

"बेखुदी में सनम" ( हसीना मान जाएगी , 1968)

"भारत का रहनेवाला हूँ" ( पूरब और पश्चिम , 1970)

"बिना बदरा के बिजुरिया" ( बंधन , 1969)

"बुरे भी हम भले भी हम" ( बनारसी बाबू , 1973)

"चाहे आज मुझे ना पसंद करो" ( दरिंदा , 1977)

"चाहे पास हो" ( सम्राट चंद्रगुप्त , 1959)

"चांद आहेन भरेगा" ( फूल बने अंगारे , 1963)

"चंदन सा बदन" ( सरस्वतीचंद्र , 1968) 

"चाँद सी मेहबूबा" ( हिमालय की गोद में , 1965)

"चाँदी की देवर ना तोड़ी" ( विश्वास , 1969)

"चले द साथ मिलकर" ( हसीना मान जाएगी , 1968)

"छलिया मेरा नाम" ( छलिया , 1960) 

"छुक छुक" ( रफू चक्कर , 1975)

"छोटी सी उमर में लग" ( बैराग , 1976)

"चुपके से दिल दाई दे" ( मर्यादा , 1971)

"डैम डैम डिगा डिगा" ( छलिया , 1960)

"दर्पण को देखा" ( उपासना , 1971)

"धीरे रे चलो गोरी" ( गोवा में जौहर महमूद , 1965)

"दिल बेकरार सा है" ( इशारा , 1964)

"दिल जालों का दिल जलाके" ( ज़ंजीर , 1973)

"दिल को देखो चेहरा ना देखो" ( सच्चा झूठा , 1970) 

"दिल लूटनेवाले जादूगर" ( मदारी , 1959)

"दिल ने दिल से" ( रखवाला , 1971)

"दिल तो दिल है" ( कब क्यों और कहाँ , 1970)

"दिलवाला दीवाना मुतवाला मस्ताना" ( प्रोफेसर प्यारेलाल , 1981)

"दो बेचारे बिना सहारे" ( विक्टोरिया नंबर 203 , 1972)

"दो कदम तुम भी चलो" ( एक हसीना दो दीवाने , 1971)

"दुल्हन चली" ( पूरब और पश्चिम , 1970)

"दुनिया में प्यार की सब को" ( सच्चा झूठा , 1970) 

"दुनिया मुझे कहती है कि पीना छोड़ दे" ( कहानी किस्मत की , 1973)

"एक बात पूछू दिल की बात" ( कठपुतली , 1971)

"एक से बढ़कर एक" ( एक से बढ़कर एक , 1976)

"एक तारा बोले" ( यादगार , 1970)

"एक था गुल और एक थी" ( जब जब फूल खिले , 1965) 

"एक तू ना मिला", ( हिमालय की गोद में , 1965)

"गा गा गा गए जा" ( प्रोफेसर प्यारेलाल , 1981)

"गली गली में" ( त्रिदेव , 1989) केएफजी

"गंगा मैया में जब तक" ( सुहाग रात , 1968)

"गज़ार ने किया है इशारा ( त्रिदेव , 1989) अज़हर (फ़िल्म)

"घोड़ी पे हो के सवार" ( गुलाम बेगम बादशाह , 1973)

"गोविंदा आला रे आला" ( ब्लफ़ मास्टर , 1963) 

"गुणी जानो भक्त जानो" ( अंशु और मुस्कान , 1970)

"हर किसिको नहीं मिलता" ( जांबाज , 1986) 

"हे रे कन्हैया" ( छोटी बहू , 1971)

"हम बोलेगा तो बोलोगे की" ( कसौटी , 1974)

"हम छोड़ चले हैं महफ़िल को" ( जी चाहता है , 1964)

"हमारे सिवा तुम्हारे और कितने दीवाने" ( अपराध , 1972)

"हम को मोहब्बत हो गई है" ( हाथ की सफाई , 1974)

"हम जिनके सहारे" ( सफ़र , 1970)

"हमसफ़र अब ये सफ़र का" ( जुआरी , 1968)

"हमसफ़र मेरे हमसफ़र" ( पूर्णिमा , 1965)

"हमने तुझको प्यार किया है" ( दूल्हा दुल्हन , 1964)

"हमने आज से तुम्हें ये नाम दे दिया" ( राजा साहब , 1969)

"हो गए हम आपके कसमसे" ( बॉम्बे 405 माइल्स , 1981)

"हुस्ना के लाखों रंग" ( जॉनी मेरा नाम , 1970)

"जा रे जा ओ हरजाई" ( कालीचरण , 1976)

"जीवन से भरी तेरी आँखें" ( सफ़र , 1970)

"जिसके सपने हमें रोज़ आते हैं ( गीत , 1971)

"जिस दिल में बसा था प्यार तेरा" ( सहेली , 1965)

"जिस पथ पे चला" ( यादगार , 1970)

"जो प्यार तूने मुझको दिया था" ( दूल्हा दुल्हन , 1964)

"जो तुमको हो पसंद वही बात करेंगे" ( सफ़र , 1970) 

"जो तुम हंसोगे तो" ( कठपुतली , 1971)

"जुबां पर दर्दभरी दास्तां" ( मर्यादा , 1971)

"कांकरिया मार के जगाया" ( हिमालय की गोद में , 1965)

"कभी रात दिन हम दूर थे" ( आमने सामने , 1978)

"करले प्यार करले आंखें चार" ( सच्चा झूठा , 1970) 

"कसम ना लो कोई हमसे" ( बॉम्बे 405 माइल्स , 1981)

"कौन रहा है कौन रहेगा" ( संकोच , 1976)

"खइके पान बनारसवाला" ( डॉन , 1978) 

"खाई थी कसम" ( दिल ने पुकारा , 1967)

"खुश रहो हर ख़ुशी हे" ( सुहाग रात , 1968)

"किसी राह में किसी मोड़ पर" ( मेरे हमसफ़र , 1970)

"कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे" ( पूरब और पश्चिम , 1970)

"कोई कोई आदमी दीवाना होता है" ( जानेमन , 1971)

"कोई कोई रात ऐसी होती है" ( बनारसी बाबू , 1973)

"कूब के बिछड़े हुए" ( लावारिस , 1981) 

"क्या हुआ क्या नहीं" ( युद्ध , 1985)

"क्या ख़ूब लगती हो" ( धर्मात्मा , 1975)

"लैला ओ लैला" ( कुर्बानी , 1980)

"ले चल मेरे जीवन साथी" ( विश्वास , 1969) 

"लुक छिप लुक छिप जाओना" ( दो अंजाने , 1976)

"मैं तो एक ख्वाब हूं" ( हिमालय की गोद में , 1965)

"मैं बैरागी नाचूँ गाऊँ" ( बैराग , 1976)

"मैं डूब जाता हूं" ( ब्लैक मेल , 1973)

"मैं प्यासा तुम सावन" ( फरार , 1975)

"मैं तेरी मोहब्बत में" ( त्रिदेव , 1989)

"मैं तो भूल चली बाबुल का देश" ( सरस्वतीचंद्र , 1968) 

"मैं तुझे मिलने आयी मंदिर" ( हीरा , 1973)

"मेरे देश की धरती" ( उपकार , 1967) 

"मेरे दिल ने जो माँगा" ( रखवाला , 1971)

मेरा जीवन कोरा कागज ( कोरा कागज , 1973) - इस साउंडट्रैक ने फिल्मफेयर पुरस्कार जीता और वर्ष 1974 के लिए बिनाका गीतमाला में शीर्ष स्थान हासिल किया। 

"मेरी लॉटरी लग" ( होली आई रे , 1970)

"मेरे मितवा मेरे मीत रे" ( गीत , 1970)

"मेरे टूटे हुए दिल से" ( छलिया , 1960)

"मेरी जान कुछ भी लीजिए" ( छलिया , 1960) 

"मेरी प्यारी बहनिया" ( सच्चा झूठा , 1970)

"मिले मिले दो बदन" ( ब्लैक मेल , 1973)

"मुझे कहते है कल्लू कवल" ( दूल्हा दुल्हन , 1964)

"मुझको इस रात की तन्हाई में आवाज़ ना दो" ( दिल भी तेरा हम भी तेरे , 1960) 

"माई गुरु" ( थिकॅर दैन वॉटर , 2003)

"ना ना करते प्यार तुम्हीं से" ( जब जब फूल खिले , 1965)

"नफ़रत करने वालों के" ( जॉनी मेरा नाम , 1970)

"ना कोई रहा है ना कोई रहेगा" ( गोवा में जौहर महमूद , 1965)

"नैनों में निंदिया है" ( जोरू का गुलाम , 1972)

"नज़र का झुक जाना" ( पासपोर्ट , 1961)

"ओ दिलबर जानिये" ( हसीना मान जायेगी , 1968)

"ओ मेरे राजा" ( जॉनी मेरा नाम , 1970)

