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Sunday, March 30, 2025

मीना कुमारी (मृत्यु)

मीना कुमारी🎂जन्म 01 अगस्त, 1932⚰️मृत्यु 31 मार्च, 1972


मीना कुमारी

महजबीं बानो
प्रसिद्ध नाम मीना कुमारी

🎂जन्म 01 अगस्त, 1932

जन्म भूमि मुंबई

मृत्यु स्थान मुम्बई

अभिभावक पिता- अली बख़्श, माता- इक़बाल बेगम

पति/पत्नी कमाल अमरोही
कर्म भूमि मुम्बई
कर्म-क्षेत्र अभिनेत्री, शायर
मुख्य फ़िल्में 'बैजू बावरा', 'यहूदी', 'फूल और पत्थर', 'साहिब बीबी और ग़ुलाम', 'पाकीज़ा', 'परिणीता', 'बहू बेग़म और मेरे अपने' आदि।
पुरस्कार-उपाधि सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए 'फ़िल्मफेयर' पुरस्कार (चार बार)
प्रसिद्धि संवाद अदायगी का विशेष लहज़ा
नागरिकता भारतीय

परिचय


मीना कुमारी का जन्म 01 अगस्त, 1932 को मुंबई, महाराष्ट्र में एक मध्यम वर्गीय मुस्लिम परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम अली बख़्श था और माता इकबाल बेगम (मूल नाम प्रभावती) थीं। मीना कुमारी का मूल नाम 'महजबीं बानो' था। जब उनका जन्म हुआ, तब पिता अली बख्‍श और मां इकबाल बेग़म के पास डॉक्‍टर को देने के पैसे नहीं थे। हालत यह थी कि दोनों ने तय किया कि बच्‍ची को किसी अनाथालय के बाहर सीढ़ियों पर छोड़ दिया जाए और छोड़ भी दिया गया। लेकिन, पिता का मन नहीं माना और वह पलट कर भागे और बच्‍ची को गोद में उठाकर घर ले आए। किसी तरह मुश्किल भरे हालातों से लड़ते हुए उन्होंने उसकी परवरिश की। मीना के पिता एक पारसी थिएटर में काम किया करते थे और माता एक नर्तकी थीं। परिवार की आर्थिक स्थिति ख़राब रहने के कारण मीना कुमारी को बचपन में ही स्कूल छोड़ देना पड़ा। वर्ष 1939 में बतौर बाल कलाकार उनको विजय भट्ट की फ़िल्म 'लेदरफेस' में काम करने का मौक़ा मिला।


प्रारम्भिक संघर्ष


अपनी पहचान को तलाशती मीना कुमारी को लगभग दस वर्षों तक फ़िल्म जगत् में संघर्ष करना पड़ा। इस बीच उनकी 'वीर घटोत्कच' (1949) और 'श्री गणेश महिमा' (1950) जैसी फ़िल्में प्रदर्शित तो हुई, पर उन्हें इनसे कुछ ख़ास पहचान नहीं मिली। वर्ष 1952 में मीना कुमारी को विजय भट्ट के निर्देशन में 'बैजू बावरा' में काम करने का मौक़ा मिला। इस फ़िल्म की सफलता के बाद मीना कुमारी बतौर अभिनेत्री फ़िल्म जगत् में अपनी पहचान बनाने में सफल हो गईं।


विवाह


24 मई, 1952 को मीना कुमारी ने कमाल अमरोही से शादी कर ली। मीना कुमारी की जीवनी 'मीनाकुमारी- ए क्लासिक बायोग्राफ़ी' लिखने वाले विनोद मेहता के अनुसार- "मीना कुमारी और कमाल अमरोही का प्यार मोसम्मी के जूस से शुरू हुआ था। जब कमाल अमरोही मीना कुमारी को देखने पूना के अस्पताल में पहुंचे तो उनकी छोटी बहन ने उनसे शिकायत की कि आपा जूस नहीं पी रही हैं। कमाल ने गिलास अपने हाथों में लिया, मीना के सिर को पलंग से उठाया और गिलास को उनके मुंह तक ले गए। मीना ने एक घूंट में ही सारा जूस ख़त्म कर दिया। हर हफ़्ते कमाल सायन से पूना ड्राइव कर मीना से मिलने पहुंचते। फिर उन्हें लगने लगा कि हफ़्ते में एक दिन काफ़ी नहीं है। जिस दिन उन्हें नहीं मिलना होता, वह एक दूसरे को ख़त लिखते...। हर रोज़ एक ख़त। लेकिन उन ख़तों पर कोई टिकट नहीं लगाया जाता। वह ख़त वह एक-दूसरे को ख़ुद अपने हाथों से देते।"


कमाल अमरोही से मनमुटाव


लेकिन मीना कुमारी और कमाल अमरोही के वैवाहिक जीवन में कुछ दिनों बाद ही दरार दिखाई देनी शुरू हो गई। कमाल अमरोही ने मीना कुमारी को फ़िल्मों में काम करने की अनुमति तो दी, लेकिन उन पर तीन शर्तें लगाईं। पहली शर्त थी कि मीना कुमारी शाम साढ़े 6 बजे तक घर लौट आएं। दूसरी शर्त थी कि मीना कुमारी के मेकअप रूम में उनके मेकअप मैन के अलावा कोई पुरुष नहीं बैठेगा और उनकी आखिरी शर्त थी कि मीना कुमारी हमेशा अपनी ही कार में बैठेंगी जो उन्हें स्टूडियो ले कर जाएगी और फिर वापस घर लाएगी।


राज कपूर की पार्टी


जिस दिन मीना कुमारी ने कमाल अमरोही की शर्तों पर दस्तख़त किए, उसी दिन से उन्होंने उन्हें तोड़ना शुरू कर दिया। सबसे पहली घटना तब हुई, जब 'शारदा' की शूटिंग के दौरान राज कपूर ने मीना कुमारी को एक पार्टी में आमंत्रित किया। एक रूसी फ़िल्म प्रतिनिधिमंडल बंबई आया हुआ था। राज कपूर उनके सम्मान में एक स्वागत समारोह कर रहे थे। मीना कुमारी ने उनका निमंत्रण स्वीकार कर लिया और अपने पति को फ़ोन कर कहा कि वह देर से घर लौटेंगी। उन्होंने इसका कारण राज कपूर की पार्टी नहीं बताया, बल्कि ये कहा कि उनकी शूटिंग देर तक चलेगी। अगले ही दिन इत्तेफ़ाक से कमाल अमरोही की मुलाकात उन मेहमानों से हो गई जो राज कपूर की पार्टी में मौजूद थे। उनसे उन्हें पता चला कि उनकी बीबी शूटिंग में व्यस्त न होकर पार्टी में थीं। जब वह घर लौटीं तो उन्होंने इस बारे में कमाल को कुछ नहीं बताया। बाद में जब कमाल ने उनसे इस हानि रहित धोखे का ज़िक्र किया तो मीना कुमारी ने कहा कि वह उन्हें परेशान नहीं करना चाहती थीं।


कमाल मना नहीं सके मीना को


एक दिन कमाल अमरोही के सचिव बाकर ने मीना कुमारी को अभिनेता प्रदीप कुमार की कार से उतरते हुए देख लिया। बाद में कुछ और घटनाएं हुईं और मीना कुमारी ने ये तय किया कि वह कमाल अमरोही के घर कभी वापस नहीं जाएंगी। कमाल अमरोही के पुत्र ताजदार अमरोही के अनुसार- "मीना कुमारी कमाल के घर से निकलने का बहाना तलाश कर रही थीं ताकि वह आज़ाद पक्षी की तरह रह सकें। जब छोटी अम्मी घर से चली गईं तो बाबा ने एक शौहर होने के नाते अपना फ़र्ज़ निभाया। वह महमूद साहब के यहाँ चली गई थीं। वह वहाँ गए। छोटी अम्मी ने अपने आप को एक कमरे में लॉक किया हुआ था। बाबा दरवाज़ा पीट कर कहते रहे- 'मंजू बाहर आओ, मुझसे बात करो। तुम्हें क्या शिकायत है। मुझे बताओ।' लेकिन वह बाहर नहीं आईं।

महमूद साहब ने कहा अभी ये नहीं मानेंगी। थोड़ी देर में ये ठंडी हो जाएंगी। आप बाद में इनसे मिलने आ जाइएगा। बाबा ने तीन-चार बार दरवाज़े को ठोका और फिर कहा- 'मंजू तुम अंदर हो और मुझे सुन रही हो। मैं अब जा रहा हूँ। मैं अब लौट कर नहीं आऊँगा। मैंने तुमको मनाने की बहुत कोशिश की, लेकिन तुम नहीं मानी। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि तुम्हारा मुझ पर कोई हक़ नहीं है। हमारे घर के दरवाज़े हमेशा तुम्हारे लिए खुले हैं और खुले रहेंगे। तुम जब चाहना आ जाना।"


कमाल का वॉक आउट


इस बीच कुछ ऐसी घटनाएं हुईं, जिन्होंने कमाल अमरोही और मीना कुमारी के बीच की दूरी को पाटने के बजाए और बढ़ा दिया। विनोद मेहता के अनुसार- "सोहराब मोदी ने मीना कुमारी और कमाल अमरोही दोनों को 'इरोज़' सिनेमा में एक फ़िल्म प्रीमियर पर आमंत्रित किया। सोहराब ने महाराष्ट्र के राज्यपाल से मीना कुमारी का परिचय कराते हुए कहा- 'ये मशहूर अभिनेत्री मीना कुमारी हैं...। और ये इनके पति कमाल अमरोही हैं।' इससे पहले कि दोनों एक-दूसरे को नमस्ते कहते, अमरोही ने कहा- 'नहीं, मैं कमाल अमरोही हूँ और ये मेरी पत्नी हैं... मशहूर फ़िल्म अदाकारा मीना कुमारी।' इतना कह कर वह सिनेमा हॉल से बाहर चले गए और मीना कुमारी को अकेले बैठकर वह फ़िल्म देखनी पड़ी।"


ट्रेजेडी क्वीन


मीना कुमारी की पूरी ज़िंदगी सिनेमा के पर्दे पर भारतीय औरत की 'ट्रैजेडी' को उतारते हुए गुज़री। यहाँ तक कि उन्हें अपनी ख़ुद की निजी ट्रैजेडी के बारे में सोचने का वक्त ही नहीं मिला। लेकिन ये कहना कि मीना कुमारी के अभिनय में 'ट्रैजेडी' के अलावा और कोई 'शेड' नहीं था, उनके साथ बेइंसाफ़ी होगी। फ़िल्म 'परिणिता' की शांत बंगाली अल्हड़ नवयौवना को लें, या 'बैजू बावरा' की चंचल हसीन प्रेमिका को लें या फिर 'साहब बीबी और गुलाम' की सामंती अत्याचार झेलने वाली बहू हो या 'पाकीज़ा' की साहबजान, सभी ने भारतीय जनमानस के दिल पर अमिट छाप छोड़ी है।


मीना कुमारी एक अभिनेत्री के रूप में 32 सालों तक भारतीय सिने जगत पर छाई रहीं। बेहद भावुक और सदा दूसरों की मदद करने को तत्पर मीना कुमारी की ज़िंदगी दूसरों को सुख बांटते और दूसरे के दु:ख बटोरते हुए बीती थी। कमाल अमरोही के बेटे ताजदार अमरोही के अनुसार- "मीना कुमारी को कभी ख़ूबसूरत चेहरे के तौर पर लोगों ने नहीं एडरेस किया, जैसा कि मधुबाला को कहा गया- 'वीनस ऑफ़ द इंडियन स्क्रीन', नरगिस के लिए भी लोगों ने कहा- 'फ़र्स्ट लेडी ऑफ़ इंडियन स्क्रीन'। मीना को ख़िताब मिला 'ट्रेजेडी क्वीन' का और उन्होंने 'ट्रेजेडी' को अपना ओढ़ना, बिछौना बना लिया। लोगों ने समझा कि वह जैसे किरदार फ़िल्मों में कर रही हैं, असल ज़िंदगी में भी वह वही भूमिका निभा रही हैं। दिलचस्प बात ये थी कि लोगों के साथ-साथ ख़ुद उन्होंने भी ऐसा समझना शुरू कर दिया था।


