#21march
#30oct
ख़्वाजा खुर्शीद अनवर
खुर्शीद अनवर
के रूप में भी जाना जाता है
ख्वाजा साहब
जन्म
21 मार्च 1912
मियांवाली , पंजाब , ब्रिटिश भारत (अब पाकिस्तान में)
मृत
30 अक्टूबर 1984 (आयु 72 वर्ष)
लाहौर , पंजाब , पाकिस्तान
शैलियां
शास्त्रीय
भारतीय फ़िल्म संगीत , पाकिस्तानी फ़िल्म संगीत
व्यवसाय
संगीत निर्देशक , पटकथा लेखक , फ़िल्म निर्देशक , फ़िल्म निर्माता
सक्रिय वर्ष
1941 – 1982
लेबल
सेलेक्ट पिक्चर्स (उनकी फिल्म निर्माण कंपनी का नाम)
🎂जन्म 21 मार्च, 1912
जन्म भूमि पंजाब, (अब पाकिस्तान)
⚰️मृत्यु 30 अक्टूबर, 1984
मृत्यु स्थान लाहौर
अभिभावक ख़्वाजा फ़िरोज़ुद्दीन अहमद
कर्म भूमि मुम्बई
कर्म-क्षेत्र संगीतकार
मुख्य फ़िल्में कुड़माई, इशारा, सिंगार, परख, यतीम
विषय दर्शनशास्त्र
शिक्षा एम.ए
विद्यालय पंजाब विश्वविद्यालय
अन्य जानकारी खुर्शीद अनवर दर्शनशास्त्र में प्रथम श्रेणी आने के बाद प्रतिष्ठित ICS परीक्षा के लिखित चरण में शामिल हुए और सफल भी हुए। परंतु उसके साक्षात्कार चरण में शामिल न होकर संगीत के क्षेत्र को उन्होंने अपना कॅरियर चुना।
परिचय
मुख्य लेख : ख़्वाजा खुर्शीद अनवर का जीवन परिचय
खुर्शीद अनवर का जन्म 21 मार्च, 1912 को मियाँवाली, पंजाब (अब पाकिस्तान) में हुआ था। उनके नाना ख़ान बहादुर डॉ. शेख़ अट्टा मोहम्मद सिविल सर्जन और उनके पिता ख़्वाजा फ़िरोज़ुद्दीन अहमद लाहौर के एक जानेमाने बैरिस्टर थे। 1947 में देश के विभाजन के बाद वह भारत से पाकिस्तान जा बसे।
कॅरियर
मुख्य लेख : ख़्वाजा खुर्शीद अनवर का कॅरियर
खुर्शीद अनवर ने अपने संगीत जीवन की शुरुआत आल इण्डिया रेडियो के संगीत विभाग में प्रोड्यूसर-इन-चार्ज की हैसियत से की थी। फ़िल्मों में संगीत निर्देशक के रूप में पहली बार उन्हें पंजाबी फ़िल्म 'कुड़माई' में सन 1941 में संगीत देने का अवसर मिला जिसमें वास्ती, जगदीश, राधारानी, जीवन आदि कलाकारों ने अभिनय किया था और निर्देशक थे जे. के. नन्दा। उनके मधुर संगीत से सजी पहली हिंदी फ़िल्म थी 'इशारा' जो सन 1943 में प्रदर्शित हुई थी।
📽️प्रमुख फ़िल्में
ए. आर. कारदार की पंजाबी फ़िल्म 'कुड़माई' (1941) से शुरुआत करने के बाद खुर्शीद अनवर ने 'इशारा' (1943), 'परख' (1944), 'यतीम' (1945), 'आज और कल' (1947), 'पगडंडी' (1947) और 'परवाना' (1947) जैसी फ़िल्मों में संगीत दिया। स्वाधीनता मिलने के बाद 1949 में फिर उनके संगीत से सजी एक फ़िल्म आई 'सिंगार'। पाकिस्तान में खुर्शीद अनवर की जो फ़िल्में मशहूर हुईं थीं उनमें शामिल हैं- 'ज़हरे-इश्क़', 'घूंघट', 'चिंगारी', 'इंतज़ार', 'कोयल', 'शौहर', 'चमेली', 'हीर रांझा' इत्यादि।
⚰️निधन
भारत विभाजन के बाद विशुद्ध व्यावसायिकता को दृष्टिगत रखते हुए पाकिस्तान जा बसने वाले अपने समय के प्रसिद्ध संगीतकार खुर्शीद अनवर का 30 अक्टूबर, 1984 को लाहौर में दुखद निधन हो गया। वे लगभग 70 वर्ष के थे।
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भारत में करियर
1939 में, खुर्शीद अनवर आकाशवाणी ऑल इंडिया रेडियो या ( आकाशवाणी (रेडियो प्रसारक) ), दिल्ली में कार्यक्रम निर्माता (संगीत) के रूप में शामिल हुए। यहीं से उन्होंने प्रसिद्ध फिल्म निर्माता अब्दुर रशीद कारदार के बॉम्बे फिल्म जगत में संगीत निर्देशक के रूप में शामिल होने के अनुरोध को स्वीकार किया। उन्होंने कारदार की पंजाबी फिल्म "कुरमई" (1941) में संगीत निर्देशक के रूप में अपनी शुरुआत की।
उनकी पहली हिंदी फिल्म "इशारा" (1943) थी।
फिल्म ने अपने गानों से बहुत लोकप्रियता हासिल की, जिसमें सुरैया का "पनघट पे मुरलिया बाजे" , गौहर सुल्तान का गाया "शबनम क्यों नीर बहे" , और "दिल देके दागा नहीं देना" शामिल थे। वत्सला कुमाथेकर द्वारा ।
उनकी कुछ अन्य हिंदी फिल्में थीं परख (1944, सरस्वती देवी के साथ ),
यतीम (1945),
आज और कल (1947), पगडंडी (1947),
और परवाना (1947) जो केएल सहगल द्वारा अभिनीत आखिरी फिल्म थी। और गाया।
"सिंगार" (1949) के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक का क्लेयर पुरस्कार मिला । उनकी बाद की फ़िल्में "निशाना" (1950)
"नीलम परी" (1952)
ने उनकी उपलब्धियों में नए पंख जोड़े। वह भारत और पाकिस्तान दोनों में बाद के कई संगीत निर्देशकों के लिए प्रेरणा बने रहे। कई वर्षों तक, प्रसिद्ध भारतीय फिल्म संगीत निर्देशक रोशन उनके शिष्य थे, साथ ही शंकर जयकिशन की प्रसिद्धि वाले शंकर भी थे। उनके समकालीन भारतीय फिल्म संगीत निर्देशक नौशाद अली द्वारा नियमित रूप से उनकी प्रशंसा की जाती थी , जो उन्हें उपमहाद्वीप के बेहतरीन फिल्म संगीतकारों में से एक मानते थे।
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