ओ नींद ना मुझको आये ( पोस्ट बॉक्स 999 , 1958)

ओ साथी रे तेरे बिना भी क्या जीना ( मुकद्दर का सिकंदर , 1978)

"ओ तुमसे दूर रहके" ( अदालत , 1976)

"पल पल दिल के पास" ( ब्लैक मेल , 1973)

"पल भर के लिए" ( जॉनी मेरा नाम , 1970)

"परदेसियों से अखियाँ मिलाना" ( जब जब फूल खिले , 1965) 

"पीने ​​वालो को पीने का बहाना" ( हाथ की सफाई , 1974)

"पीते-पीते कभी-कभी" ( बैराग , 1976)

"फूल तुम्हें भेजा है ख़त मैं" ( सरस्वतीचंद्र , 1968)

"प्रिय प्राणेश्वरी" ( हम तुम और वो , 1971)

"प्यार तो एक दिन होना था" ( एक श्रीमान एक श्रीमती , 1969)

"प्यार से दिल भर दे" ( कब क्यों और कहाँ , 1970)

"क़स्मे वादे प्यार वफ़ा" ( उपकार , 1967)

"रफ़्ता राफ़्ता देखो मेरी" ( कहानी किस्मत की , 1973)

"रहने दो रहने दो, गइल शिकवे" ( रखवाला , 1971)

"साज़-ए-दिल छेड़ दे" ( पासपोर्ट , 1961)

"सबके रहते लगता है जैसे" ( समझौता , 1973)

"समझौता गेमों से कार्लो" ( समझौता , 1973)

"सलाम-ए-इश्क मेरी जान" ( मुकद्दर का सिकंदर 1978) 

"समा हे सुहाना सुहाना" ( घर घर की कहानी , 1970)

"सुख के सब साथी" ( गोपी , 1970)

"तेरा साथ कितना प्यारा" ( जांबाज , 1986)

"तेरे चेहरे में वो" ( धर्मात्मा , 1975)

"तेरे होठों के दो फूल" ( पारस , 1971)

"तेरे नैना क्यों भर आये" ( गीत , 1971)

"तेरी रहो मैं खड़े है दिल थाम के" ( छलिया , 1960)

"तेरी जुल्फें परेशां" ( प्रीत ना जाने रीत , 1963)

"थोड़ा सा ठहरो" ( विक्टोरिया नं. 203 , 1973)

"तिरची टोपीवाले" ( त्रिदेव , 1989)

"तुम को मेरे दिल ने पुकारा" ( रफू चक्कर , 1975)

"तुम मिले प्यार से" ( अपराध , 1972)

"तुम से दूर रह के" ( अदालत , 1976)

"तू क्या जाने" ( हादसा , 1983)

"तू क्या जाने वफ़ा ओ बेवफ़ा" ( हाथ की सफाई , 1974)

"तू ना मिलि तो हम जोगी बाण जायेंगे" ( विक्टोरिया नंबर 203 , 1972)

"तू यार है मेरा" ( कहानी किस्मत की , 1973)

"वादा कर ले सजना" ( हाथ की सफाई , 1974)

"वक्त करता जो वफ़ा" ( दिल ने पुकारा , 1967)

यारी है ईमान मेरा ( जंजीर , 1973)

"ये बॉम्बे सहर है हादसा" ( हादसा , 1983)

"ये दुनियावाले पूछेंगे" ( महल ), 1969) 

"ये मेरा दिल" ( डॉन , 1978)

"ये रात है प्यासी प्यासी" ( छोटी बहू , 1971)

"ये समा, समा है ये प्यार का" ( जब जब फूल खिले , 1965) 

"योग करो योग योग" ( हादसा , 1983)

"ये दो दीवाने दिलके, चले" ( गोवा में जौहर महमूद , 1965)

"ये वादा रहा" ( प्रोफेसर प्यारेलाल , 1981)

"यूंही तुम मुझसे बात करती हो" ( सच्चा झूठा , 1970) 

"युद्ध कर" ( युद्ध , 1985)

"ज़िंदगी का सफ़र है ये कैसा सफ़र" ( सफ़र , 1970)

"जुबान पर दर्द भरी दास्तान" ( मर्यादा , 1971)


Tuesday, August 20, 2024

शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खान

#21aug 
#21march 
उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ
🎂जन्म 21 मार्च 1916
जन्म भूमि डुमरांव, बिहार
⚰️मृत्यु 21 अगस्त, 2006 (90 वर्ष)
अभिभावक पैंगबर ख़ाँ
कर्म भूमि बनारस
कर्म-क्षेत्र शहनाई वादक
मुख्य फ़िल्में ‘सन्नादी अपन्ना’ (कन्नड़), ‘गूंज उठी शहनाई’ और ‘जलसाघर’ (हिंदी)
विद्यालय 'बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय' और 'शांतिनिकेतन'
पुरस्कार-उपाधि 'भारत रत्न', 'रोस्टम पुरस्कार', 'पद्म श्री', 'पद्म भूषण', 'पद्म विभूषण', 'तानसेन पुरस्कार'
विशेष योगदान 1947 में आजादी की पूर्व संध्या पर जब लालकिले पर देश का झंडा फहरा रहा था, तब बिस्मिल्लाह ख़ाँ की शहनाई भी वहाँ आज़ादी का संदेश बाँट रही थी। तब से लगभग हर साल 15 अगस्त को प्रधानमंत्री के भाषण के बाद बिस्मिल्लाह ख़ाँ का शहनाई वादन एक प्रथा बन गयी।
नागरिकता भारतीय
उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ 
🎂 जन्म- 21 मार्च, 1916, बिहार;⚰️ मृत्यु- 21 अगस्त, 2006) 'भारत रत्न' से सम्मानित प्रख्यात शहनाई वादक थे। सन 1969 में 'एशियाई संगीत सम्मेलन' के 'रोस्टम पुरस्कार' तथा अनेक अन्य पुरस्कारों से सम्मानित बिस्मिल्लाह खाँ ने शहनाई को भारत के बाहर एक विशिष्ट पहचान दिलवाने में मुख्य योगदान दिया। वर्ष 1947 में देश की आज़ादी की पूर्व संध्या पर जब लालकिले पर भारत का तिरंगा फहरा रहा था, तब बिस्मिल्लाह ख़ान की शहनाई भी वहाँ आज़ादी का संदेश बाँट रही थी। तब से लगभग हर साल 15 अगस्त को प्रधानमंत्री के भाषण के बाद बिस्मिल्लाह ख़ान का शहनाई वादन एक प्रथा बन गयी।

जीवन परिचय

बिस्मिल्लाह ख़ाँ का जन्म 21 मार्च, 1916 को बिहार के डुमरांव नामक स्थान पर हुआ था। उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ विश्व के सर्वश्रेष्ठ शहनाई वादक माने जाते थे। उनके परदादा शहनाई नवाज़ उस्ताद सालार हुसैन ख़ाँ से शुरू यह परिवार पिछली पाँच पीढ़ियों से शहनाई वादन का प्रतिपादक रहा है। बिस्मिल्लाह ख़ाँ को उनके चाचा अली बक्श 'विलायतु' ने संगीत की शिक्षा दी, जो बनारस के पवित्र विश्वनाथ मन्दिर में अधिकृत शहनाई वादक थे।

नामकरण तथा शिक्षा

उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ के नाम के साथ एक दिलचस्प वाकया भी जुड़ा हुआ है। उनका जन्म होने पर उनके दादा रसूल बख्श ख़ाँ ने उनकी तरफ़ देखते हुए 'बिस्मिल्ला' कहा। इसके बाद उनका नाम 'बिस्मिल्ला' ही रख दिया गया। उनका एक और नाम 'कमरूद्दीन' था। उनके पूर्वज बिहार के भोजपुर रजवाड़े में दरबारी संगीतकार थे। उनके पिता पैंगबर ख़ाँ इसी प्रथा से जुड़ते हुए डुमराव रियासत के महाराजा केशव प्रसाद सिंह के दरबार में शहनाई वादन का काम करने लगे। छह साल की उम्र में बिस्मिल्ला को बनारस ले जाया गया। यहाँ उनका संगीत प्रशिक्षण भी शुरू हुआ और गंगा के साथ उनका जुड़ाव भी। ख़ाँ साहब 'काशी विश्वनाथ मंदिर' से जुड़े अपने चाचा अली बख्श ‘विलायतु’ से शहनाई वादन सीखने लगे।

जटिल संगीत रचना

बिस्मिल्लाह ख़ाँ ने जटिल संगीत की रचना, जिसे तब तक शहनाई के विस्तार से बाहर माना जाता था, में परिवर्द्धन करके अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया और शीघ्र ही उन्हें इस वाद्य से ऐसे जोड़ा जाने लगा, जैसा किसी अन्य वादक के साथ नहीं हुआ। उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ाँ ने भारत के पहले गणतंत्र दिवस समारोह की पूर्व संध्या पर नई दिल्ली में लाल क़िले से अत्यधिक मर्मस्पर्शी शहनाई वादक प्रस्तुत किया।