फ़िल्मी सफ़र


वर्ष 1957 में प्रदर्शित फ़िल्म 'शारदा' में मीना कुमारी के अभिनय के नए आयाम दर्शकों को देखने को मिले। इस फ़िल्म में मीना कुमारी ने अभिनेता राजकपूर की प्रेयसी के अलावा उनकी सौतेली माँ की भूमिका भी निभाई। हालांकि उसी वर्ष फ़िल्म 'मदर इंडिया' के लिए फ़िल्म अभिनेत्री नर्गिस को सारे पुरस्कार दिए गए, लेकिन 'बॉम्बे जर्नलिस्ट एसोसिएशन' ने मीना कुमारी को उस वर्ष की सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए नामित किया।


फ़िल्म पाकीज़ा


कमाल अमरोही और मीना कुमारी भले ही पति और पत्नी के रूप में एक-दूसरे से अलग रहे हों, लेकिन अभिनेत्री के तौर पर वह हमेशा कमाल अमरोही की फ़िल्मों में काम करने के लिए उपलब्ध थीं। यही वजह है कि अमरोही से 5 सालों तक अलग रहने के बावजूद उन्होंने उनकी फ़िल्म 'पाकीज़ा' की शूटिंग पूरी करने का फ़ैसला किया। जिस तरह से शाहजहाँ ने ताजमहल बनाकर मुमताज़ महल को हमेशा के लिए अमर कर दिया, वैसे ही कमाल अमरोही ने 'पाकीज़ा' बनाकर मीना कुमारी के लिए ताजमहल खड़ा किया और उनको अमर कर दिया। जब-जब भारतीय फ़िल्मों का इतिहास लिखा जाएगा, 'पाकीज़ा' का ज़िक्र ज़रूर होगा। इस फ़िल्म में योगदान राज कुमार साहब का भी है, अशोक कुमार का भी है और नादिरा का भी है, लेकिन तीन नाम हमेशा ज़िंदा रहेंगे-


मीना कुमारी, कमाल अमरोही और पाकीज़ा। वर्ष 1972 में जब 'पाकीज़ा' प्रदर्शित हुई तो फ़िल्म में मीना कुमारी के अभिनय को देखकर दर्शक मुग्ध हो गए और यह फ़िल्म आज भी मीना कुमारी के जीवंत अभिनय के लिए याद की जाती है।

सहनायक


मीना कुमारी के सिनेमा कैरियर में उनकी जोड़ी फ़िल्म अभिनेता अशोक कुमार के साथ काफ़ी प्रसिद्ध रही। मीना कुमारी और अशोक कुमार की जोड़ी वाली फ़िल्मों में 'तमाशा', 'परिणीता', 'बादबान', 'बंदिश', 'भीगी रात', 'शतरंज', 'एक ही रास्ता', 'सवेरा', 'फरिश्ता', 'आरती', 'चित्रलेखा', 'बेनज़ीर', 'बहू बेग़म', 'जवाब' और 'पाकीज़ा' जैसी फ़िल्में शामिल हैं। हिन्दी फ़िल्म जगत् में 'ट्रेजेडी क्वीन' कही जानी वाली मीना कुमारी की जोड़ी 'ट्रेजेडी किंग' दिलीप कुमार के साथ भी काफ़ी पसंद की गई। मीना कुमारी और दिलीप कुमार की जोड़ी ने 'फुटपाथ', 'आज़ाद', 'कोहिनूर' और 'यहूदी' जैसी फ़िल्मों में एक साथ काम किया।


चरित्र भूमिकाएँ


अभिनय में आई एकरूपता से बचने और स्वंय को चरित्र अभिनेत्री के रूप में स्थापित करने के लिए मीना कुमारी ने खुद को विभिन्न भूमिकाओं में पेश किया। इसके बाद मीना कुमारी ने चरित्र भूमिका वाली 'जवाब' और 'दुश्मन' जैसी कई सुपरहिट फ़िल्मों के जरिए भी दर्शकों के दिल पर राज किया

वर्ष 1962 मीना कुमारी के सिनेमा कॅरियर का अहम पड़ाव साबित हुआ। इस वर्ष उनकी 'आरती', 'मैं चुप रहूंगी' जैसी फ़िल्में प्रदर्शित हुईं। इसके साथ ही इन फ़िल्मों के लिए वे सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के 'फ़िल्मफेयर' पुरस्कार के लिए नामित की गईं। यह 'फ़िल्मफेयर' के इतिहास में पहला ऐसा मौक़ा था, जहाँ एक अभिनेत्री को 'फ़िल्मफेयर' के तीन वर्गों में नामित किया गया था।

सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का 'फ़िल्मफेयर' पुरस्कार

मीना कुमारी को मिले सम्मानों की चर्चा की जाए तो उन्हें अपने अभिनय के लिए चार बार 'फ़िल्मफेयर' पुरस्कार से सम्मानित किया गया। मीना कुमारी को सबसे पहले वर्ष 1953 में प्रदर्शित फ़िल्म 'परिणीता' के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का 'फ़िल्मफेयर' पुरस्कार दिया गया। इसके बाद वर्ष 1954 में भी फ़िल्म 'बैजू बावरा' के लिए उन्हें 'फ़िल्मफेयर' के सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके बाद मीना कुमारी को 'फ़िल्मफेयर' पुरस्कार के लिए लगभग 8 वर्षों तक इंतज़ार करना पड़ा और वर्ष 1963 में प्रदर्शित फ़िल्म 'साहिब बीबी और ग़ुलाम' के लिए उन्हें 'फ़िल्मफेयर' मिला। इसके बाद वर्ष 1966 में फ़िल्म 'काजल' के लिए भी मीना कुमारी सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के 'फ़िल्मफेयर' पुरस्कार से सम्मानित की गईं।

फ़िराक़ गोरखपुरी और मीना कुमारी


मीना कुमारी को फिल्म इंडस्ट्री में 'ट्रेजेडी क्वीन' का दर्जा मिला। फिल्मों के साथ-साथ असल जिंदगी में भी उनके साथ कई दु:खद हादसे हुए। जाने-माने उर्दू शायर फ़िराक़ गोरखपुरी ने एक बार मुशायरा छोड़ दिया था, क्योंकि उन्होंने देखा कि उसमें अभिनेत्री मीरा कुमारी शामिल हो रही हैं। उनका कहना था कि मुशायरे सिर्फ शायरों की जगह हैं। यह वाकया 1959-1960 का है, जब फ़िराक़ गोरखपुरी को एक मुशायरे में आमंत्रित किया गया था। फ़िराक़ गोरखपुरी का असली नाम रघुपति सहाय था। ‘फिराक गोरखपुरी: द पोयट ऑफ पेन एंड एक्सटैसी’ नामक पुस्तक में इस वाकये का जिक्र किया गया है। फ़िराक़ की इस जीवनी के लेखक उनके रिश्तेदार अजय मानसिंह थे।


जब फ़िराक़ मुशायरा स्थल पर पहुंचे तो उनका तालियों की गड़गड़ाहट के साथ स्वागत किया गया और मुशायरे की शुरुआत पूरे जोशो-खरोश के साथ हुई। करीब एक घंटे के बाद वहां ऐलान किया गया कि मौके पर अदाकारा मीना कुमारी पहुंच चुकी हैं। मुशायरे में शामिल लोग शायरों को मंच पर छोड़कर मीना कुमारी की झलक पाने के लिए भागे। इससे नाराज़ फ़िराक़ गोरखपुरी ने मौके से जाने का फैसला किया। इस पर आयोजक उन्हें मनाने की कोशिश में जुट गए। मीना कुमारी ने भी शर्मिंदगी महसूस की और फ़िराक़ से बार-बार गुजारिश की कि वह रुकें। मीना कुमारी ने उनसे कहा, "जनाब, मैं आपको सुनने के लिए आई हूं।" फ़िराक़ ने इस पर तुरंत जवाब दिया, "मुशायरा मुजरा बन चुका है। मैं ऐसी महफिल से ताल्लुक नहीं रखता।"


इसके एक दिन बार फ़िराक़ गोरखपुरी ने कहा, "मैं मीना कुमारी की वजह से वहां से नहीं हटा था। आयोजकों और दर्शकों के व्यवहार के कारण वहां से हटा, जिन्होंने हमारी बेइज्जती की थी।" उनकी दलील थी कि "मुशायरा शायरी का मंच है। यहां के कलाकार सिर्फ शायर होते हैं और यहां की व्यवस्था में एक पदानुक्रम होता है जिसका पालन किया जाना चाहिए।"


डाकू अमृत लाल से मुलाकात


फ़िल्म 'पाकीज़ा' की शूटिंग के दौरान कमाल अमरोही और मीना कुमारी के साथ एक दिलचस्प घटना घटी। मशहूर पत्रिका 'आउटलुक' के संपादक रहे विनोद मेहता ने मीना कुमारी की जीवनी 'मीनाकुमारी- ए क्लासिक बायोग्राफ़ी' नाम से लिखी है, उनके अनुसार- 'आउटडोर शूटिंग पर कमाल अमरोही अक्सर दो कारों पर जाया करते थे। एक बार दिल्ली जाते हुए मध्य प्रदेश में शिवपुरी में उनकी कार में पैट्रोल ख़त्म हो गया। कमाल अमरोही ने कहा कि 'हम रात कार में सड़क पर ही बिताएंगे।'

उनको पता नहीं था कि ये डाकुओं का इलाका है। आधी रात के बाद करीब एक दर्जन डाकुओं ने उनकी कारों को घेर लिया। उन्होंने कारों में बैठे हुए लोगों से कहा कि वह नीचे उतरें। कमाल अमरोही ने कार से उतरने से इंकार कर दिया और कहा कि 'जो भी मुझसे मिलना चाहता है, मेरी कार के पास आए।' थोड़ी देर बाद एक सिल्क का पायजामा और कमीज़ पहने हुए एक शख़्स उनके पास आया। 

उसने पूछा- 'आप कौन हैं?' अमरोही ने जवाब दिया- 'मैं कमाल हूँ और इस इलाके में शूटिंग कर रहा हूँ। हमारी कार का पैट्रोल ख़त्म हो गया है।' डाकू को लगा कि वह रायफ़ल शूटिंग की बात कर रहे हैं। लेकिन जब उसे बताया गया कि ये फ़िल्म शूटिंग है और दूसरी कार में मीना कुमारी भी बैठी हैं, तब उसके हावभाव बदल गए। उसने तुरंत संगीत, नाच और खाने का इंतज़ाम कराया। उन्हें सोने की जगह दी और सुबह उनकी कार के लिए पेट्रोल भी मंगवा दिया। चलते-चलते उसने मीना कुमारी से कहा कि वह नुकीले चाकू से उसके हाथ पर अपना ऑटोग्राफ़ दे दें। जैसे-तैसे मीना कुमारी ने ऑटोग्राफ़ दिए। अगले शहर में जाकर उन्हें पता चला कि उन्होंने मध्य प्रदेश के उस समय के नामी डाकू अमृत लाल के साथ रात बिताई थी।

बीमारी में भी अभिनय


शराब पीने और तंबाकू खाने की लत ने मीना कुमारी के स्वास्थ्य को इतनी बुरी तरह से बिगाड़ा कि वह इससे कभी उबर नहीं पाईं। उनके अंतिम दिनों के साथी और उनकी आख़िरी फ़िल्म 'गोमती के किनारे' के निर्देशक सावन कुमार टाक के अनुसार- "6 दिनों तक तो मेरी फ़िल्म बहुत अच्छी बनी। इसके बाद वह बीमार पड़ गईं। उनका हमेशा ज़ोर रहता था कि किसी भी हालत में फ़िल्म की शूटिंग न रोकी जाए।" हमारा ऐसा भावनात्मक रिश्ता हो गया था कि हम एक-दूसरे को तकलीफ़ देने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे। मीना जी इतनी कमज़ोर हो गई थीं कि शॉट देते समय वह गिर सकती थीं। लोगों को पता नहीं है कि जब वह अभिनय कर रही होती थीं तो मैं उन्हें पीछे से पकड़े हुए होता था और शॉट के बाद उन्हें कुर्सी पर बैठा देता था। मैं उनका एहसानमंद हूँ कि उन्होंने मुझे डायरेक्टर बनाया। उनकी शर्त थी कि अगर तुम फ़िल्म निर्देशित करोगे, तभी मैं ये फ़िल्म करूंगी।"


