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Thursday, March 21, 2024

पंडित शिवराम कृष्णा

#22मार्च
#02feb 
पं. शिवराम 

🎂जन्म 22 मार्च, 1927 को जोधपुर 

⚰️02 फरवरी, 1980

जोधपुर के ओसियां कस्बे के पास पंडितजी री ढाणी के रहने वाले थे। उनका पूरा नाम पं. शिवराम कृष्ण था,

पं.मधुर धुनें बनाने के बावजूद फिल्म जगत में हाशिए पर रहे शिवराम

 राजस्थान संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष रह चुके  वे मूलत: जोधपुर के ओसियां कस्बे के पास पंडितजी री ढाणी के रहने वाले थे। उनका पूरा नाम पं. शिवराम कृष्ण था, लेकिन बाद में वे पं. शिवराम या केवल शिवराम के नाम से ही जाने गए। पं. शिवराम ने आठ साल की उम्र में ही अपने पिता मास्टर तुलसी दास से संगीत की शिक्षा लेना प्रारंभ कर दिया था जो जोधपुर की मारवाड़ रिकॉर्ड कंपनी में काम करते थे। बाद में वे महाराजा उम्मेद सिंह के दरबार में भी रहे। वे 16 वर्ष की उम्र में लाहौर चले गए जहां उन्होंने उस जमाने के सितारा संगीतकार गुलाम हैदर और पं. अमरनाथ के साथ काम किया। विभाजन के बाद 1948 में वे एचएमवी, लखनऊ में संगीत निर्देशक बन गए और 1951 में मुम्बई गए। उन्हें सबसे पहला ब्रेक वी. शांताराम ने दो फिल्मों के साथ दिया
"तीन बत्ती-चार रास्ता'(1953) और "सुरंग(1953)। 

7 वर्ष पहले
वो जब याद आए...

ते जमाने की पीढ़ी ने ये गीत खूब सुने होंगे-"बड़े प्यार से मिलना सबसे दुनिया में इंसान रे(मोहम्मद रफी-सती अनुसुइया-1956) और "अपने पिया की मैं तो बनी रे जोगनिया' (सुमन कल्याणपुर-कण कण में भगवान-1963)। अपने समय में ये गीत खूब लोकप्रिय हुए, लेकिन कम ही लोग जानते होंगे कि इन्हें संगीत की धुनों से सजाया था जोधपुर में जन्मे संगीत निर्देशक पं. शिवराम ने।

गीतों में कोमलता, माधुर्य और तरलता पं. शिवराम के संगीत की विशिष्ट पहचान थी, लेकिन इसके बावजूद फिल्मों की निर्मम दुनिया में उन्हें वह जगह नहीं मिली, जो मिलनी चाहिए थी। उन्होंने मोहम्मद रफी, मन्ना डे, मुकेश, महेंद्र कपूर, तलत महमूद, लता मंगेशकर, आशा भोसले और सुमन कल्याणपुर जैसी हस्तियों से गीत गवाए। कवि प्रदीप, भरत व्यास, नरेंद्र शर्मा और नीरज जैसे गीतकारों की रचनाओं को संगीतबद्ध किया। नीरज के गीतों को धुनों में बांधने वाले प्रारंभिक संगीतकारों में शिवराम सर्वाधिक महत्वपूर्ण संगीतकार थे। एसडी बर्मन के साथ तो नीरज बाद में जुड़े। पंकज राग 

अपनी पुस्तक 📖

धुनों की यात्रा

' में लिखते हैं-

"भक्तिपूर्ण पौराणिक फिल्मों के संगीतकारों के रूप में एस.एन. त्रिपाठी, चित्रगुप्त और अविनाश व्यास की चर्चा अक्सर की जाती है, पर जिस संगीतकार को ऐसी चर्चाओं में छोड़ दिया जाता है, वह हैं शिवराम। हालांकि मीठे, मधुर, तरल गीत हों या झंकृत, चमत्कृत संगीत का सृजन हो या फिर शास्त्रीय और युगल संगीत का समन्वय हो, शिवराम का हुनर इन चर्चित संगीतकारों से कम नहीं था।

पं. की आखिरी दो हिंदी फिल्में शिवराम संपूर्ण तीर्थ यात्रा (1970) और महापावन तीर्थ यात्रा (1975) थीं, जिनमें क्रमशः 45 और 70 मिनट तक चलने वाले सबसे लंबे हिंदी फिल्मी गाने शामिल होने का अनूठा गौरव है। ये दोनों गीत भारत के विभिन्न तीर्थ स्थानों के बारे में थे और धुन और संरचना में लगभग समान थे। दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने दुर्गा पूजा (1962) और कन कन में भगवान (1963) में इसी तरह की तर्ज पर दो और गाने भी लिखे थे।
पंडित शिवराम ने विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं जैसे राजस्थानी, भोजपुरी, पंजाबी, हरियाणवी आदि के लिए संगीत दिया। पहली राजस्थानी फिल्म बाबासा री लाडली (1961) से शुरुआत करते हुए, वह 1960 के दशक तक राजस्थानी फिल्मों के लिए डिफ़ॉल्ट संगीतकार थे। उन्होंने कई मारवाड़ी और शास्त्रीय संगीत गैर-फिल्मी एल्बमों के लिए भी रचना की। एक कुशल हारमोनियम वादक के रूप में, उन्होंने टेबल-नवाज़ उस्ताद निज़ामुद्दीन खान के साथ मिलकर एक शास्त्रीय एल्बम तैयार किया। पंडित शिवराम जितने अच्छे गायक कलाकार थे उतने ही अच्छे हारमोनियम वादक भी थे। उन्होंने ऊंची हवेली, रंगीला राजा, सती अनसूया, बद्रीनाथ यात्रा आदि फिल्मों में गाने भी गाए।

🎥

तीन बत्ती चार रास्ते (1953)
सुरंग (1953)
ऊंची हवेली (1955)
रफ़्तार (1955)
सती अनसूया (1956)
श्रवण कुमार (1956)
जय अम्बे (1957)
गौरी शंकर (1958)
नया कदम (1958) - नारायण के साथ
काले गोर (1960)
फूल और कलियाँ (1960)
रंगीला राजा (1960)
दुर्गा पूजा (1962)
कण कण में भगवान (1963)
महासती बेहुला (1964)
सती नारी (1965)
शंकर सीता अनसूया (1965)
श्री राम भरत मिलन (1965)
वीर बजरंग (1966)
बद्रीनाथ यात्रा (1967)
कातिल (1970)
संपूर्ण तीर्थ यात्रा (1970)
महापावन तीर्थ यात्रा (1975)

🎥राजस्थानी

बाबासा री लाडली (1961)
नानीबाई को मायरो (1962)
बाबा रामदेव (1963)
धानी लुगाई (1964)
गणगौर (1964)
गोपीचंद भरथरी (1965)
गोगाजी पीर (1969)

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