उल्लेखनीय

उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ां पर जारी डाक टिकट
बिस्मिल्ला ख़ाँ ने 'बजरी', 'चैती' और 'झूला' जैसी लोकधुनों में बाजे को अपनी तपस्या और रियाज़ से ख़ूब सँवारा और क्लासिकल मौसिक़ी में शहनाई को सम्मानजनक स्थान दिलाया। इस बात का भी उल्लेख करना आवश्यक है कि जिस ज़माने में बालक बिस्मिल्लाह ने शहनाई की तालीम लेना शुरू की थी, तब गाने बजाने के काम को इ़ज़्जत की नज़रों से नहीं देखा जाता था। ख़ाँ साहब की माता जी शहनाई वादक के रूप में अपने बच्चे को कदापि नहीं देखना चाहती थीं। वे अपने पति से कहती थीं कि- "क्यों आप इस बच्चे को इस हल्के काम में झोक रहे हैं"।

उल्लेखनीय है कि शहनाई वादकों को तब विवाह आदि में बुलवाया जाता था और बुलाने वाले घर के आँगन या ओटले के आगे इन कलाकारों को आने नहीं देते थे। लेकिन बिस्मिल्लाह ख़ाँ साहब के पिता और मामू अडिग थे कि इस बच्चे को तो शहनाई वादक बनाना ही है। उसके बाद की बातें अब इतिहास हैं।


विदेशों में वादन

जितना भी कहूँगा बहुत कम होगा क्योंकि वो एक ऐसे इंसान थे जिन्होंने कभी दिखावे में यकीन नहीं किया। वो हमेशा सबको अच्छी राह दिखाते थे और बताते थे। वो ऑल इंडिया रेडियो को बहुत मानते थे और हमेशा कहा करते कि मुझे ऑल इंडिया रेडियो ने ही बनाया है। वो एक ऐसे फरिश्ते थे जो धरती पर बार-बार जन्म नहीं लेते हैं और जब जन्म लेते हैं तो अपनी अमिट छाप छोड़ जाते है।

मेरा मानना है कि उनका निधन नहीं हो सकता क्योंकि वो हमारी आत्मा में इस कदर रचे बसे हुए हैं कि उनको अलग करना नामुमकिन है।
हरिप्रसाद चौरसिया के श्रीमुख से
बाँसुरी वादक हरिप्रसाद चौरसिया का कहना है- बिस्मिल्ला ख़ाँ साहब भारत की एक महान् विभूति थे, अगर हम किसी संत संगीतकार को जानते है तो वो हैं बिस्मिल्ला खा़न साहब। बचपन से ही उनको सुनता और देखता आ रहा हूं और उनका आशीर्वाद सदा हमारे साथ रहा। वो हमें दिशा दिखाकर चले गए, लेकिन वो कभी हमसे अलग नहीं हो सकते हैं। उनका संगीत हमेशा हमारे साथ रहेगा। उनके मार्गदर्शन पर अनेक कलाकार चल रहे हैं। शहनाई को उन्होंने एक नई पहचान दी। शास्त्रीय संगीत में उन्होंने शहनाई को जगह दिलाई इससे बड़ी बात क्या हो सकती है। यह उनकी मेहनत और शहनाई के प्रति समर्पण ही था कि आज शहनाई को भारत ही नहीं बल्कि पूरे संसार में सुना और सराहा जा रहा है। उनकी कमी तो हमेशा ही रहेगी। मेरा मानना है कि उनका निधन नहीं हो सकता क्योंकि वो हमारी आत्मा में इस कदर रचे बसे हुए हैं कि उनको अलग करना नामुमकिन है।
सन 1956 में बिस्मिल्लाह ख़ाँ को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
सन 1961 में उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया।
सन 1968 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।
सन 1980 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।
2001 में उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
मध्य प्रदेश में उन्हें सरकार द्वारा तानसेन पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।
निधन
बिस्मिल्ला ख़ान ने एक संगीतज्ञ के रूप में जो कुछ कमाया था वो या तो लोगों की मदद में ख़र्च हो गया या अपने बड़े परिवार के भरण-पोषण में। एक समय ऐसा आया जब वो आर्थिक रूप से मुश्किल में आ गए थे, तब सरकार को उनकी मदद के लिए आगे आना पड़ा था। उन्होंने अपने अंतिम दिनों में दिल्ली के इंडिया गेट पर शहनाई बजाने की इच्छा व्यक्त की थी लेकिन उस्ताद की यह इच्छा पूरी नहीं हो पाई और 21 अगस्त, 2006 को 90 वर्ष की आयु में इनका देहावसान हो गया।

Sunday, August 18, 2024

उत्पल दत्त

#19aug 
#29march 
अन्य नाम उत्पल दा
उत्पल दत्त
🎂जन्म 29 मार्च, 1929
जन्म भूमि बारीसाल, पूर्वी बंगाल
⚰️मृत्यु 19 अगस्त, 1993
अभिभावक गिरिजारंजन दत्त
पति/पत्नी शोभा सेन
संतान बिष्णुप्रिया (पुत्री)
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र हिन्दी तथा बांग्ला सिनेमा
मुख्य फ़िल्में 'गोलमाल', 'सात हिन्दुस्तानी', 'रंग बिरंगी', 'अंगूर', 'कर्तव्य', 'ईमान धर्म', 'शुभ लग्न' आदि।
शिक्षा अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातक
विद्यालय 'सेंट जेवियर कॉलेज', कोलकाता
पुरस्कार-उपाधि 'फ़िल्म फ़ेयर बेस्ट कॉमेडियन अवार्ड', 'नेशनल फ़िल्म अवार्ड'।
प्रसिद्धि अभिनेता तथा फ़िल्म निर्देशक
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी 1940 में उत्पल दत्त अंग्रेज़ी थिएटर से जुड़े और अभिनय की शुरूआत कर दी। इस दौरान उन्होंने थिएटर कंपनी के साथ भारत और पाकिस्तान में कई नाटक मंचित किए। नाटक 'ओथेलो' से उन्हें काफ़ी वाहवाही मिली थी।
उत्पल दत्त (अंग्रेज़ी: Utpal Dutt ; जन्म- 29 मार्च, 1929, बारीसाल, पूर्वी बंगाल; मृत्यु- 19 अगस्त, 1993) भारतीय सिनेमा के ऐसे प्रसिद्ध अभिनेता थे, जिन्होंने हिन्दी और बांग्ला फ़िल्मों में अपनी अमिट छाप छोड़ी। एक अभिनेता के रूप में उत्पल दत्त ने लगभग हर किरदार को निभाया। हिन्दी पर्दे पर कभी पिता तो कभी चाचा, कहीं डॉक्टर तो कहीं सेठ, कभी बुरे तो बहुधा अच्छे बने 'उत्पल दा' को दर्शक किसी भी रूप में नहीं भूल सकेंगे। उत्पल दत्त को अधिकतर एक हास्य अभिनेता के रूप में याद किया जाता है। वर्ष 1979 की सुपरहिट फ़िल्म 'गोलमाल' में उनके द्वारा निभाया गया 'भवानी शंकर' का शानदार हास्य अभिनय आज भी याद किया जाता है। उत्पल दत्त एक उच्च दर्जे के अभिनेता ही नहीं, एक कुशल निर्देशक और नाटककार भी थे। सीरियल से लेकर कॉमेडी तक के हर रोल को उन्होंने बड़ी संजीदगी से निभाया था।
उत्पल दत्ता का जन्म 29 मार्च 1929 को बारीसाल में एक बंगाली कायस्थ परिवार में हुआ था । उनके पिता का नाम गिरिजरंजन दत्ता था। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय के सेंट जेवियर्स कॉलेज, कलकत्ता से अंग्रेजी साहित्य में ऑनर्स की डिग्री प्राप्त की।
19 अगस्त 1993 को,  दत्त की एसएसकेएम अस्पताल, कलकत्ता , पश्चिम बंगाल से घर लौटने के तुरंत बाद दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गई, जहां उनका डायलिसिस हुआ था।