मृत्यु


अपने आख़िरी दिनों में मीना कुमारी को 'सेंट एलिज़ाबेथ नर्सिंग होम' में भर्ती कराया गया था। नर्सिंग होम के कमरा नंबर 26 में उनके आख़िरी शब्द थे- "आपा, आपा, मैं मरना नहीं चाहती।" जैसे ही उनकी बड़ी बहन ख़ुर्शीद ने उन्हें सहारा दिया, वह कोमा में चली गईं और फिर उससे कभी नहीं उबरीं। लगभग तीन दशक तक अपने संजीदा अभिनय से दर्शकों के दिलों पर राज करने वाली इस महान् अभिनेत्री मीना कुमारी का निधन 31 मार्च, 1972 को हुआ।


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1939 लैदरफ़ेस बेबी महजबीं
अधुरी कहानी बेबी महजबीं
1940 पूजा बीना
एक ही भूल बेबी मीना बेबी महजबीं से बदलकर बेबी मीना नाम रखा गया
1941 नई रोशनी मुन्नी
बहन बीना
कसौटी बेबी मीना
विजय बेबी मीना
1942 गरीब बेबी मीना
1943 प्रतिज्ञा बेबी मीना
1944 लाल हवेली मुक्ता
1946 बच्चों का खेल अनुराधा 13 वर्ष की आयु में बेबी मीना मीना कुमारी बनीं
दुनिया एक सराय तारा
1948 पिया घर आजा
बिछड़े बालम
1949 वीर घटोत्कच सुरेखा
1950 श्री गणेश महिमा सत्याभामा
मगरूर मीनू राय
हमारा घर
1951 सनम रानी
मदहोश सोनी
लक्ष्मी नारायण देवी लक्ष्मी
हनुमान पाताल विजय मकरी
1952 अलादीन और जादुई चिराग राजकुमारी बदर
तमाशा किरण
बैजू बावरा गौरी विजेता – फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार
1953 परिणीता ललिता विजेता – फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार
फुटपाथ माला
दो भीगा ज़मीन ठकुराइन भारत की पहली फ़िल्म जिसे कांन्स फ़िल्म समारोह-1954 में पुरस्कृत किया गया।
दाना पानी
दायरा शीतल
नौलखा हार बिजमा
1954 इल्ज़ाम कमली
चाँदनी चौक ज़रीना बेगम
बादबाँ
1955 रुखसाना
बंदिश ऊषा सेन
आज़ाद शोभा नामांकित – फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार
अद्ल-ए-जहांगीर ज़रीना
1956 नया अंदाज़ माला
शतरंज संध्या
मेम साहिब मीना
हलाकू नीलोफर नादिर
एक ही रास्ता मालती
बंधन बानी
1957 शारदा शारदा राम शरण विजेता – सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री, बंगाल फ़िल्म जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन पुरस्कार
मिस मैरी मिस मैरी/लक्ष्मी
1958 यहूदी हन्ना
सवेरा शांति
सहारा लीला नामांकित – फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार
फरिश्ता शोभा
1959 सट्टा बाज़ार जमुना
शरारत शभनम
मधु मधु
जागीर ज्योति
चिराग कहाँ रोशनी कहाँ रत्ना नामांकित - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार
चाँद बिमला
चार दिल चार राहें चवली
अर्द्धांगिनी छाया
1960 दिल अपना और प्रीत पराई करूणा
बहाना
कोहिनूर राजकुमारी चंद्रमुखी
1961 ज़िंदगी और ख्वाब शांति
भाभी की चूड़ियाँ गीता
प्यार का सागर राधा / रानी गुप्ता
1962 साहिब बीबी और ग़ुलाम छोटी बहू (सती लक्ष्मी) विजेता – फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार
फ़िल्म को 13वें बर्लिन अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह में नामांकित किया गया जहाँ मीना कुमारी को प्रतिनिधि के तौर पर चुना गया।

यह फ़िल्म 36वें अकादमी पुरस्कार के सर्वश्रेष्ठ विदेशीय भाषा वर्ग में भारत द्वारा भेजी गई थी।

मैं चुप रहूंगी गायत्री नामांकित-फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार
आरती आरती गुप्ता विजेता – सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री बंगाल फ़िल्म जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन पुरस्कार
नामांकित-फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार

1963 किनारे किनारे नीलू
दिल एक मन्दिर सीता विजेता – सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री बंगाल फ़िल्म जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन पुरस्कार
नामांकित-फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार

अकेली मत जाइयो सीमा
1964 सांझ और सवेरा गौरी
गज़ल नाज़ आरा बेगम
चित्रलेखा चित्रलेखा मीना कुमारी की पहली रंगीन फ़िल्म।
बेनज़ीर बेनज़ीर
मैं भी लड़की हूँ रजनी
1965 भीगी रात नीलिमा
पूर्णिमा पूर्णिमा लाल
काजल माधवी विजेता – फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार
1966 पिंजरे के पंछी हीना शर्मा
फूल और पत्थर शांति नामांकित – फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार
1967 मझली दीदी हेमांगिनी 41वें अकादमी पुरस्कार के सर्वश्रेष्ठ विदेशीय भाषा वर्ग में भारत द्वारा भेजी गई फ़िल्म।
नूरजहाँ मिहर-उन-निसा (नूरजहाँ)
चन्दन का पालना शोभा राय
बहू बेगम ज़ीनत जहां बेगम
1968 बहारों की मंज़िल नंदा रॉय / राधा शुक्ला
अभिलाषा मीना सिंह
1970 जवाब विद्या
सात फेरे
1971 मेरे अपने आनंदी देवी
1972 दुश्मन मालती
पाकीज़ा नरगिस / साहिबजान विजेता - विशेष बंगाल फ़िल्म जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन पुरस्कार
नामांकित - फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार (मरणोपरांत) इस फ़िल्म की कॉस्ट्यूम डिज़ाइनर भी थीं।

गोमती के किनारे गंगा आखिरी फ़िल्म

मीना कुमारी (मृत्यु)

मीना कुमारी🎂1अगस्त 1933⚰️मार्च 31, 1972
मीना कुमारी
जन्म
महजबीं बानो
1 अगस्त 1933
मीठावाला चाॅल बंबई, ब्रिटिश भारत
मौत
मार्च 31, 1972 (उम्र 38 वर्ष)
मुंबई, महाराष्ट्र, भारत
मौत की वजह
लिवर का कैंसर
समाधि
रहमताबाद कब्रिस्तान, मुम्बई
राष्ट्रीयता
भारतीय
उपनाम
ट्रेजडी क्वीन, मीनाजी, मंजू, भारतीय सिनेमा की सिंड्रेला, नाज़ (तखल्लुस)
पेशा
अभिनेत्री, पार्श्वगायिका, शायरा, कॉस्ट्यूम डिज़ाइनर
ऊंचाई
5'3"
जीवनसाथी
कमाल अमरोही (वि॰ 1952–64) (अलगाव)
संबंधी
महमूद (जीजा)
रहमताबाद कब्रिस्तान, मुम्बई
पुरस्कार
फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार
1954: बैजू बावरा
1955: परिणीता
1963: साहिब बीबी और ग़ुलाम
1966: काजल

बंगाल फ़िल्म पत्रकार संगठन पुरस्कार
1958: शारदा
1963: आरती
1965: दिल एक मंदिर
1973: पाक़ीज़ा (मरणोपरांत)
महजबीं बानो
मीनाकुमारी 

जन्म व बचपन

मीना कुमारी का असली नाम महजबीं बानो था और ये बंबई में पैदा हुई थीं। उनके पिता अली बक्श पारसी रंगमंच के एक मँझे हुए कलाकार थे और उन्होंने फ़िल्म "शाही लुटेरे" में संगीत भी दिया था। उनकी माँ प्रभावती देवी (बाद में इकबाल बानो), भी एक मशहूर नृत्यांगना और अदाकारा थी। मीना कुमारी की बड़ी बहन खुर्शीद जुनियर और छोटी बहन मधु (बेबी माधुरी) भी फिल्म अभिनेत्री थीं। कहा जाता है कि दरिद्रता से ग्रस्त उनके पिता अली बक़्श उन्हें पैदा होते ही अनाथाश्रम में छोड़ आए थे चूँकि वे उनके डाॅक्टर श्रीमान गड्रे को उनकी फ़ीस देने में असमर्थ थे।हालांकि अपने नवजात शिशु से दूर जाते-जाते पिता का दिल भर आया और तुरंत अनाथाश्रम की ओर चल पड़े।पास पहुंचे तो देखा कि नन्ही मीना के पूरे शरीर पर चीटियाँ काट रहीं थीं।अनाथाश्रम का दरवाज़ा बंद था, शायद अंदर सब सो गए थे।यह सब देख उस लाचार पिता की हिम्मत टूट गई,आँखों से आँसु बह निकले।झट से अपनी नन्हीं-सी जान को साफ़ किया और अपने दिल से लगा लिया।अली बक़्श अपनी चंद दिनों की बेटी को घर ले आए।समय के साथ-साथ शरीर के वो घाव तो ठीक हो गए किंतु मन में लगे बदकिस्मती के घावों ने अंतिम सांस तक मीना का साथ नहीं छोड़ा। मीना कुमारी की नानी हेमसुन्दरी मुखर्जी पारसी रंगमंच से जुड़ी हुईं थी। बंगाल के प्रतिष्ठित टैगोर परिवार के पुत्र जदुनंदन टैगोर (1840-62) ने परिवार की इच्छा के विरूद्ध हेमसुन्दरी से विवाह कर लिया। 1862 में दुर्भाग्य से जदुनंदन का देहांत होने के बाद हेमसुन्दरी को बंगाल छोड़कर मेरठ आना पड़ा। यहां अस्पताल में नर्स की नौकरी करते हुए उन्होंने एक उर्दू के पत्रकार प्यारेलाल शंकर मेरठी (जो कि ईसाई था) से शादी करके ईसाई धर्म अपना लिया। हेमसुन्दरी की दो पुत्री हुईं जिनमें से एक प्रभावती, मीना कुमारी की माँ थीं।

मीना कुमारी एक पार्श्व गायिका भी थीं। उन्होंने 1945 तक बहन जैसी फिल्मों के लिए एक बाल कलाकार के रूप में गाया। एक नायिका के रूप में, उन्होंने दुनिया एक सराय (1946), पिया घर आजा (1948), बिछड़े बालम (1948) और पिंजरे के पंछी (1966) जैसी फिल्मों के गीतों को अपनी आवाज दी। उन्होंने पाकीज़ा (1972) के लिए भी गाया, हालांकि, इस गाने का फिल्म में इस्तेमाल नहीं किया गया था और बाद में इसे पाकीज़ा-रंग बा रंग (1977) एल्बम में रिलीज़ किया गया था।

वर्ष 1951 में फिल्म तमाशा के सेट पर मीना कुमारी की मुलाकात उस ज़माने के जाने-माने फिल्म निर्देशक कमाल अमरोही से हुई जो फिल्म महल की सफलता के बाद निर्माता के तौर पर अपनी अगली फिल्म अनारकली के लिए नायिका की तलाश कर रहे थे।मीना का अभिनय देख वे उन्हें मुख्य नायिका के किरदार में लेने के लिए राज़ी हो गए।दुर्भाग्यवश 21 मई 1951 को मीना कुमारी महाबलेश्वरम के पास एक सड़क दुर्घटना का शिकार हो गईं जिससे उनके बाहिने हाथ की छोटी अंगुली सदा के लिए मुड़ गई। मीना अगले दो माह तक बम्बई के ससून अस्पताल में भर्ती रहीं और दुर्घटना के दूसरे ही दिन कमाल अमरोही उनका हालचाल पूछने पहुँचे। मीना इस दुर्घटना से बेहद दुखी थीं क्योंकि अब वो अनारकली में काम नहीं कर सकती थीं। इस दुविधा का हल कमाल अमरोही ने निकाला, मीना के पूछने पर कमाल ने उनके हाथ पर अनारकली के आगे 'मेरी' लिख डाला।इस तरह कमाल मीना से मिलते रहे और दोनों में प्रेम संबंध स्थापित हो गया।

14 फरवरी 1952 को हमेशा की तरह मीना कुमारी के पिता अली बख़्श उन्हें व उनकी छोटी बहन मधु को रात्रि 8 बजे पास के एक भौतिक चिकित्सकालय (फिज़्योथेरेपी क्लीनिक) छोड़ गए। पिताजी अक्सर रात्रि 10 बजे दोनों बहनों को लेने आया करते थे।उस दिन उनके जाते ही कमाल अमरोही अपने मित्र बाक़र अली, क़ाज़ी और उसके दो बेटों के साथ चिकित्सालय में दाखिल हो गए और 19 वर्षीय मीना कुमारी ने पहले से दो बार शादीशुदा 34 वर्षीय कमाल अमरोही से अपनी बहन मधु, बाक़र अली, क़ाज़ी और गवाह के तौर पर उसके दो बेटों की उपस्थिति में निक़ाह कर लिया। 10 बजते ही कमाल के जाने के बाद, इस निक़ाह से अपरिचित पिताजी मीना को घर ले आए।इसके बाद दोनों पति-पत्नी रात-रात भर बातें करने लगे जिसे एक दिन एक नौकर ने सुन लिया।बस फिर क्या था, मीना कुमारी पर पिता ने कमाल से तलाक लेने का दबाव डालना शुरू कर दिया। मीना ने फैसला कर लिया की तबतक कमाल के साथ नहीं रहेंगी जबतक पिता को दो लाख रुपये न दे दें।पिता अली बक़्श ने फिल्मकार महबूब खान को उनकी फिल्म अमर के लिए मीना की डेट्स दे दीं परंतु मीना अमर की जगह पति कमाल अमरोही की फिल्म दायरा में काम करना चाहतीं थीं।इसपर पिता ने उन्हें चेतावनी देते हुए कहा कि यदि वे पति की फिल्म में काम करने जाएँगी तो उनके घर के दरवाज़े मीना के लिए सदा के लिए बंद हो जाएँगे। 5 दिन अमर की शूटिंग के बाद मीना ने फिल्म छोड़ दी और दायरा की शूटिंग करने चलीं गईं।उस रात पिता ने मीना को घर में नहीं आने दिया और मजबूरी में मीना पति के घर रवाना हो गईं। अगले दिन के अखबारों में इस डेढ़ वर्ष से छुपी शादी की खबर ने खूब सुर्खियां बटोरीं।

पति से अलगाव और शराब की लत

अपनी शादी के बाद, कमाल अमरोही ने मीना कुमारी को अपने फ़िल्मी करियर को जारी रखने की अनुमति दी, लेकिन इस शर्त पर कि वे अपने मेकअप रूम में उनके मेकअप आर्टिस्ट के अलावा किसी और पुरूष को नहीं बुलाएंगी और हर शाम 6:30 बजे तक केवल अपनी कार में ही घर लौटेंगी| मीना कुमारी सभी शर्तों से सहमत थीं, लेकिन समय बीतने के साथ वे उन्हें तोड़ती रहीं। साहिब बीबी और गुलाम के निर्देशक अबरार अल्वी ने सुनाया कि कैसे कमाल अमरोही अपने जासूस और दाएं हाथ के आदमी बाकर अली को मेकअप रूम में मीना पर निगाह रखने के लिए रखते थे, और एक शाम जब एक शॉट पूरा करने के लिए शेड्यूल से परे काम कर रही थी, तब उन्हें बिलखती हुई मीना का सामना करना पड़ा था।

1963 में, साहिब बीबी और गुलाम को बर्लिन फिल्म समारोह में भारतीय प्रविष्टि के रूप में चुना गया और मीना कुमारी को एक प्रतिनिधि के रूप में चुना गया। तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री सत्य नारायण सिन्हा ने दो टिकटों की व्यवस्था की, एक मीना कुमारी के लिए और दूसरा उनके पति के लिए, लेकिन कमाल अमरोही ने अपनी पत्नी के साथ जाने से इनकार कर दिया जिस कारण बर्लिन की यात्रा कभी नहीं हुई। इरोस सिनेमा में एक प्रीमियर के दौरान, सोहराब मोदी ने मीना कुमारी और कमाल अमरोही को महाराष्ट्र के राज्यपाल से मिलवाया। सोहराब मोदी ने कहा "यह प्रसिद्ध अभिनेत्री मीना कुमारी हैं, और यह उनके पति कमाल अमरोही हैं"। बधाई देने से पहले, कमाल अमरोही ने कहा, "नहीं, मैं कमाल अमरोही हूं और यह मेरी पत्नी, प्रसिद्ध अभिनेत्री मीना कुमारी हैं"। यह कहते हुए कमाल अमरोही सभागार से चले गए। मीना कुमारी ने अकेले प्रीमियर देखा। मीना कुमारी को उनकी शादी में शारीरिक शोषण का शिकार होना पड़ा। उनकी जीवनी के लेखक विनोद मेहता बताते हैं कि हालांकि अमरोही ने इस तरह के आरोपों से बार-बार इनकार किया, उन्होंने छह अलग-अलग स्रोतों से जाना कि वह वास्तव में एक पीड़ित थी। 1972 में उनकी मृत्यु के बाद, साथी अभिनेत्री नरगिस ने उनके बारे में एक निबंध लिखा, जो एक उर्दू पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। नरगिस ने उल्लेख किया कि मैं चुप राहुंगी के एक आउटडोर शूट पर, जब वे दोनों बगल के कमरे साझा कर रहीं थीं, उन्होंने स्वयं भी बगल के कमरे से शोर सुना। अगले दिन, वह एक सूजी हुई आंखों वाली कुमारी से मिली, जो शायद पूरी रात रोई थी। इस तरह की अफवाहों को फ़िल्म पिंजरे के पंछी के मूहर्त पर उनका आधार मिला। 5 मार्च 1964 को, कमाल अमरोही के सहायक, बाकर अली ने मीना कुमारी को थप्पड़ मार दिया जब उन्होंने गुलज़ार को अपने मेकअप रूम में प्रवेश करने की अनुमति दी। कुमारी ने तुरंत अमरोही को फिल्म के सेट पर आने के लिए बुलाया लेकिन वह कभी नहीं आए। इसके बजाय, अमरोही ने मीना को घर आने के लिए कहा ताकि वे तय कर सकें के आगे क्या करना है। इसने न केवल मीना कुमारी को नाराज़ किया बल्कि उनके पहले से तनावपूर्ण संबंधों में अंतिम तिनके के रूप में भी काम किया। मीना सीधे अपनी बहन मधु के घर गईं। जब कमाल अमरोही उन्हें वापस लाने के लिए वहां गए, तो बार-बार मनाने के बाद भी उन्होंने अमरोही से बात करने से इनकार कर दिया। उसके बाद, न तो अमरोही ने मीना को वापस लाने की कोशिश की और न ही मीना कुमारी वापस लौटीं। कुमारी की मृत्यु के बाद अपने कार्यक्रम फूल खिले हैं गुलशन गुलशन पर जब तबस्सुम ने कमाल अमरोही से मीना कुमारी के बारे में पूछा तब अमरोही ने मीना को "एक अच्छी पत्नी नहीं बल्कि एक अच्छी अभिनेत्री के रूप में याद किया, जो खुद को घर पर भी एक अभिनेत्री मानती थी।"

स्वछंद प्रवृति की मीना अमरोही से 1964 में अलग हो गयीं। उनकी फ़िल्म पाक़ीज़ा को और उसमें उनके रोल को आज भी सराहा जाता है। शर्मीली मीना के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं कि वे कवियित्री भी थीं लेकिन कभी भी उन्होंने अपनी कवितायें छपवाने की कोशिश नहीं की। उनकी लिखी कुछ उर्दू की कवितायें नाज़ के नाम से बाद में छपी।

⚰️फ़िल्म पाक़ीज़ा के रिलीज़ होने के तीन हफ़्ते बाद मीना कुमारी की तबीयत बिगड़ने लगी। 28 मार्च 1972 को उन्हें बम्बई के सेंट एलिज़ाबेथ अस्पताल में दाखिल करवाया  गया।31 मार्च 1972, गुड फ्राइडे वाले दिन दोपहर 3 बजकर 25 मिनट पर महज़ 38 वर्ष की आयु में मीना कुमारी ने अंतिम सांस ली। पति कमाल अमरोही की इच्छानुसार उन्हें बम्बई के मज़गांव स्थित रहमताबाद कब्रिस्तान में दफनाया गया। मीना के पति कमाल अमरोही की 11 फरवरी 1993 को मृत्यु हुई और उनकी इच्छनुसार उन्हें मीना के बगल में दफनाया गया।

मीना कुमारी हमेशा बड़े पैमाने पर फिल्म निर्माताओं के बीच रुचि का विषय रही हैं। 2004 में, उनकी फिल्म साहिब बीबी और गुलाम का एक आधुनिक रूपांतर प्रीतीश नंदी कम्युनिकेशंस द्वारा किया जाना था, जिसमें ऐश्वर्या राय और बाद में प्रियंका चोपड़ा को उनकी छोटी बहू की भूमिका को चित्रित करना था। हालांकि, फिल्म को निर्देशक ऋतुपॉर्नो घोष द्वारा बाद में इसे एक धारावाहिक के रूप में बनाया गया, जिसमें अभिनेत्री रवीना टंडन ने इस भूमिका को निभाया।

2015 में, यह बताया गया कि तिग्मांशु धूलिया को हिंदी सिनेमा की ट्रेजेडी क्वीन पर एक फिल्म बनानी थी, जो विनोद मेहता की किताब "मीना कुमारी - द क्लासिक बायोग्राफी" का स्क्रीन रूपांतरण होना था। अभिनेत्री कंगना रनौत को कुमारी को चित्रित करने के लिए संपर्क किया गया था, लेकिन प्रामाणिक तथ्यों की कमी और मीना कुमारी के सौतेले बेटे ताजदार अमरोही के कड़े विरोध के बाद फिल्म को फिर से रोक दिया गया था।

2017 में, निर्देशक करण राजदान ने भी उन पर एक आधिकारिक बायोपिक निर्देशित करने का फैसला किया। इसके लिए, उन्होंने माधुरी दीक्षित और विद्या बालन से फ़िल्मी पर्दे पर मीना कुमारी की भूमिका निभाने के लिए संपर्क किया, लेकिन कई कारणों के कारण, दोनों ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। बाद में उन्होंने अभिनेत्री सन्नी लियोन की ओर रुख किया, जिन्होंने इस किरदार में बहुत दिलचस्पी दिखाई। ऋचा चड्ढा, जया प्रदा और जान्हवी कपूर सहित कई अन्य अभिनेत्रियों ने भी शानदार आइकन की भूमिका निभाने की इच्छा व्यक्त की।

2018 में, निर्माता और पूर्व बाल कलाकार कुट्टी पद्मिनी ने गायक मोहम्मद रफ़ी और अभिनेता-निर्देशक जे पी चंद्रबाबू के साथ एक वेब श्रृंखला के रूप में मीना कुमारी पर एक बायोपिक बनाने की घोषणा की। पद्मिनी ने मीना कुमारी के साथ फिल्म दिल एक मंदिर में काम किया है और इस बायोपिक के साथ दिवंगत अभिनेत्री को सम्मानित करना चाहती हैं।

2019 में, संजय लीला भंसाली ने कुमारी की 1952 की क्लासिक बैजू बावरा के रीमेक की घोषणा की, जिसमें आलिया भट्ट ने गौरी के चरित्र को दोहराया, एक भूमिका जो मूल रूप से कुमारी द्वारा निभाई गई थी। अभिनेत्री दीपिका पादुकोण ने भी उसी फिल्म में कुमारी की भूमिका निभाने की इच्छा व्यक्त की। फिल्म की शूटिंग जो अक्टूबर 2021 से शुरू होनी थी, अभी तक शुरू नहीं हुई है।