🎥

यह उत्पल दत्त की अधूरी फिल्मोग्राफी है।

माइकल मधुसूदन (1950)
विद्यासागर (1950)
विक्रम उर्वशी (1954)
रानी रासमणि (1955)
ताका आना पे (1956)
सुभलग्ना (1956)
हरानो सुर (1957)
सप्तपदी (1961) (आवाज)
रक्त पलाश (1962)
शेष अंका (1963)
सूर्य शिखा (1963)
मोमर अलो (1964)
शेक्सपियर-वाला (1965)
चौरंगी (1968)
द गुरु (1969)
भुवन शोम (1969)
सात हिंदुस्तानी (1969)
बॉम्बे टॉकी (1970)
कलंकिता नायक (1970)
कलकत्ता 71 (1971)
गुड्डी (1971)
खुंजे बेराई (1971)
एक अधूरी कहानी (1972)
मेरे जीवन साथी (1972)
सबसे बड़ा सुख (1972)
हनीमून (1973)
मरजीना अब्दुल्ला (1973)
श्रीमान पृथ्वीराज (1973)
असाती (1974)
कोरस (1974)
मिस्टर रोमियो (1974)
जुक्ति, तक्को आर गप्पो (1974)
थगिनी (1974)
अमानुष (1975)
जूली (1975)
अनारी (1975)
पलंका (1975)
जन अरण्य (1976)
दत्ता (1976)
दो अनजाने (1976)
सनटैन (1976)
सेई चोख (1976)
शेक (1976)
कोतवाल साब (1977)
यही है जिंदगी (1977)
इम्मान धरम (1977) बलबीर सिंह, मिलिट्री मैन के रूप में
आनंद आश्रम (1977)
अनुरोध (1977)
दुल्हन वही जो पिया मन भाये (1977)
एक ही रास्ता
फरिश्ता या कातिल (1977)
किस्सा कुर्सी का (1977)
प्रियतमा (1977)
स्वामी (1977)
अतिथि (1978)
स्ट्राइकर (1978)
सफ़ेद हाथी (1978)
धनराज तमांग (1978)
जय बाबा फेलूनाथ (1978)
टूटे खिलोने (1978)
कर्तव्य (1979) दीवान धनपति राय के रूप में
गोलमाल (1979)
महान जुआरी (1979)
झोर (1979)
प्रेम विवाह (1979)
समझौता (1980)
हिरक राजार देशे (1980)
पाका देखा (1980)
अपने पराये (1980)
राम बलराम (1980)
अग्नि परीक्षा (1981)
नरम गरम (1981)
बरसात की एक रात (1981) उर्फ़ अनुसंधान (भारत: बंगाली शीर्षक)
चालचित्र (1981)
मेघमुक्ति (1981)
सुबर्ण गोलक (1981)
शौकीन (1981)
बैसाखी मेघ (1981) कर्नल मैनिंघम के रूप में
राजबाधु (1982)
रास्ते प्यार के (1982)
हमारी बहू अलका (1982)
अंगूर (1982)
अच्छा बुरा (1983)
रंग बिरंगी (1983)
दुती पाटा (1983)
किसी से ना कहना (1983)
पसंद अपनी अपनी (1983)
शुभ कामना (1983)
लव मैरिज (1984)
जॉन जानी जनार्दन (1984)
लाखों की बात (1984)
इंकलाब (1984)
पार (1984)
ये देश (1984)
साहेब (1985)
हरिश्चंद्र शैब्य (1985)
आर पार (1985)
अन्यय अभिचार (1985)
उल्टा सीधा (1985)
आप के साथ (1986)
बात बन जाए (1986)
किरायदार (1986)
मैं बलवान (1986)
पाठभोला (1986)
सदा सुहागन (1986)
किस्सा काठमांडू का (1986-1987, टीवी श्रृंखला)
प्यार के काबिल (1987)
आज का रॉबिन हुड (1987)
आशा ओ भालोबाशा (1988)
महावीर (1988)
ला नुइट बंगाली (1988)
बहुरानी (1989)
जवानी ज़िंदाबाद (1990)
मेरा पति सिर्फ मेरा है (1990)
आगन्तुक (1991)
जान पहचान (1991)
पथ-ओ-प्रसाद (1991)
पद्मा नादिर माझी (1992)
ब्योमकेश बक्शी (1993)
मिष्टी मधुर (1993)
अजान पथ (1994)
मेरा दामाद (1995) उनकी अंतिम फिल्म उनकी मृत्यु के 2 साल बाद रिलीज हुई

Wednesday, August 7, 2024

दादा कोंडके

#08aug 
#14march 
दादा कोंडके
कृष्णा कोंडके
🎂08 अगस्त 1932
बम्बई , बम्बई प्रेसीडेंसी , ब्रिटिश भारत
⚰️14 मार्च 1998 (आयु 65)
मुंबई , महाराष्ट्र , भारत
अन्य नामों
बापू
व्यवसायों
अभिनेतानिदेशकगीतकारलेखकगायक
सक्रिय वर्ष
1969–1997
जीवनसाथी
नलिनी कोंडके ​( विवाह  1960⁠–⁠1967 )

कोंडके का जन्म मुंबई के मोरबाग इलाके में एक किराने की दुकान और चॉल के मालिकों के परिवार में हुआ था, जिन्हें किराए पर दिया जाता था। उनके परिवार के सदस्य बॉम्बे डाइंग के मिलवर्कर्स को संभालने वाले फोरमैन भी थे। दादा कोंडके को सबसे ज़्यादा फ़िल्मों (नौ) के लिए गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज किया गया था, जिन्होंने सिल्वर जुबली (लगातार 25 हफ़्तों तक चलने वाली) हासिल की। ​​[2] [3] कोंडके को "दादा" कहा जाता था, जो एक सम्मानजनक मराठी शब्द है जिसका अर्थ है "बड़ा भाई", जिसके कारण उनका लोकप्रिय नाम दादा कोंडके पड़ा। उन्हें मराठी सिनेमा और भारतीय सिनेमा में सेक्स कॉमेडी की शैली शुरू करने का श्रेय दिया जाता है।
कोंडके का जन्म और पालन-पोषण मुंबई के लालबाग के पास नायगांव की एक चॉल में कपास-मिल श्रमिकों के कोली परिवार में हुआ था । उनका परिवार मूल रूप से इंगावली गाँव से था जो पुणे के पास तत्कालीन भोर राज्य में था । कोंडके और उनके प्रवासी परिवार ने अपनी ग्रामीण जड़ों से घनिष्ठ संबंध बनाए रखा। एक युवा के रूप में, कोंडके एक उग्र बालक थे, जिन्होंने बाद में अपना बाज़ार नामक एक स्थानीय किराना खुदरा श्रृंखला में नौकरी कर ली । उन्होंने दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं में अपने माता-पिता को खो दिया और शोक की प्रक्रिया ने उन्हें गहराई से बदल दिया। अपने बड़े भाई धोंडीराम और उनके परिवार के साथ उनकी देखभाल करने के लिए अकेले रह जाने के कारण, इन घटनाओं ने उन्हें जीवन के हल्के पक्ष पर अधिक ध्यान केंद्रित करने और लोगों को हंसाने के लिए प्रेरित किया। कोंडके ने एक बैंड के साथ अपने मनोरंजन करियर की शुरुआत की और फिर एक मंच अभिनेता के रूप में काम किया।
कोंडके कांग्रेस पार्टी के स्वयंसेवी संगठन सेवा दल की सांस्कृतिक गतिविधियों में शामिल थे, जहाँ उन्होंने नाटकों में काम करना शुरू किया। इस अवधि के दौरान लेखक वसंत सबनीस सहित विभिन्न मराठी मंच हस्तियों के संपर्क में आए । बाद में, कोंडके ने अपनी खुद की थिएटर कंपनी शुरू की, और सबनीस से उनके लिए एक नाटक की पटकथा लिखने के लिए संपर्क किया। सबनीस ने खानखानपुरचा राजा (अनुवाद: दिवालिया राजा ) में दादा के प्रदर्शन की सराहना की, और एक आधुनिक मराठी भाषा का तमाशा या लोकनाट्य ( लोक नाटक ) लिखने के लिए सहमत हुए। नाटक का नाम विच्छा माझी पूरी करा (अनुवाद: मेरी इच्छा पूरी करें ) रखा गया था। इस नाटक के पूरे महाराष्ट्र में 1500 से अधिक शो खेले गए और दादा को स्टार बना दिया।विच्छ माझी पूरी कारा ने कोंडके को सुर्खियों में ला दिया और 1969 में, उन्होंने भालजी पेंढारकर की फिल्म ताम्बड़ी माटी में एक भूमिका के माध्यम से मराठी फिल्मों में शुरुआत की, जिसने मराठी में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता। इसके बाद वे 1971 में सोंगद्या के साथ निर्माता बन गए।सोंगद्या वसंत सबनीस द्वारा लिखी गई कहानी पर आधारित थी , और गोविंद कुलकर्णी द्वारा निर्देशित थी। उन्होंने खुद को नम्या के रूप में कास्ट किया, जो एक साधारण व्यक्ति है, जो कलावती ( उषा चव्हाण द्वारा अभिनीत ) के आकर्षण के लिए गिर जाता है, जो एक नर्तकी है। इस फिल्म में प्रमुख किरदार निभाने वाले कुछ अन्य लोग नीलू फुले , गणपत पाटिल , संपत निकम और रत्नमाला थे । कोंडके ने सोंगद्या से अपनी टीम को बनाए रखा और अपनी अगली हिट एकता जीव सदाशिव दी ।  उदाहरण के लिए, कोंडके ने खुद को आली अंगावर में एक धोबी , सोंगद्या में एक गरीब किसान और पांडु हवलदार में एक पुलिस कांस्टेबल की भूमिका निभाई । कोंडके को अभिनेताओं, तकनीशियनों और पार्श्व गायकों की एक ही टीम का उपयोग करके सफलता का वही फार्मूला दोहराने के लिए जाना जाता है, जो उन्हें लगता था कि उन्हें अपनी पहली फिल्म से मिला था। "कामाक्षी पिक्चर्स" के बैनर तले निर्मित उनकी कई फिल्मों में उषा चव्हाण मुख्य अभिनेत्री के रूप में, राजेश मुजुमदार पटकथा लेखक ( पांडु हवलदार से आगे), राम लक्ष्मण संगीत निर्देशक, जयवंत कुलकर्णी और बाद में महेंद्र कपूर पुरुष पार्श्व गायक, उषा मंगेशकर महिला पार्श्व गायिका और बाल मोहिते मुख्य सहायक के रूप में थे। कोंडके ने अक्सर अनुभवी अभिनेता-नर्तक भगवान दादा को अपनी फिल्मों जैसे आली अंगावर , ह्योच नवरा पाहिजे , बोट लाविन टिथे गुडगुल्या और राम राम गंगाराम में नृत्य दृश्यों में काम दिया । अपने भतीजे विजय कोंडके, जिन्होंने बाद में ब्लॉकबस्टर फिल्म माहेरची सादी का निर्माण किया, और विजय के भाइयों के साथ मिलकर कोंडके परिवार अपने करियर के शिखर पर पहुंच गया और दादा के निधन तक एकजुट रहा।
जब देव आनंद की फिल्म तेरे मेरे सपने रिलीज हुई तो शिवसेना नेता बालासाहेब ठाकरे ने कोंडके की सोंगड्या की स्क्रीनिंग में मदद की और इसके चलते सिनेमाघरों ने सोंगड्या की जगह दूसरी फिल्में दिखानी शुरू कर दीं। इस कदम से मराठी भाषी फिल्म देखने वाले नाराज हो गए क्योंकि कई लोग कोंडके की फिल्म देखने के लिए उत्सुक थे। फिल्म बदलने की खबर सेना भवन तक पहुंची और एक बैठक के बाद पार्टी के सदस्यों और स्थानीय लोगों ने इस कदम का विरोध करने के लिए थिएटर तक मार्च किया। कोंडके का समर्थन करने के पीछे ठाकरे का तर्क था कि वह एक मराठी मानुस हैं । बदले में कोंडके ने गजानन शिर्के के साथ मिलकर चित्रपट शाखा की स्थापना में मदद की। कोंडके, ठाकरे के करिश्मे से प्रभावित हुए और उन्होंने मतदाताओं को शिवसेना की ओर आकर्षित करने के लिए महाराष्ट्र का दौरा किया था। कोंडके शिवसेना के बहुत सक्रिय सदस्य थे और अपनी लोकप्रियता और लोगों को प्रभावित करने के लिए जोशीले भाषण देने के तरीके के कारण ग्रामीण महाराष्ट्र के कई इलाकों को प्रभावित करने में सक्षम थे।
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1984 तेरे मेरे बीच में 
1985 खोल दे मेरी जुबान 
1986 अँधेरी रात में दिया तेरे हाथ में
1988 आगे की सोच
2000 ले चल अपने संग