2020 में, ऑलमाइटी मोशन पिक्चर्स ने मीना कुमारी के जीवन पर एक वेब श्रृंखला की घोषणा की, जो पत्रकार अश्विनी भटनागर द्वारा लिखित स्टारिंग.. महजबीन के रूप में मीना कुमारी पर आधारित है। इसके बाद ताजदार अमरोही की आपत्ति आई जिन्होंने पत्रकार पर दिवंगत अभिनेत्री की जीवनी न केवल उनकी सहमति के बिना लिखने का आरोप लगाया बल्कि कमाल अमरोही को एक पीड़ा के रूप में चित्रित करने का भी आरोप लगाया। भटनागर ने बाद में स्पष्ट किया कि पुस्तक में कभी भी अमरोही का नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा और यह मुख्य रूप से मीना कुमारी के पेशेवर जीवन पर केंद्रित थी। बाद में उन्होंने तर्क दिया कि कुमारी एक सार्वजनिक हस्ती थीं और कोई भी कला का एक काम बनाने की अनुमति देने के अपने अधिकार का दावा नहीं कर सकता है। श्रृंखला जिसके बाद एक फीचर फिल्म होगी, निर्माता प्रभलीन कौर संधू द्वारा निर्देशित की जाएगी। 2021 में, हीरामंडी की कास्टिंग के दौरान, फिल्म निर्माता संजय लीला भंसाली ने स्पष्ट रूप से मीना कुमारी की पाकीज़ा को इस वेब श्रृंखला के निर्माण के पीछे अपनी प्रेरणा बताया, जो लाहौर के दरबारियों के जीवन के इर्द-गिर्द घूमती है। अभिनेत्री आलिया भट्ट ने गंगूबाई काठियावाड़ी में एक वेश्या की भूमिका की तैयारी के लिए मीना कुमारी की फिल्में देखने का भी उल्लेख किया।

फरवरी 2022 में, म्यूजिक लेबल सारेगामा और अभिनेता बिलाल अमरोही (कमल अमरोही के पोते) ने फिल्म पाकीजा के निर्माण की पृष्ठभूमि में कुमारी और उनके फिल्म निर्माता पति कमाल अमरोही की प्रेम कहानी पर एक वेब श्रृंखला की घोषणा की। यूडली फिल्मों द्वारा निर्देशित श्रृंखला के 2023 में शूरु होने की उम्मीद है। अगले महीने, यह बताया गया कि कृति सैनॉन को टी-सीरीज़ द्वारा नियोजित एक बायोपिक में कुमारी की भूमिका निभाने के लिए संपर्क किया गया है। हालांकि, अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।
🎥
1939 
लैदरफ़ेस 
अधुरी कहानी
1940
 पूजा 
एक ही भूल
1941 
नई रोशनी 
बहन 
कसौटी 
विजय
1942 गरीब 
1943 प्रतिज्ञा 
1944 लाल हवेली
1946 
बच्चों का खेल
दुनिया एक सराय
1948
 पिया घर आजा 
बिछड़े बालम 
1949 वीर घटोत्कच
1950 
श्री गणेश महिमा 
मगरूर 
हमारा घर
1951 
सनम 
मदहोश 
लक्ष्मी नारायण 
हनुमान पाताल विजय
1952 
अलादीन और जादुई चिराग
तमाशा 
बैजू बावरा
1953 
परिणीता
फुटपाथ 
दो भीगा ज़मीन
दाना पानी 
दायरा 
नौलखा हार
1954 
इल्ज़ाम 
चाँदनी चौक 
बादबाँ
ज़रीना बेगम 
1955
 रुखसाना 
बंदिश 
आज़ाद
अद्ल-ए-जहांगीर
1956 
नया अंदाज़ 
शतरंज 
मेम साहिब 
हलाकू 
एक ही रास्ता 
बंधन
1957
 शारदा
मिसमेरी
1958
 यहूदी 
सवेरा 
सहारा 
फरिश्ता
1959 
सट्टा बाज़ार 
शरारत 
मधु 
जागीर 
चिराग कहाँ रोशनी कहाँ 
चाँद बिमला 
चार दिल चार राहें 
अर्द्धांगिनी
1960 
दिल अपना और प्रीत पराई 
बहाना 
कोहिनूर
1961 
ज़िंदगी और ख्वाब 
भाभी की चूड़ियाँ 
प्यार का सागर
1962 
साहिब बीबी और ग़ुलाम
आरती
मै चुप रहूंगी
1963 
किनारे किनारे 
दिल एक मन्दिर 
अकेली मत जाइयो
1964 
सांझ और सवेरा 
गज़ल 
चित्रलेखा चित्रलेखा मीना कुमारी की पहली रंगीन फ़िल्म।
बेनज़ीर 
मैं भी लड़की हूँ
1965 
भीगी रात 
पूर्णिमा 
काजल
1966
 पिंजरे के पंछी 
फूल और पत्थर
1967
 मझली दीदी 
नूरजहाँ 
चन्दन का पालना 
बहू बेगम
1968 
बहारों की मंज़िल 
अभिलाषा
1970 
जवाब 
सात फेरे 
1971 मेरे अपने
1972
 दुश्मन 
पाकीज़ा
गोमति के किनारे

कुलवंत जानी (मृत्यु)

🎂14जुलाई1940⚰️31 मार्च 2018  ⚰️30 सितंबर 2004
कुलवंत जानी
🎂14जुलाई⚰️31 मार्च 2018 कुछ ⚰️30 सितंबर 2004 को हुई बताते है जिस में विवाद है।
कुलवंत जानी कुलवंत जानी (14 जुलाई 1940-30 सितंबर 2004) बॉलीवुड में एक फिल्म लेखक और गीतकार थे।  उन्होंने 72 हिंदी फिल्मों में 198 गाने लिखे हैं।  कुलवंत जानी के टॉप गाने हैं दिल के टुकड़े-टुकड़े करके..., भेजा है बुलावा तूने शेरावालिये..., कसम कली की... और मैं तेरे मन की मैना होती तू मेरे मन.... उन्हें सूर्यवंशी के लिए जाना जाता है।  (1992), ईमानदार (1987) और कल की आवाज (1998), फैसला मैं करूंगी (1995) और कई अन्य फिल्में।  

कुलवंत जानी का जन्म 14 जुलाई 1940 को हुआ था और उनकी मृत्यु 30 सितंबर 2004 को हुई थी। कोई अधिक विवरण नहीं मिलता है। पर कुलवंत जानी
🎂14जुलाई
⚰️31 मार्च 2018 भी है 
पेशा:- गीतकार, संवाद, पटकथा, कहानी लेखक
लिंग पुरुष
कुलवंत सिंह जानी उम्र 64 वर्ष की कैंसर से एक साल की लंबी लड़ाई के बाद 28 मार्च को सुबह 9:19 बजे उनके परिवार के आराम के बीच उनके घर में मृत्यु हो गई। जानी का जन्म पुंछ भारत में हुआ था और वह छोटी उम्र से ही अमेरिका में रहने की इच्छा रखते थे। एक बड़े परिवार में गरीब होने के कारण उन्हें स्कूल छोड़कर काम करने के लिए मजबूर होना पड़ा। जानी ने अपने जीवनकाल में कई तरह की नौकरियाँ कीं और पूरे भारत और यूरोप की यात्रा की। कठिन परिस्थितियों और बाधाओं के बावजूद वह अमेरिका जाने के अपने सपने को साकार करने में सफल रहे। जिन उपलब्धियों पर उन्हें सबसे अधिक गर्व था उनमें से एक थी वारविक ब्लव्ड पर स्थित एक स्थानीय सुविधा स्टोर जानी फूड मार्ट की स्थापना करना। हम सभी जानी को एक दयालु व्यक्ति के रूप में याद करते हैं जो किसी भी कमरे में जाने पर उसे रोशन करने की क्षमता रखता था। वह हर किसी से प्यार करता था चाहे आप श्वेत मुस्लिम काले बैपटिस्ट हों; उन्होंने हर किसी को सिर्फ इंसान के रूप में देखा। 
उनका मानना ​​था कि हर किसी में ईश्वर का एक अंश है। कृपया कुलवंत सिंह जानी के जीवन को मनाने के लिए शनिवार 31 मार्च 2018 को हमसे जुड़ें। अंतिम संस्कार सेवा वेमाउथ अंतिम संस्कार गृह में सुबह 11 बजे से दोपहर 1 बजे तक आयोजित की जाएगी: 12746 नेट्टल्स ड्राइव न्यूपोर्ट न्यूज़ वीए 23606। अंतिम संस्कार के बाद चेसापीक गुरुद्वारा में प्रार्थना और दोपहर का भोजन किया जाएगा: 780 फिनक लेन चेसापीक वीए 23320। व्यवस्थाएं वेमाउथ द्वारा की जाती हैं अंतिम संस्कार की जगह।

हिंदी फिल्मों और एल्बमों के 100 से अधिक गानों के बोल, वीडियो और विस्तृत जानकारी, जिनके बोल गीतकार - कुलवंत जानी द्वारा लिखे गए हैं।
कुलवंत सिंह एक भारतीय फिल्म निर्माता हैं ,जो मुख्य तौर से हिंदी सिनेमा में सक्रिय हैं।Kulwant Singh Jani Suryavanshi (1992), Kal Ki Awaz (1992) और Muqadder (1998) में अपने काम के लिए मशहूर हैं।

✍️कुलवंत जानी गीतकार और संगीतकार
कुलवंत जानी बॉलीवुड के मशहूर संगीतकार और गीतकार हैं। फ़िल्में : संगीत विभाग: 1998 घर बाज़ार (गीतकार - कुलवंत जानी के रूप में) 1995 फ़ैसला मैं करुंगी (गीतकार) 1994 मोहब्बत की आरज़ू (गीतकार - कुलवंत जानी के रूप में) 1993 एक ही रास्ता (गीतकार - कुलवंत जानी) 1992 सूर्यवंशी (गीतकार) 1990 कसम झूठ की (गीतकार - कुलवंत जानी के रूप में) 1989 गोला बारूद (गीतकार - कुलवंत जानी) 1989 दो क़ैदी (गीतकार) 1988 धर्मयुद्ध (गीतकार - कुलवंत जानी के रूप में) 1987 कौन जीता कौन हारा (गीतकार - कुलवंत जानी) 1987 मददगार (गीतकार - कुलवंत जानी के रूप में) 1986 मोहब्बत की कसम (गीत - कुलवंत जानी के रूप में) 1985 कला सूरज (गीतकार - कुलवंत जानी) 1985 ज़ुल्म का बदला (गीतकार - कुलवंत जानी) 1985 पत्थर (गीतकार - कुलवंत जानी के रूप में) 1984 सरदार (गीतकार) 1982 अफ़्रीका का आदमी और भारत की लड़की (गीतकार - कुलवंत जानी के रूप में) 1982 राख और चिंगारी (गीतकार) 1981 ज्वाला डाकू (गीतकार - कुलवंत जानी के रूप में) 1980 एक बार कहो (गीतकार - कुलवंत जानी) 1979 दादा (गीतकार) 1979 शैतान मुजरिम (गीतकार - कुलवंत जानी के रूप में) 1977 महा बदमाश (गीतकार) 1977 पापी (गीतकार - कुलवंत जानी के रूप में) 1976 लगाम (गीतकार) 1975 जग्गू (गीतकार - कुलवंत जानी के रूप में) 1974 हमराही (गीतकार) 1974 एक लड़की बदनाम सी (गीतकार - कुलवंत जानी के रूप में) 1972 ललकार (द चैलेंज) (गीतकार) लेखक : 1995 मुक़द्दर (संवाद - कुलवंत जानी के रूप में) 1992 कल की आवाज़ (पटकथा - कुलवंत जानी) 1992 सूर्यवंशी (संवाद - कुलवंत जानी के रूप में) 1987 ईमानदार (कहानी - कुलवंत जानी के रूप में) 1986 अधिकार (संवाद - कुलवंत जानी के रूप में) 1983 धरती आकाश (टीवी मूवी) (संवाद - कुलवंत जानी के रूप में) / (पटकथा - कुलवंत जानी के रूप में) 1982 तेरी मेरी कहानी (टीवी मूवी) (संवाद - कुलवंत जानी के रूप में) 1979 हम तेरे आशिक हैं (अतिरिक्त संवाद - कुलवंत जानी के रूप में) / (अतिरिक्त पटकथा - कुलवंत जानी के रूप में) 1974 ठोकर (गीतकार - कुलवंत जानी के रूप में) गीत संगीत : 1989 गोला बारूद (गीत: "डोली उठेगी.. आज तेरी बहना", "सिपाही मेरे पीछे पह गया", "दर्द दिल का मेरे इलाज करदे", "याद आई", "शब्बा शब्बा.. क्या रात है") 1989 दो क़ैदी (गीत: "ये चली वो चली चुराके ले चली") 1982 अफ़्रीका का आदमी और भारत की लड़की (गीत: "किसी को मुजरिम")

 🎬 कुलवंत जानी की फिल्मोग्राफी - 2000 दलाल नंबर 1: गीतकार
 1998 आग और तेजाब: गीतकार घर बाजार: गीतकार 
1997 कौन रोकेगा मुझे: गीतकार दुनिया की रंगीन रातें: गीतकार ये इश्क इश्क है: पटकथा लेखक, कहानी लेखक, - संवाद लेखक और गीतकार  
1996 सिन्दूर की होली: गीतकार पुलिस के घेरे मैं: गीतकार 
1995 सौदा: गीतकार फैसला मैं करूंगी: गीतकार 
1994 हम हैं बेमिसाल: गीतकार मोहब्बत की आरज़ू: गीतकार रखवाले: गीतकार 1993 मुकाबला: गीतकार आजा मेरी जान: गीतकार एक ही रास्ता:  गीतकार 1992 जेठा: गीतकार बहू बेटा और मां: गीतकार कल की आवाज: पटकथा लेखक सूर्यवंशी: गीतकार अप्राधिनी: गीतकार, संवाद लेखक
 1991 कसम कली की: गीतकार टेस्ट ट्यूब बेबी: गीतकार पक्का बदमाश: गीतकार 
1990 छोटू का बदला: गीतकार मां कसम बदला लूंगा  : गीतकार 
1989 वक्त की जंजीर : गीतकार गोला बारूद : गीतकार दो कैदी : गीतकार खुली खिड़की : गीतकार 
1988 मेरा मुकद्दर : गीतकार ये प्यार नहीं : गीतकार धर्मयुद्ध : पटकथा लेखक, कहानीकार, - संवाद लेखक एवं गीतकार 1987 मेरा लहू : गीतकार
           मददगार: गीतकार हमारी जंग: गीतकार फकीर बादशाह: गीतकार कौन जीता, कौन हारा: गीतकार, संवाद
 1986 मोहब्बत की कसम: गीतकार अधिकार: संवाद लेखक अनोखी दुल्हन: गीतकार 
1985 पत्थर: गीतकार बेपनाह: संवाद लेखक काला सूरज: गीतकार जुल्म का बदला:  गीतकार 
1983 लाल चुनरिया: गीतकार गुमनाम है कोई: गीतकार सरदार: गीतकार 
1982 राख और चिंगारी: गीतकार सुराग: गीतकार बेगुनाह कैदी: गीतकार
 1981 अरमान: गीतकार प्रेम रहस्य: गीतकार लड़ाकू: गीतकार ज्वाला डाकू:  गीतकार 
1980 प्यारा दुश्मन: गीतकार मेरा सलाम: गीतकार शैतान मुजरिम: गीतकार एक बार कहो: गीतकार आखिरी इंसाफ: गीतकार 
1979 सांच को आंच नहीं: गीतकार इकरार: गीतकार 
1978 दादा: गीतकार 
1977 पापी: गीतकार महा बदमाश: गीतकार अलीबाबा मरजीना: गीतकार 197 6  लगाम: गीतकार 
1975 बॉम्बे टाउन: गीतकार जग्गू: गीतकार धोती लोटा और चौपाटी: गीतकार समस्या: गीतकार 
1974 हमराही: गीतकार गाल गुलाबी नैन शराबी: गीतकार ठोकर: गीतकार एक लड़की बदनाम सी  : गीतकार
1972 दरार : गीतकार
ललकार : गीतकार
कुलवंत जानी
🎂14जुलाई
⚰️31 मार्च 2018 
कुछ ⚰️30 सितंबर 2004 को हुई बताते है जिस में विवाद है।

Saturday, March 29, 2025

शरदिंदु बंदोपाध्याय

#22sep #30march 
शरदिंदु बंदोपाध्याय 
🎂30 मार्च 1899, 
जौनपुर 
⚰️ 22 सितंबर 1970 
(उम्र 71 वर्ष), पुणे 
माता-पिता: ताराभूषण बंद्योपाध्याय, बिजलीप्रभा बंद्योपाध्याय भाषा: बंगाली उल्लेखनीय कार्य: ब्योमकेश बख्शी
शरदिंदु बंदोपाध्याय शरदिंदु बंदोपाध्याय (30 मार्च 1899 - 22 सितंबर 1970) एक भारतीय बंगाली भाषा के लेखक थे। वे बंगाली सिनेमा के साथ-साथ बॉलीवुड से भी सक्रिय रूप से जुड़े रहे। बंगाली जासूस ब्योमकेश बख्शी के निर्माता, शरदिंदु ने कई तरह की कहानियों की रचना की, जिनमें उपन्यास, लघु कथाएँ, अपराध और जासूसी कहानियाँ, नाटक और पटकथाएँ शामिल हैं। उन्होंने कलेर मंदिरा, गौरमोलर (शुरुआत में मौरी नोदिर तीरे नाम से), तुमी संध्यार मेघ, तुंगभद्र तीरे, चुया-चंदन, मारू ओ संघा (बाद में त्रिशाग्नि नाम से एक हिंदी फिल्म बनी), सदाशिब सीरीज़ और बड़ौदा के आवर्ती चरित्र के साथ अप्राकृतिक कहानियाँ जैसी ऐतिहासिक कहानियाँ लिखीं।  इसके अलावा, उन्होंने कई गीत और कविताएँ लिखीं।  संकलित शरदिंदु बंद्योपाध्याय ने बंगाली में कई कहानियाँ लिखी हैं। उन्होंने कई पात्रों की कल्पना भी की है जैसे ब्योमकेश बक्शी, एक जासूस, बोरोदा, एक भूत-प्रेत का पीछा करने वाला और सदाशिव, एक काल्पनिक चरित्र और अन्य। रूपांतरण - 
▪️ पाँच सदाशिव कहानियों का अंग्रेजी में अनुवाद श्रीजता गुप्ता ने 'बैंड ऑफ़ सोल्जर्स: ए ईयर ऑन द रोड विद शिवाजी' पुस्तक में किया है। 
▪️ सदाशिव को 1980 के दशक में आनंदमेला के लिए कॉमिक्स के रूप में रूपांतरित किया गया था, जिसे नीरेंद्रनाथ चक्रवर्ती ने संपादित किया था, बिमल दास ने चित्रित किया था और तरुण मजूमदार ने रूपांतरित किया था।
 ▪️ आकाशवाणी द्वारा रेडियो नाटक।  ▪️98.3 रेडियो मिर्ची (कोलकाता) की संडे सस्पेंस सीरीज़ ने सभी सदाशिव कहानियों को रूपांतरित किया, जिसमें आरजे सोमक को नायक के रूप में चित्रित किया गया।

शरदिंदु बंद्योपाध्याय का जन्म 30 मार्च 1899 को अविभाजित भारत के संयुक्त प्रांत आगरा और अवध के जौनपुर में अपने नाना-नानी के घर ताराभूषण और बिजलीप्रभा बंद्योपाध्याय के घर हुआ था। बंद्योपाध्याय परिवार का निवास पूर्णिया में था, जो अब बिहार में है, जहाँ उनके पिता काम करते थे, लेकिन परिवार मूल रूप से भारत के पश्चिम बंगाल के उत्तरी कोलकाता के बारानगर से था। उन्होंने 1915 में बिहार के मुंगेर के एक स्कूल से मैट्रिक की पढ़ाई पूरी की। उन्होंने अपनी पहली कहानी 'प्रेतपुरी', एक बोरोदा कहानी लिखी, जब वे केवल 15 वर्ष के थे। मैट्रिक के बाद, उन्होंने विद्यासागर कॉलेज, कोलकाता में दाखिला लिया। बंगाली मंच के दिग्गज शिशिर भादुड़ी वहाँ उनके अंग्रेजी के प्रोफेसर थे।  स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद, वे पटना में कानून की पढ़ाई करने चले गए। वह केवल तीस वर्ष के थे, जब उन्होंने अपनी प्रैक्टिस छोड़ दी और एक लेखक के रूप में काम करना शुरू कर दिया। 1928 में, हिमांशु रॉय ने उन्हें पटकथा लिखने के लिए बॉम्बे आमंत्रित किया। 1952 तक उन्होंने फ़िल्में लिखीं और फिर एक लेखक के रूप में अपना पूरा करियर बनाने के लिए पुणे में बस गए। शरदिंदु बंद्योपाध्याय का निधन 22 सितंबर 1970 को पुणे, महाराष्ट्र में हुआ था। 
🎬 उनकी रचनाओं पर आधारित फ़िल्में शरदिंदु बंद्योपाध्याय ने कई कहानियाँ लिखी हैं। उनकी कहानियों पर कई बंगाली फ़िल्में बनी हैं। इसके अलावा, उनकी कहानियों पर कुछ हिंदी फ़िल्में भी बनी हैं। 

▪️त्रिशाग्नि (1988) नबेंदु घोष द्वारा निर्देशित एक फ़िल्म है, जो शरदिंदु की ऐतिहासिक लघु कहानी मोरू ओ संघो पर आधारित है। 
▪️डिटेक्टिव ब्योमकेश बख्शी (2015) दिबाकर बनर्जी द्वारा निर्देशित।  मुख्य भूमिका सुशांत सिंह राजपूत ने निभाई है और फिल्म 1942 में सेट है।

🎬 शरदिंदु बंद्योपाध्याय (हिंदी) की फिल्मोग्राफी -
1938 भाभी बॉम्बे टॉकीज के लिए फ्रांज ओस्टेन द्वारा निर्देशित, शरदिंदु बंद्योपाध्याय की कहानी के साथ। लघु कहानी "बिशेर धोन" पर आधारित।
वचन बॉम्बे टॉकीज के लिए फ्रांज ओस्टेन द्वारा निर्देशित।
1939 दुर्गा, कंगन और नवजीवन
1940 आज़ाद, पुनर्मिलन

📺 टेलीविज़न -
ब्योमकेश बख्शी (टीवी सीरीज़) (1993, 1997): डीडी नेशनल के लिए बासु चटर्जी द्वारा निर्देशित ब्योमकेश बख्शी पर आधारित एक हिंदी टीवी सीरीज़। इस सीरीज़ में ब्योमकेश बख्शी के रूप में राजित कपूर, अजीत बंद्योपाध्याय के रूप में के.के. रैना और सत्यवती के रूप में सुकन्या कुलकर्णी हैं। इस सीरीज़ के दो सीज़न थे।  पहला सीज़न 1993 में और दूसरा सीज़न 1997 में प्रसारित हुआ।

देवी शर्मा(मृत्यु)

देवी शर्मा 🎂19 अक्टूबर 1921⚰️ 30 मार्च 2010
भारतीय सिनेमा के कम चर्चित फिल्म निर्माता देवी शर्मा को उनकी जयंती पर याद करते हुए: एक श्रद्धांजलि 

 देवी शर्मा (19 अक्टूबर 1921 - 30 मार्च 2010) एक भारतीय फिल्म लेखक, निर्माता और निर्देशक थे। शर्मा ने जनता चित्रा के तहत कई भारतीय फिल्मों का निर्माण और निर्देशन किया। उन्होंने खुद पटकथाएँ और संवाद भी लिखे। वे उद्योग की चमक-दमक और सिल्वर स्क्रीन पर जीवंत किए गए रचनात्मक कामों की ओर आकर्षित थे। 
देवी शर्मा का जन्म 19 अक्टूबर 1921 को उत्तर प्रदेश के मेरठ में हुआ था। उनका विवाह लिली शर्मा से हुआ था। उनके तीन बच्चे हैं, बेटे मूसा और हारून, एक बेटी रोहाना। वे एक सिद्धांतवादी व्यक्ति थे, जो मानते थे कि व्यक्ति को हमेशा दूसरों को कुछ देकर जीवन जीना चाहिए और उन्होंने अपने बच्चों और अपने अनुयायियों के लिए उदाहरण स्थापित करके नेतृत्व किया। वे देवी दुर्गा के भक्त थे और उन्होंने अपने गृहनगर मेरठ में दुर्गा देवी गोल मंदिर बनवाया था।  उनके पास घोड़े थे और उनके घर में कुत्ते, पक्षी और मछलियाँ जैसे कई पालतू जानवर थे।