सिद्धेश्वरी देवी

#08aug 
#17march 
सिद्धेश्वरी देवी
अन्य नाम गोनो
🎂 08 अगस्त, 1908
जन्म भूमि वाराणसी
⚰️17 मार्च, 1977
अभिभावक पिता: श्री श्याम तथा माता: श्रीमती चंदा उर्फ श्यामा थीं
संतान सविता देवी
कर्म भूमि मुम्बई
कर्म-क्षेत्र शास्त्रीय संगीत
पुरस्कार-उपाधि पद्मश्री
प्रसिद्धि गायिका
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी सिद्धेश्वरी देवी ने उषा मूवीटोन की कुछ फ़िल्मों में अभिनय भी किया पर शीघ्र ही वे समझ गयीं कि उनका क्षेत्र केवल गायन ही है।
 Siddheshwari
भारतीय शास्त्रीय संगीत की प्रसिद्ध गायिका थीं। तत्कालीन समय में जब नाचने व गानों वालों को अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता था और महिला कलाकारों को तो वेश्या ही मान लिया जाता था, ऐसे समय में सिद्धेश्वरी देवी ने अपनी कला के माध्यम से भरपूर मान और सम्मान अर्जित किया। उन्हें निर्विवाद रूप से ठुमरी गायन की साम्राज्ञी मान लिया गया था।

पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित सिद्धेश्वरी देवी का जन्म 8 अगस्त, 1908 को वाराणसी, उत्तर प्रदेश में हुआ था। उनके पिता श्री श्याम तथा माता श्रीमती चंदा उर्फ श्यामा थीं। जब ये डेढ़ वर्ष की थीं, तब उनकी माता का निधन हो गया। अतः उनका पालन उनकी नानी मैनाबाई ने किया, जो एक लोकप्रिय गायिका व नर्तकी थीं। सिद्धेश्वरी देवी का बचपन का नाम गोनो था। उन्हें सिद्धेश्वरी देवी नाम प्रख्यात विद्वान व ज्योतिषी पंडित महादेव प्रसाद मिश्र (बच्चा पंडित) ने दिया।

कॅरियर

सिद्धेश्वरी देवी को पहली बार 17 साल की अवस्था में सरगुजा के युवराज के विवाहोत्सव में गाने का अवसर मिला। उनके पास अच्छे वस्त्र नहीं थे। ऐसे में विद्याधरी देवी ने उन्हें वस्त्र दिये। वहां से सिद्धेश्वरी देवी का नाम सब ओर फैल गया। एक बार तो मुंबई के एक समारोह में वरिष्ठ गायिका केसरबाई उनके साथ ही उपस्थित थीं। जब उनसे ठुमरी गाने को कहा गया, तो उन्होंने कहा कि जहां ठुमरी साम्राज्ञी सिद्धेश्वरी देवी हों, वहां मैं कैसे गा सकती हूं।

सम्मान एवं पुरस्कार
सिद्धेश्वरी देवी को अपने जीवन काल बहुत-से पुरस्कार एवं सम्मान मिले हैं, जो इस प्रकार है-

भारत सरकार द्वारा पद्मश्री पुरस्कार (1966)
साहित्य कला परिषद सम्मान (उत्तर प्रदेश)
संगीत नाटक अकादमी सम्मान
केन्द्रीय संगीत नाटक अकादमी सम्मान

निधन

सिद्धेश्वरी देवी पर 26 जून, 1976 को पक्षाघात का आक्रमण हुआ और 17 मार्च, 1977 की प्रातः वे ब्रह्मलीन हो गयीं। उनकी पुत्री सविता देवी भी प्रख्यात गायिका हैं। उन्होंने अपनी मां की स्मृति में 'सिद्धेश्वरी देवी एकेडेमी ऑफ़ म्यूजिक' की स्थापना की है। इसके माध्यम से वे प्रतिवर्ष संगीत समारोह आयोजित कर वरिष्ठ संगीत साधकों को सम्मानित करती हैं।

Tuesday, August 6, 2024

केस्टो मुखर्जी

#07aug
#02march 
 केष्टो मुखर्जी 
🎂07 अगस्त 1925 
 ⚰️02 मार्च 1982
बच्चे: बबलू मुखर्जी
वह अभिनेता जो बॉलीवुड के आधिकारिक शराबी का पर्याय बन गया !!

 दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान, बॉलीवुड के सुपरस्टार होने के अलावा इन तीनों में एक और बात समान है और वह यह है कि ये तीनों कलाकार शराबी की भूमिका को शानदार ढंग से निभाने के लिए जाने जाते हैं! दिलीप कुमार और शाहरुख खान ने देवदास में अपनी भूमिकाओं के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार जीता है, जबकि शराबी के रूप में अमिताभ बच्चन की महारत को किसी प्रमाणन की आवश्यकता नहीं है! अमर अकबर एंथोनी में उनका मिरर एक्ट उनकी कला के बारे में बहुत कुछ बताता है, लेकिन भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक ऐसा अभिनेता भी है, जिसके शराबी के रूप में अभिनय ने फिल्म प्रेमियों को आश्चर्यचकित कर दिया है - हाँ, आपने सही अनुमान लगाया है - वह कोई और नहीं बल्कि केश्टो मुखर्जी हैं। वह अभिनेता जो बॉलीवुड के आधिकारिक शराबी का पर्याय बन गया !!
आश्चर्यजनक रूप से वास्तविक जीवन में एक शराबी (एक ऐसा व्यक्ति जो कभी शराब का सेवन नहीं करता)
केश्टो मुखर्जी ने एक शराबी अभिनय को इतनी भव्यता और अधिकार के साथ चित्रित किया कि अमिताभ बच्चन और शाहरुख खान जैसे अभिनेताओं ने भी उनके अभिनय को सलाम किया और खुले तौर पर उनके प्रदर्शन से प्रेरित होने की बात कबूल की। जिस चीज़ ने केस्टो को शराबी अभिनय के लिए प्रेरित किया, वह थी सहज हँसी के साथ उनकी अविश्वसनीय संवाद अदायगी - अरे अरे ! इसके अलावा, उसकी मासूम अभिव्यक्ति, उसकी आँखों की भेंगापन और उसके चेहरे पर लटकते बालों के पतले कर्ल ने केक पर चेरी जोड़ दी!!!
30 साल के करियर में उन्होंने शोले, पड़ोसन, बॉम्बे टू गाओ, केस्टो, चुपके-चुपके, चाचा भतीजा, आजाद, इंकार, गोल माल, खूबसूरत परिचय, आप की कसम आदि जैसी कई हिट फिल्में कीं। लिस्ट लंबी है।
1950केष्टो मुखर्जी की खोज फिल्म दिग्गज ऋत्विक घटक ने की थी
सत्यजीत रे और मृणाल सेन के साथ भारत में कला सिनेमा में क्रांति लाने वाले बंगाल फिल्म के दिग्गज ऋत्विक घटक ने वर्ष 1952 में केष्टो मुखर्जी की खोज की । यह फिल्म नागरिक, एक बंगाली फिल्म थी, जो भारतीय सिनेमा की पहली कला फिल्म थी। लेकिन अफ़सोस आर्थिक तंगी के कारण फिल्म में देरी हुई और 24 साल बाद 1977 में रिलीज़ हुई!!! इस प्रकार यह फिल्म केष्टो मुखर्जी के लिए बेकार साबित हुई । हालाँकि फ़िल्म रिलीज़ नहीं हुई, लेकिन फ़िल्म प्रतिभा ऋत्विक घटक के साथ काम करने की केष्टो मुखर्जी की योग्यता ने अद्भुत काम किया। फ़िल्म निर्माता उनके साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार करते थे!!
केष्टो मुखर्जी की प्रतिभा को हृषिकेश मुखर्जी ने पंख दिये
हृषिकेश मुखर्जी पहले फिल्म निर्माता थे जिन्होंने केष्टो मुखर्जी की कॉमेडी में विश्वास दिखाया और उन्हें अपनी दिलीप कुमार अभिनीत फिल्म मुसाफिर (1953) में एक छोटी सी कॉमेडी भूमिका दी। फिल्म औसत हिट रही लेकिन केष्टो मुखर्जी एक कुशल हास्य अभिनेता के रूप में अपना प्रभाव छोड़ने में सफल रहे। इसलिए हृषिकेश मुखर्जी ने उन्हें अपनी अगली राज कपूर अभिनीत फिल्म आशिक (1962 फिल्म) और देव आनंद अभिनीत असली नकली (1963) में दोहराया। दोनों ही फिल्में हिट रहीं. इस प्रकार हृषिकेश मुखर्जी और केष्टो मुखर्जी की कभी न खत्म होने वाली यात्रा शुरू हुई. दोनों ने मझली दीदी (1967) जैसी कई हिट फिल्मों में एक साथ काम किया।
चुपके चुपके (1975), गोल माल (1979), खुबसूरत (1980) आदि।
1960केष्टो मुखर्जी फिल्म दिग्गज बिमल रॉय के भी पसंदीदा बन गए
हृषिकेश मुखर्जी द्वारा अपनी सामाजिक ड्रामा फिल्मों में केष्टो मुखर्जी को मौका देने के बाद , अनुभवी फिल्म निर्माता बिमल रॉय केष्टो मुखर्जी की महारत और हंसी पैदा करने की उनकी जन्मजात प्रतिभा से बहुत प्रभावित हुए । चूंकि बिमल रॉय गंभीर सामाजिक विषयों पर संजीदा फिल्में बनाते थे इसलिए वह एक अच्छे हास्य अभिनेता की तलाश में थे जो उनकी फिल्म में हंसी का तड़का लगा सके और उसे हल्का बना सके। इस प्रकार केश्टो मुखर्जी को महान अभिनेता मोतीलाल और साधना अभिनीत उनकी फिल्म परख (1960) में फिल्म निर्माता बिमल रॉय के साथ काम करने का सौभाग्य मिला । फिल्म जबरदस्त हिट रही और यहीं से दोनों के रिश्ते की शुरुआत हुईकेष्टो मुखर्जी और बिमल रॉय । दोनों ने प्रेम पत्र (1962) में काम किया।
1970
फिल्म निर्देशक असित सेन ने केष्टो मुखर्जी में 'शराबी' की खोज की
केश्टो मुखर्जी के शराबी के रूप में मशहूर होने से पहले , 50 के दशक में मशहूर हास्य अभिनेता जॉनी वॉकर ने इस कला में महारत हासिल की थी। लेकिन 60 और 70 के दशक के जॉनी वॉकर टॉप के कॉमेडियन बन चुके थे जिन्होंने एक ही फिल्म के लिए धमाका कर दिया था. 70 के दशक की शुरुआत में बंगाल के फिल्म निर्माता असित सेन , जिन्होंने सफर , बैराग , ममता , अनोखी रात और खामोशी जैसी हिट फिल्में बनाईं, नूतन और जीतेंद्र को लेकर सामाजिक पारिवारिक ड्रामा मां और ममता (1970) बना रहे थे । महमूद और जगदीप के बाद सेदोनों प्रसिद्ध हास्य कलाकार अन्य कार्यों में व्यस्त थे इसलिए फिल्म निर्देशक असित सेन ने केष्टो मुखर्जी को एक शराबी की भूमिका की पेशकश की ।
दिलचस्प बात यह है कि केस्टो ने शराबी की भूमिका इतनी दृढ़ता से निभाई कि उसने अपनी हास्यास्पद हरकतों से सिनेमा घर को तहस-नहस कर दिया! इस फिल्म की सफलता के बाद केस्टो मुखर्जी ने हृषिकेश मुखर्जी की फिल्म ' चुपके-चुपके' (1975) में एक और शराबी की भूमिका निभाई । वह दृश्य जहां वह कविता लिखते हैं - आज बाग में खिलेगा एक गुलाब; ऐ सखी पिला दे एक गिलास... केस्टो इस पर अटक गए क्योंकि वह 'गुलाब' का एक आदर्श काफिया (कविता) लिखने में असमर्थ थे, तब धर्मेंद्र ने एक गिलास जुलाब का सुझाव दिया !!! यह दृश्य गुदगुदा देने वाला है!
मनमोहन देसाई ने केष्टो मुखर्जी को उनके नाम पर एक गीत समर्पित करते हुए रूढ़िबद्ध बना दिया
जिस निश्छलता के साथ केस्टो ने अभिव्यंजक आँखों वाले शराबी की भूमिका निभाई और अद्वितीय संवाद अदायगी ने केस्टो मुखर्जी को आजीवन एक शराबी की भूमिका में स्थापित कर दिया। इस हद तक कि फिल्म निर्माता मनमोहन देसाई ने अपनी फिल्म चाचा भतीजा (1977) में केस्टो को अमर बना दिया । इस फिल्म में मनमोहन देसाई ने केस्टो के नाम से एक गाना शामिल किया- गाना था
हे रे लल्ला यहाँ लल्ला झुमो जरा झुमो नाचो जरा
शादी बनाने को 'केश्टो' चला...
यह गाना धर्मेंद्र पर एक सीन में फिल्माया गया था जिसमें केस्टो मुखर्जी और टुन टुन की शादी होती है।महमूद ने केस्टो मुखर्जी में बिना संवादों के हास्य अभिनेता को निकाला
महान हास्य अभिनेता और फिल्म निर्माता महमूद को बधाई , वह उन कुछ फिल्म निर्माताओं में से एक थे जो कॉमेडी की नब्ज जानते थे। जहां अन्य फिल्म निर्माताओं ने केस्टो मुखर्जी को उनके शराबी अभिनय के लिए इस्तेमाल किया, वहीं महमूद ने अपने चेहरे के भाव मात्र से केस्टो मुखर्जी से कॉमेडी निकाल ली । अपनी फिल्म बॉम्बे टू गोवा में केस्टो अपनी लाजवाब कॉमेडी से दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर देते हैं । पूरी फिल्म में केस्टो ऊंघते हुए नजर आते हैं लेकिन सोते हुए भी वे कॉमेडी का तड़का लगाते हैं!! यह वास्तव में एक दुर्लभता है जो केवल महान अभिनेता ही कर सकते हैं!!
शोले में कैमियो रोल में केस्टो मुखर्जी ने अमिट छाप छोड़ी !एक सशक्त अभिनेता के रूप में केस्टो मुखर्जी की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि रमेश सिप्पी की ऐतिहासिक हिट शोले में केस्टो मुखर्जी ने सिर्फ तीन दृश्यों की एक छोटी सी भूमिका निभाई थी! जेलर ( असरानी ) के नाई सह जासूस हरिराम के रूप में, केस्टो ने अपनी मासूम अभिव्यक्ति, अपनी आंखों की भेंगापन और चेहरे पर लटकते बालों के पतले कर्ल के साथ अपनी भूमिका को उल्लेखनीय बना दिया !!
केस्टो मुखर्जी ने तू मुंगला मुंगला गाने में तड़का लगाया
फिल्म इंकार (1997) में हॉट हेलेन पर फिल्माया गया कैबरे गाना तू मुंगला मुंगला मैं गुड की डाली, पृष्ठभूमि में केश्टो की हरकतों की वजह से मसालेदार और मनमोहक बन गया ! उनकी प्रफुल्लित करने वाली अभिव्यक्ति ने दर्शकों को हंसने पर मजबूर कर दिया!
केस्टो मुखर्जी ने अपने क्लासिक ड्रंक एक्ट से  गोलमाल को शाश्वत बना दिया
हृषिकेश मुखर्जी की हर फिल्म में केस्टो मुखर्जी एक स्थायी फीचर थे लेकिन उनकी फिल्म गोलमाल (1977) में केस्टो मुखर्जी को समायोजित करने के लिए कोई दृश्य नहीं था । लेकिन केस्टो मुखर्जी हृषिकेश मुखर्जी के लिए एक भाग्यशाली शुभंकर बन गए थे इसलिए उन्होंने क्लाइमेक्स में एक मिनट के दृश्य में केस्टो को शामिल किया। केस्टो को सलाम क्योंकि उस संक्षिप्त दृश्य में जहां वह पुलिस स्टेशन में उत्पल दत्त के साथ बातचीत करता है, हंगामा मचाने वाला है, विशेष रूप से, वह दृश्य जहां केस्टो अपनी जादुई टोपी से एक बोतल निकालता है, दंगा भड़काने वाला है।
केस्टो मुखर्जी की गुमनाम मौत हो गई
केस्टो मुखर्जी का 3 मार्च 1982 को मुंबई में उनके आवास पर निधन हो गया, लेकिन अफसोस कि न तो मीडिया और न ही फिल्म उद्योग ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। वह एक गुमनाम मौत मर गये।