देवी शर्मा ने "बसरे की हूर (1956)" में एक अभिनेता के रूप में अपनी शुरुआत की और वर्ष 1958 में "टैक्सी स्टैंड" फिल्म में एक कहानी और पटकथा लेखक के रूप में, चंद्रशेखर और अनीता गुहा मुख्य भूमिका में थे। वे 1960 के दशक में सक्रिय थे और उन्होंने नाचे नागिन बाजे बीन" (1960), किंग कांग (1960), कौव्वाली की रात (1964), गंगा की लहरें (1964) और गुनाहों का देवता (1967) जैसी फिल्मों में लेखक, निर्माता या निर्देशक जैसी विभिन्न क्षमताओं में काम किया।

देवी शर्मा ने फिल्म उद्योग में कई नए लोगों के लिए अवसर पैदा किए जैसे दारा सिंह, संगीत निर्देशक श्यामजी घनश्यामजी और विशाल आनंद और कई अन्य। उन्होंने किशोर कुमार, धर्मेंद्र, जीतेंद्र, राजश्री, राधा सलूजा जैसे कई सितारों के साथ काम किया और देव आनंद के चचेरे भाई विशाल आनंद को फिल्म "हमारा अधिकार" में मौका दिया।  उनका सबसे मशहूर गाना फिल्म 'गंगा की लहरें' का है "जय जय है जगदम्बे माता..." जिसे आज भी कई मौकों और त्यौहारों पर, खास तौर पर नवरात्रि के दौरान भजन के तौर पर गाया जाता है। सुरेश सरवैया द्वारा संकलित

एक मौके पर, जीतेन्द्र ने स्वीकार किया कि "गुनाहों का देवता" (1967) में देवी शर्मा के साथ काम करने के बाद उन्हें प्रसिद्धि मिली। शर्मा ने उन्हें डांस मास्टर और कोरियोग्राफर हीरालाल के मार्गदर्शन में नृत्य की शिक्षा दी। जीतेन्द्र की क्षमताओं में शर्मा का विश्वास ही था जिसने उन्हें और अधिक प्रयास करने के लिए प्रेरित किया।

वर्ष 1977 में, नवीन निश्चल, राकेश रोशन और रक्षा अभिनीत एक फिल्म "आज का मजनू" निर्माणाधीन थी, लेकिन वित्तीय मुद्दों के कारण निर्माण रद्द कर दिया गया।

देवी शर्मा का 30 मार्च 2010 को 90 वर्ष की आयु में निधन हो गया और उनके परिवार में उनकी पत्नी लिली शर्मा, बेटे मूसा और हारून और बेटी रोहाना हैं।  मूसा उनके सबसे बड़े बेटे हैं जिन्हें मोशे (हिब्रू नाम) के नाम से भी जाना जाता है, उनके चार बच्चे हैं जो इज़राइल में रहते हैं, जबकि वह अमेरिका में रहते हैं।

🎥 देवी शर्मा की फ़िल्मोग्राफी -
1956 बसरे की हूर: अभिनेता
1958 टैक्सी स्टैंड: कहानी, पटकथा लेखक और निर्माता
1959 काली टोपी लाल रुमाल: कहानी, पटकथा लेखक और
निर्माता
1960 नाचे नागिन बाजे बीन: कहानी, पटकथा लेखक और
निर्माता
1962 किंग कांग: निर्माता
1963 कौवाली की रात: पटकथा लेखक और निर्माता
1965 गंगा की लहरें: कहानी, पटकथा लेखक, निर्माता
और निर्देशक
1968 गुनाहों का देवता: कहानी, संवाद लेखक,
निर्माता और निर्देशक
1972 हमारा अधिकार: निर्देशक
1974 गाल गुलाबी नैन शराबी: निर्माता और निर्देशक
1977 में नवीन निश्चल, राकेश रोशन और रक्षा अभिनीत फिल्म आज का मजनू का निर्माण चल रहा था , लेकिन वित्तीय मुद्दों के कारण निर्माण रद्द कर दिया गया। देवी शर्मा ने धर्मेंद्र जीतेंद्र जैसे कई सितारों के साथ काम किया और देव आनंद के चचेरे भाई विशाल आनंद को फिल्म " हमारा अधिकार " में मौका दिया । उनका सबसे प्रसिद्ध गीत फिल्म (गंगा की लहरें ,जय जय है जगदम्बे माता)से है जिसे आज भी कई अवसरों और त्योहारों पर भजन के रूप में गाया जाता है।

बबू मान

#29march 
तेजिंदर सिंह मान
🎂29 मार्च 1975 
खांट मानपुर , पंजाब , भारत
शैलियां
लोक , भांगड़ा , पॉप, ग़ज़ल
व्यवसाय
गायकगीतकारसंगीत निर्देशकअभिनेतानिर्मातापटकथा लेखक
सक्रिय वर्ष
1997-वर्तमान
लेबल
कैट्रैक, टी-सीरीज़ , पॉइंट ज़ीरो, इरोज़ इंटरनेशनल , स्वैग म्यूज़िक, स्पीड रिकॉर्ड्स, ज़ी म्यूज़िक कंपनी , सोनी म्यूज़िक
मान का जन्म तेजिंदर मान के रूप में 29 मार्च 1975 को पंजाब के फतेहगढ़ साहिब जिले के खांट मानपुर गाँव में हुआ था।
वह एक भारतीय गायक-गीतकार, संगीत निर्देशक, अभिनेता और फिल्म निर्माता हैं।  उनका अधिकांश कलात्मक कार्य पंजाबी संगीत और फिल्मों पर केंद्रित है । उन्हें पंजाबी संगीत के सबसे बड़े कलाकारों में से एक माना जाता है।
मान का मुख्य लक्षित दर्शक वर्ग दुनिया भर की पंजाबी भाषी आबादी है। 1999 से, उन्होंने आठ स्टूडियो एल्बम और छह संकलन एल्बम जारी किए हैं; पंजाबी फिल्मों के लिए पटकथाएँ लिखी हैं, उनमें अभिनय किया है और उनका निर्माण किया है; और क्षेत्रीय और बॉलीवुड फिल्म साउंडट्रैक में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। मान पंजाब में स्थित एक गैर-लाभकारी संगठन वन होप, वन चांस के राजदूत हैं । 

संगीत
बब्बू मान ने अपना पहला एल्बम सज्जन रुमाल दे गया 1997 में रिकॉर्ड किया  लेकिन अपने बाद के एल्बमों में ज़्यादातर गानों को संशोधित करके फिर से रिलीज़ किया। मान का पहला आधिकारिक डेब्यू एल्बम तू मेरी मिस इंडिया 1999 में रिलीज़ हुआ था।

2001 में, बब्बू मान ने अपना तीसरा एल्बम सौन दी झड़ी रिलीज़ किया , जिसमें चैन चनानी , रात गुज़रलाई , दिल ता पागल है , इश्क , कब्ज़ा और टच वुड जैसे गाने शामिल हैं , और 2003 में, उन्होंने अपनी पहली फ़िल्म साउंडट्रैक हवाएं के लिए लिखा और गाया, जहाँ उन्होंने भारतीय पार्श्व गायक सुखविंदर सिंह और जसपिंदर नरूला के साथ काम किया । मान ने 2004 में अपना चौथा एल्बम ओही चन्न ओही रातां रिलीज़ किया, उसके बाद 2005 में प्यास , जो उस समय का सबसे अधिक बिकने वाला पंजाबी एल्बम था। 2007 में, मान ने अपना पहला हिंदी एल्बम मेरा ग़म जारी किया , और 2009 में, उनका पहला धार्मिक एल्बम सिंह बेटर दैन किंग । बाद के एक गीत, बाबा नानक 2010 में उन्होंने ब्रिट एशिया टीवी म्यूज़िक अवार्ड्स में "सर्वश्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय कलाकार" का पुरस्कार जीता । 

04 जुलाई 2013 को, मान ने आठ साल बाद अपना पहला पंजाबी व्यावसायिक एल्बम तलाश: इन सर्च ऑफ़ सोल रिलीज़ किया। एल्बम ने बिलबोर्ड द्वारा वर्ल्ड एल्बम चार्ट में शीर्ष 10 में प्रवेश किया । 2015में, इतिहास नाम का एल्बम रिलीज़ किया गया और 2018 में इक सी पागल रिलीज़ किया गया।

हवाओं के अलावा , बब्बू मान ने पंजाबी फिल्मों वाघा और दिल तैनु करदा ए प्यार के साथ-साथ बॉलीवुड प्रोडक्शन वादा रहा , क्रूक , साहेब, बीवी और गैंगस्टर , टीटू एमबीए और 31 अक्टूबर के लिए भी गाने गाए हैं ।

बब्बू मान ने एशिया, ऑस्ट्रेलिया , यूरोप, उत्तरी अमेरिका और मध्य पूर्व में शो किए हैं। 2014 में, मान चार विश्व संगीत पुरस्कारों के विजेता थे: विश्व के सर्वश्रेष्ठ भारतीय पुरुष कलाकार, विश्व के सर्वश्रेष्ठ भारतीय लाइव एक्ट, विश्व के सर्वश्रेष्ठ भारतीय मनोरंजनकर्ता और तलाश: इन सर्च ऑफ़ सोल के लिए विश्व के सर्वश्रेष्ठ भारतीय एल्बम।

मान ने 2017 में दो बार डैफ बामा म्यूजिक अवार्ड जर्मनी भी जीता ।

🎥फिल्में🎥

2003 खेल - कोई साधारण खेल नहीं
2003 हवाएं
2006 रब्ब ने बनाईयां जोडियां
2007 वागाह
2008 हशर : एक प्रेम कहानी
2009 वादा रहा 
2010 एकम - मिट्टी का पुत्र
2010 क्रूक 
2011 साहेब, बीवी और गैंगस्टर
2011 हीरो हिटलर प्यार में
2012 देसी रोमियो
2012 दिल तैनू करदा है प्यार
2014 बाज़
2016 31 अक्टूबर
2018 बंजारा पंजाबी
2022 सुच्चा सूरमा

Friday, March 28, 2025

धूमल (जनम)

धूमल 🎂29 मार्च 1914 ⚰️13 फरवरी 1987

भारतीय सिनेमा के लोकप्रिय अभिनेता, हास्य अभिनेता धूमल को उनकी पुण्यतिथि पर याद करते हुए

अनंत बलवंत धूमल जो
 धूमल के नाम से जाने जाते थे, वे बॉलीवुड फिल्मों में चरित्र भूमिका निभाने के लिए जाने जाते थे। उन्होंने कई हिंदी, मराठी फिल्मों में अभिनय किया और 1940 के दशक के मध्य से 1980 के दशक के अंत तक सक्रिय रहे। उन्होंने मराठी थिएटर से अपने अभिनय करियर की शुरुआत की, जिसने मराठी सिनेमा के लिए मार्ग प्रशस्त किया और बाद में वे हिंदी सिनेमा में चले गए जहाँ उन्होंने ज्यादातर हास्य भूमिकाएँ निभाईं और बाद में अपने करियर में चरित्र भूमिकाएँ निभाईं। उन्होंने हावड़ा ब्रिज (1958), बॉम्बे का बाबू (1960), कश्मीर की कली (1964), गुमनाम (1965), दो बदन (1966), लव इन टोक्यो (1966) और बेनाम (1974) जैसी उल्लेखनीय फिल्मों में काम किया।  

धूमल का जन्म अनंत बलवंत धूमल के रूप में 29 मार्च 1914 को बड़ौदा रियासत, अविभाजित भारत, जिसे अब गुजरात राज्य में वडोदरा के नाम से जाना जाता है, में हुआ था। जब वे मात्र 10 वर्ष के थे, तब उनके पिता की मृत्यु हो गई और उन्हें अपनी मां और छोटे भाई के भरण-पोषण की जिम्मेदारी उठानी पड़ी, दिन में सड़कों पर भीख मांगना और शाम को चाय और पकौड़े बेचना। बाद में उन्होंने एक ड्रामा कंपनी में नौकरी कर ली, जहाँ वे कलाकारों के लिए पेय पदार्थ परोसते, बर्तन धोते और काम निपटाते थे। अभिनय में उनका करियर तब शुरू हुआ जब वे एक ड्रामा कंपनी में शामिल हुए, जहाँ वे पेय पदार्थ परोसते और बर्तन धोते थे। ऐसे कई मौके आते थे जब छोटे-मोटे किरदार निभाने वाले कलाकार नहीं आ पाते थे; इससे स्पॉट बॉय को उनकी जगह लेने का मौका मिल जाता था। इस तरह धूमल को नाटकों में छोटी-मोटी भूमिकाएँ मिलीं।