Monday, August 5, 2024

गंगा सागर तलवार (सरहदी)

#11may
#22march 
गंगा सागर तलवार (सरहदी)
🎂11 मई 1933
एबटाबाद , बाफ़ा, ब्रिटिश भारत
⚰️मृत22 मार्च 2021 (आयु 87 वर्ष)
मुंबई , भारत
राष्ट्रीयता
भारतीय
अन्य नामों
सागर
व्यवसाय
लघु कथाकार , नाटक लेखक , फ़िल्म निर्देशक , फ़िल्म लेखक , फ़िल्म निर्माता ,
अभिभावक
थान सिंह तलवार (पिता)
प्रेम दाई (माँ)
रिश्तेदार
रमेश तलवार (भतीजा)
4 भाई, 1 बहन
वह यश चोपड़ा की कभी-कभी (1976) से लोकप्रिय हुए , जिसमें अमिताभ बच्चन और राखी ने अभिनय किया था । उन्होंने नूरी (1979) सहित फिल्मों के लिए लेखन जारी रखा ; सिलसिला (1981) में शशि कपूर , अमिताभ बच्चन , जया भादुड़ी और रेखा ने अभिनय किया ; चाँदनी (1989) में ऋषि कपूर , श्रीदेवी और विनोद खन्ना ने अभिनय किया ; सुनील दत्त , रेखा , फारूक शेख और दीप्ति नवल अभिनीत फासले ; रंग (1993) जिसमें कमल सदाना और दिव्या भारती अभिनीत और तलत जानी द्वारा निर्देशित ; अनुभव में संजीव कुमार और तनुजा अभिनीत और बासु भट्टाचार्य द्वारा निर्देशित ; जिंदगी (1976); दूसरा आदमी ; कर्मयोगी ; कहो ना... प्यार है ; करोबार ; बाज़ार ; चौसर और पटकथा लेखक के रूप में एक प्रसिद्ध नाम बन गये।
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गूंज (1974) --(संवाद)
अलिंगन (1974) --(संवाद)
कभी-कभी (1976 फ़िल्म) (पटकथा/संवाद) जिसमें अमिताभ बच्चन और राखी ने अभिनय किया
नूरी (1979 फ़िल्म) (पटकथा/संवाद) फारूक शेख और पूनम ढिल्लों अभिनीत
चांदनी (अनुवाद: "मूनलाइट") (1989 फ़िल्म) (संवाद) ऋषि कपूर , श्रीदेवी और विनोद खन्ना अभिनीत
सिलसिला (अनुवाद: "द अफेयर") (1981 फ़िल्म) (पटकथा) में शशि कपूर , अमिताभ बच्चन , जया भादुड़ी और रेखा ने अभिनय किया।
बाज़ार (1982 फ़िल्म) (निर्देशन) अभिनीत नसीरुद्दीन शाह , फ़ारूक़ शेख , स्मिता पाटिल , सुप्रिया पाठक और भरत कपूर
फासले (अनुवाद: "डिस्टेंस") (1995 फ़िल्म) (संवाद) सुनील दत्त , रेखा , फारूक शेख और दीप्ति नवल अभिनीत ।

शमीम आरा

#05aug
#22march 
शमीम आरा 
🎂 22 मार्च 1938 
⚰️05 अगस्त 2016

पति: दबीर ऊल हसन (विवा. ?–2016)
बच्चे: सलमान माजिद कैरिम
माता-पिता: सैयद अली अहमद
 

एक पाकिस्तानी फिल्म अभिनेत्री, फिल्म निर्देशक और फिल्म निर्माता थीं। उनका जन्म पुतली बाई के रूप में हुआ था लेकिन बाद में उन्होंने फिल्मी नाम शमीम आरा अपना लिया।
उनका अभिनय करियर 1950 के दशक के अंत से लेकर 1970 के दशक की शुरुआत तक चला।
वह 29 अक्टूबर 1965 को रिलीज़ हुई तत्कालीन पश्चिमी पाकिस्तान की पहली रंगीन मोशन पिक्चर नैला (1965) में अपनी प्रमुख भूमिका के लिए सबसे प्रसिद्ध हैं, जबकि पहली पूर्ण लंबाई वाली रंगीन मोशन पिक्चर संगम (1964) थी, जो तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में बनाई गई थी और 23 अप्रैल 1964 को रिलीज़ हुई।

1956 में, पुतली बाई का परिवार लाहौर, पाकिस्तान में कुछ रिश्तेदारों से मिलने गया था , जब प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक नजम नकवी से एक आकस्मिक मुलाकात के बाद, उन्हें अपनी अगली फिल्म के लिए साइन कर लिया गया। वह अपनी फिल्म कंवरी बेवाह (1956) के लिए एक नए चेहरे की तलाश कर रहे थे और उसके प्यारे चेहरे, मधुर आवाज, मिलनसार व्यक्तित्व और मासूम लेकिन आकर्षक मुस्कान से प्रभावित थे। वह नजम नकवी ही थे जिन्होंने उन्हें मंच नाम शमीम आरा से परिचित कराया था, क्योंकि उनका पिछला नाम कुख्यात डकैत पुतली बाई से मिलता-जुलता था । हालाँकि फिल्म ने अधिक दर्शकों को आकर्षित नहीं किया, लेकिन पाकिस्तान फिल्म उद्योग के क्षितिज पर एक उल्लेखनीय नई महिला सितारा दिखाई दी ।

उनकी पहली प्रमुख भूमिका 1958 में अनवर कमाल पाशा की अनारकली में सुरैया के रूप में नूरजहाँ के साथ थी , जिन्होंने अनारकली का किरदार निभाया था।अगले दो वर्षों तक, आरा ने कुछ फिल्मों में अभिनय किया, लेकिन उनमें से किसी को भी बॉक्स ऑफिस पर बड़ी सफलता नहीं मिली, जिसमें वाह रे ज़माने , राज़ और आलम आरा शामिल थीं । हालाँकि, 1960 में, एसएम यूसुफ की सहेली में एक भूलने वाली दुल्हन की महत्वपूर्ण भूमिका उनके करियर के लिए एक सफलता साबित हुई। फिल्म में रशीद अत्रे के संगीत के साथ मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे मेहबूब ना मांग (प्रसिद्ध पाकिस्तानी कवि फैज अहमद फैज द्वारा लिखित और मैडम नूरजहाँ द्वारा गाया गया एक कविता ) गीत का फिल्मांकन किया गया। क़ैदी (1962) ने हर किसी को उसके बारे में बात करने पर मजबूर कर दिया। महिलाएं उनकी बोली, उनके मेकअप और उनके हेयर स्टाइल की नकल करने लगी थीं। वह एक घरेलू नाम बन गई थी। उनकी प्रसिद्धि और त्रुटिहीन अभिनय कौशल ने उन्हें फिल्म नैला (1965) में शीर्षक किरदार दिया, जो तत्कालीन पश्चिमी पाकिस्तान में निर्मित पहली रंगीन फिल्म थी। दुखद नैला के उनके चित्रण ने उन्हें और अधिक आलोचनात्मक प्रशंसा दिलाई।

उन्होंने देवदास ,
 दोराहा ,
 हमराज़ सहित कई हिट फिल्मों में अभिनय किया । 
हालाँकि, क़ैदी (1962), 
चिंगारी (1964), 
फरंगी ( 1964),
 नैला (1965), 
आग का दरिया (1966),
 लाखों में ऐक (1967),
 सैका (1968)
 सालगिरा (1968) 

उनके करियर में मील का पत्थर रहीं। उन्होंने लॉलीवुड में 1960 के दशक की शीर्ष अभिनेत्री के रूप में अपना स्थान सुनिश्चित किया । 

1970 के दशक की शुरुआत में जब वह एक प्रमुख महिला के रूप में सेवानिवृत्त हुईं तो उनका अभिनय करियर रुक गया।  लेकिन इसने उन्हें पाकिस्तानी फिल्म उद्योग का हिस्सा बनने से नहीं रोका क्योंकि उन्होंने खुद ही फिल्मों का निर्माण और निर्देशन करना शुरू कर दिया था। हालाँकि, उनमें से कोई भी फ़िल्म उस सफलता के स्तर तक नहीं पहुँच पाई जो शमीम आरा को अपने अभिनय करियर के चरम पर मिली थी।

जयदाद (1959) 
 तीस मार खान (1989) एकमात्र दो पंजाबी फिल्में थीं जिनमें उन्होंने अभिनय किया। 

फिल्म निर्माता के रूप में

1968 में, उन्होंने अपनी पहली फिल्म सैका (1968 फिल्म) का निर्माण किया, जो रजिया बट के उपन्यास पर आधारित थी । फिल्म ने बड़ी संख्या में दर्शकों खासकर महिलाओं को आकर्षित किया।

फिल्म निर्माता के रूप में

जियो और जीने दो (1976) का निर्देशन किया। बाद में उन्होंने डायमंड जुबली फिल्म 
मुंडा बिगरा जाए (1995) का भी निर्देशन किया। उनके द्वारा निर्देशित अन्य फिल्मों में 
प्लेबॉय (1978), 
मिस हांगकांग (1979), 
मिस सिंगापुर (1985), 
मिस कोलंबो (1984),
 लेडी स्मगलर (1987), 
लेडी कमांडो (1989), 
आखिरी मुजरा (1994), 
बैता (1994) शामिल हैं। ), 

हाथी मेरे साथी , मुंडा बिगरा जाए (1995), 
हम तो चले सुसराल (1996), मिस इस्तांबुल (1996)
 हम किसी से कम नहीं (1997), 
लव 95 (1996) 
औ पल दो पल (1999)।  

उनका निर्देशन उनके अभिनय प्रोजेक्ट जितना सफल नहीं रहा, इसका मुख्य कारण वास्तविक मुद्दों पर ध्यान न देना और फिल्म निर्माण की फार्मूला शैली को अपनाना था। 

शमीम आरा की चार बार शादी हुई थी। उनके पहले पति (और शायद संरक्षक) बलूचिस्तान के जमींदार सरदार रिंद थे, जिनकी एक कार दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। इसके बाद उन्होंने एग्फा कलर फिल्म कंपनी चलाने वाले परिवार के वंशज अब्दुल माजिद कैरिम से शादी की। उनका एक बेटा था, सलमान माजिद कैरिम (जो उनकी एकमात्र संतान था), लेकिन शादी तलाक में समाप्त हो गई। उनकी तीसरी शादी फरीद अहमद से हुई, जो एक फिल्म निर्देशक और फिल्म निर्देशक डब्ल्यूजेड अहमद के बेटे थे । वह शादी भी केवल 3 दिनों के बाद तलाक में समाप्त हो गई।  शमीम आरा ने बाद में पाकिस्तानी फिल्म निर्देशक और लेखक दबीर-उल-हसन से शादी की।  वे 2005 तक लाहौर में रहे , जब वह और सलमान माजिद कैरिम (पिछली शादी से उनका बेटा) लंदन चले गए, जबकि उनके पति पाकिस्तान में रहे।
⚰️पाकिस्तान की यात्रा के दौरान, 19 अक्टूबर 2010 को उन्हें मस्तिष्क रक्तस्राव हुआ, और उन्हें इलाज के लिए वापस लंदन ले जाया गया। वह छह साल तक अस्पताल में रहीं और बाहर रहीं, और उनकी देखभाल उनके इकलौते बेटे, सलमान माजिद कैरिम ने की, जिन्हें अपने पिता से कुछ भी विरासत में नहीं मिला है और वह आईटी उद्योग और संपत्ति विकास में स्वयं काम कर रहे हैं। शमीम आरा का लंबी बीमारी के बाद 5 अगस्त 2016 को लंदन के एक अस्पताल में निधन हो गया।

उनके इकलौते बेटे ने अंतिम संस्कार की व्यवस्था का नेतृत्व किया और उन्हें ब्रिटेन में दफनाया गया।

उनकी मौत की खबर मिलने पर फिल्म अभिनेत्री रेशम ने कहा कि उन्होंने शमीम आरा के साथ कुछ ही फिल्मों में काम किया है लेकिन उन्होंने एक मृदुभाषी और विनम्र व्यक्ति की अमिट छाप छोड़ी है।

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1956 कांवरी बेवाह 
मिस 56 
1958 अनारकली सुरैया
वाह रे ज़माने 
1959 आलम आरा आलम आरा 
अपना पराया 
फ़ैसला 
सवेरा 
जयदाद 
मजलूम 
राज़ ग़ज़ाला 
1960 भाभी 
उस्ताद करो 
इज्जत 
रात के राही 
रूपमती बाज बहादुर रूपमती 
सहेली जमीला 
1961 इंसान बदलता है जमीला 
जमाना क्या कहेगा 
ज़मीन का चाँद 
1962 आंचल 
महबूब 
मेरा क्या क़सूर 
कैदी 
इंकलाब 
1963 दुल्हन नजमा 
एक तेरा सहारा 
ग़ज़ाला 
काला पानी 
साज़िश 
सीमा सीमा 
तांगे वाला 
1964 बाप का बाप 
चिंगारी 
फरंगी गुल
हवेली 
मैहख़ाना 
पैगाम 
प्यार की सजा 
शबाब 
शिकारी 
तन्हा 
1965 देवदास पार्वती
दिल के टुकड़े मुसर्रत 
पहनावा 
नैला नैला 
1966 आग का दरिया 
जलवा 
मजबूर तसनीम 
मेरे मेहबूब 
पर्दा जाहिदा 
क़बीला 
1967 दोराहा नाहीद 
हमराज़ शहजादी/गुल बानो
1967 दोराहा
हमराज़ शहजादी/गुल बानो दोहरी भूमिका 

लाखों में ऐक शकुन्तला
1968 सैका सैका निर्माता भी 
दिल मेरा धारकां तेरी नजमा 
मेरा घर मेरी जन्नत नजमा 
1969 सालगिरा शबाना/सलमा 
आंच 
दिल-ए-बेताब बनो 
1970 आंसू बन गये मोती राजी 
बेवफ़ा अंबर 
इक जालिम इक हसीना 
1971 पराई आग 
वेहशी 
खाक और खून 
1972 अंगारे आयशा 
सुहाग निर्माता भी
1973 ख्वाब और जिंदगी नजमा 
1974 भूल — निर्माता 
1976 ज़ैब-उन-निसा ज़ैब-उन-निसा 
1978 कामचोर — निर्माता और निर्देशक
1981 मेरे अपने आशी निर्देशक और निर्माता भी 
1985 मिस सिंगापुर — निर्माता और निर्देशक के रूप में 
1993 हाथी मेरे साथी  निदेशक 
1994 आखिरी मुजरा — निर्माता और निर्देशक 
1999 पल दो पल

मीना कुमारी (मृत्यु)

मीना कुमारी 🎂जन्म 01 अगस्त, 1932 ⚰️मृत्यु 31 मार्च, 1972 मीना कुमारी महजबीं बानो प्रसिद्ध नाम मीना कुमारी 🎂जन्म 01 अगस्त, 1932 जन्म भूमि म...