इस दौरान उनकी मुलाकात पी.के. अत्रे और नानासाहेब फाटक से हुई, जो नाटक जगत के दोनों बड़े नाम थे।  जल्द ही उन्हें पहचान मिलने लगी और उन्हें बड़ी भूमिकाएँ मिलने लगीं। हालाँकि वे अंततः फ़िल्मों में एक हास्य अभिनेता के रूप में प्रसिद्ध हुए, लेकिन वे खलनायक के रूप में अधिक प्रसिद्ध थे। उन्होंने लगना ची बेदी और घर बाहर जैसे प्रसिद्ध नाटकों में प्रमुख भूमिकाएँ निभाईं। 

मंच से, उन्होंने अपना ध्यान सिल्वर स्क्रीन पर केंद्रित किया। उन्होंने वो कौन थी, आँखें, गुमनाम, आरज़ू और ससुराल जैसी बड़ी फ़िल्मों में काम किया। उनकी पहली फ़िल्म "पेडगाँचे शहाणे" (1952) नामक एक मराठी फ़िल्म थी जिसमें उन्होंने एक दक्षिण भारतीय की भूमिका निभाई थी।

धूमल ने साथी हास्य कलाकारों महमूद और शोभा खोटे के साथ कई हिंदी फ़िल्मों में काम किया, जैसे ससुराल (1961)।

धूमल का 13 फ़रवरी 1987 को मुंबई में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया।

 ◆🎥◆चयनित फिल्मोग्राफी -
 1986 प्यार का मंदिर: धैर्यवान
 1984 बिजली सेतु: पार्वती का भाई
           दुनिया : पास्कल
           माटी मांगे खून: शारदा के पिता
 1983 बिंदिया चमकेगी: दौलतराम
 1982 बड़े दिल वाला: बनवारीलाल
 1981 दिल ही दिल में रामधन (श्री वर्मा की) 
           नौकर)
           जेल यात्रा : सिपाही समुद्र तट पर
           सन्नाटा 
           दासी : मंगला की मौसी
 1980 शीतला माता : मुनीम राम भरोसे
 1979 गीत गाता चल 
           जनता हवलदार 
           खानदान: होने वाले दूल्हे का चाचा
 1978 मान अपमान: माखन के चाचा
           अंजाम : तोताराम
           बेशरम : मुखिया
           कर्मयोगी : काकरम
 1977 देवता 
           चलता  पुर्जा : कांस्टेबल बालचंदर
           ड्रीम गर्ल : दुकान का मैनेजर 
           साहेब बहादुर : चरनदास
 1976 पलकों की छाँव में 
           कबीला : लालाजी
           उधर का सिन्दूर : सुंदर के पिता
           भंवर : चौधरी फुलियाराम
 1975 आराम हराम आहे!   : जग्गे
 1974 सन्यासी: दीनू - घर का नौकर
 1973 बेनाम: पुलिस कांस्टेबल हवलदार
 1972 जुगनू: शीला के पिता
           बाजीगर 
           दो चोर : टीकमदास
           दो गज ज़मीन के नीचे 
 1971 हार जीत 
           जवान मुहब्बत : छोटेलाल
           नया जमाना : धरमदास जमींदार
           वो दिन याद करो 
           हंगामा: बनस्पति प्रसाद
           प्रीतम: गौरी के पिता
           जाने अंजाने : धोंडू
1970 अलबेला 
           समाज को बदल डालो 
           तुम हसीन मैं जवान : गणपतराव
 1969 कब?  क्यों?  और कहाँ?  : स्टीवर्ट
           बालक : धर्मराज
           प्रार्थना 
           प्यार ही प्यार : जटाधारी
           प्यासी शाम : डिसूजा
           सचाई : छात्रावास वार्डन
           तुमसे अच्छा कौन है: शीला के पिता
 1968 एक श्रीमान एक श्रीमती : महाराज
           आंखें : स्टूडियो मालिक
           ब्रह्मचारी: कीर्तनदास (टैक्सी ड्राइवर)
           मेरा नाम जोहार : 007/चरण दास
           पायल की झंकार: वैदराज
           सरस्वतीचन्द्र : गाड़ी में यात्री 
           सुहाग रात : परवाना
 1967 तीन बहुरानियाँ: राधा के पिता
           अनिता : रोशनधन
           चंदन का पालना : गोपी
 1966 वो कोई और होगा 
           देवर: राम भरोसे/आर.बी. बोसाय
           दो बदन: मोहन के पिता
           मेरा साया : बांकेजी
           प्रीत ना जेन रीत:  रोज़ी के पिता
 1965 टोक्यो में प्यार: शीला के पिता
           आरज़ू : मुंशी अशदाऊलाल 
           बहू बेटी: नेमक दास
           चांद और सूरज: नंद गोपाल
           मेरे सनम : बांके
           रिश्ते नाहते : दीवानजी
 1964 गुमनाम: मिस्टर धरमदास
           आवारा बादल :बबलू
           कश्मीर की कली : भोलाराम
           वो कौन थी?   : माधव
            जिद्दी : रामदास
 1963 जिंदगी: चमेली के पिता
           अकेला 
           हमराही : हुकुमचंद
           बम्बई में छुट्टियाँ : हनुमान प्रसाद
           प्यार का बंधन : लाला
 1962 आज और कल: धनकसिंह के सचिव
           अनपढ़ : कालू
           बिजली चमके जमना पार 
           एक मुसाफिर एक हसीना : उल्टाराम
           रंगोली : बलबद्रदास 
           साहिब बीबी और गुलाम : बंसी
 1961 बॉय फ्रेंड: संपत
           मेम दीदी : सेठजी
           ससुराल : धरमदास
 1960 शोला और शबनम: मुंशीजी
           बम्बई का बाबू : मामू
           एक फूल चार कांटे : अंकल
           दोस्त  
 1959 छोटी बहन : सुखिया
           मैं नशे में हूं : मुंशी 
           तोताराम 
 1958 उजाला:  भोलू
           जासूस : चौधरी
           हावड़ा ब्रिज: अंकल जो
           खोटा पैसा 
           फागुन : मट्टू
           पुलिस 
           सोने की चिड़िया : फिल्म निर्माता
 1957 नाइट क्लब 
           अप्राधि कौन?  : गूंगा-बहरा नौकर
           एक गाँव की कहानी : बांसी
 1956 सुवर्णा सुन्दरी 
           एक शोला: पेड्रो
           नई दिल्ली : कुमार स्वामी
           परिवार 
 1954 जागृति: दर्शकों में आदमी
 1953 चाचा चौधरी

Thursday, March 27, 2025

गणेश राम प्रसाद शर्मा (मृत्यु)

गणेश रामप्रसाद शर्मा🎂14 जनवरी 1945⚰️28 मार्च 2000
भारतीय सिनेमा के कम चर्चित संगीतकार गणेश को उनकी जयंती पर याद करते हुए: एक श्रद्धांजलि 

बॉलीवुड संगीत के स्वर्णिम युग में 1950 से 1980 तक कई महान संगीत निर्देशकों ने अपनी बेहतरीन रचनाओं से बॉलीवुड फिल्मों को समृद्ध किया। एक तरफ उनमें से कई ने दशकों तक बहुत लंबी सफल पारी खेली। दुर्भाग्य से दूसरी तरफ कुछ कम चर्चित संगीत निर्देशक भी थे जिन्हें उतना मौका या अवसर नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। जो भी हो, उन्हें जो थोड़े बहुत मौके मिले, उन्होंने हमें ऐसे गाने दिए जिन्हें सुनकर हम दंग रह गए कि ऐसे संगीत निर्देशकों को और मौके क्यों नहीं दिए गए, गणेश उनमें से एक थे।

 गणेश रामप्रसाद शर्मा, जिन्हें गणेश के नाम से जाना जाता है (14 जनवरी 1945 - 28 मार्च 2000) एक संगीतकार थे। वे प्रसिद्ध और प्रख्यात संगीत निर्देशक लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के प्यारेलाल के छोटे भाई थे।  गणेश ने वर्ष 1964 में लक्ष्मीकांत प्यारेलाल की जोड़ी के सहायक के रूप में फिल्म उद्योग में अपने संगीत जीवन की शुरुआत की। संगीत निर्देशक गणेश मधुर संगीत के उस्ताद थे। हिंदी फिल्म उद्योग ने उन्हें ज़्यादा मौक़ा नहीं दिया, अन्यथा यह स्पष्ट है कि उनके द्वारा रचित गीत मधुर और हिट रहे। उन्होंने कुल 16 हिंदी फ़िल्मों में संगीत दिया, जिसमें उन्होंने 87 गीतों के लिए संगीत तैयार किया। 
गणेश प्रसिद्ध तुरही वादक पंडित रामप्रसाद शर्मा के पुत्र थे, जिन्हें बाबाजी के नाम से जाना जाता था, जिन्होंने गणेश को संगीत की मूल बातें सिखाईं। गणेश प्यारेलाल (एलपी के), नरेश शर्मा, गोरख शर्मा, आनंद शर्मा और महेश शर्मा के भाई हैं।

स्वतंत्र संगीत निर्देशक के रूप में गणेश की पहली फ़िल्म “ठाकुर जरनैल सिंह” (1966) थी, जिसमें दारा सिंह, हेलेन और मुमताज़ ने अभिनय किया था। हालाँकि यह सी ग्रेड की फ़िल्म थी, लेकिन गणेश का संगीत ए ग्रेड का था।

 एक बेहद प्रतिभाशाली और प्रतिभाशाली संगीतकार आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन वास्तव में गणेश हिंदी फिल्म संगीत के एक गुमनाम नायक थे।  उनकी धुनें "शरारत", "चालक", "ठाकुर जरनैल सिंह," "एक नन्हीं मुन्नी लड़की थी" और 60 के दशक की कई फिल्मों के गाने "हम तेरे बिन जी ना पाएंगे...", "दिल ने प्यार जिया है एक बेवफा से...", "बिछुआ ने डंक मारा...", "जाम से पीना बुरा है...", "मन गए ये तराना..." आज भी सबसे लोकप्रिय गाने हैं।

 गणेश रामप्रसाद शर्मा की 28 मार्च 2000 को दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गई। वह 58 वर्ष के थे और उनके परिवार में पत्नी और दो बच्चे, एक बेटा और एक बेटी वीणा हैं।

 🎬फिल्मोग्राफी संगीत गणेश द्वारा -
 1987 दोज़ख़ गणेश शर्मा के रूप में
 1976 बदनाम 
 1973 धमकी, चालाक और एक नारी दो रूप 
 1972 शरारत, कुन्दन और सा रे गा मा पा,
           रुत रंगीली आई
 1971 कहीं आर कहीं पार 
 1970 एक नन्हीं मुन्नी लड़की थी 
 1968 अंजाम 
 1967 सब का उस्ताद और तस्कर 
 1966 ठाकुर जरनैल सिंह, हुस्न और इश्क और
           शेरा डाकू 

 🎧गणेश द्वारा रचित चयनित गीत 
 ● चांद क्या है रूप का दर्पण... धमकी (1973) 
    आशा भोंसले, किशोर कुमार, गीत असद द्वारा 
    भोपाली
 ● दिल का सुना साज़ तराना ढूंढेगा, मुझको मेरे 
    बाद जमाना  ढूंढ़ेगा... एक नारी दो रूप (1973) 
    मोहम्मद द्वारा  रफी
 ● कल रात सपने में आये थे तुम मेरे मेहबूब... 
    आशा भोंसले, मोहम्मद रफ़ी द्वारा शरारत (1972)।
 ● एक नन्ही मुन्नी लड़की थी... एक नन्ही मुन्नी लड़की थी 
    थी (1970) मोहम्मद द्वारा।  रफी
 ● मैं जो गले लग जाऊंगी...अंजाम (1968) आशा द्वारा 
    भोसले
 ● आशा द्वारा दिल का नज़राना ले ले... चालाक (1973)। 
    भोसले, किशोर कुमार
 ● दिल का लगाना इस दुनिया में... स्मगलर (1967) द्वारा 
    लता मंगेशकर
 ● ऐ मेरे दिल तेरी मंजिल अभी आने वाली है... 
    हुस्न और इश्क़ (1966) मुकेश द्वारा
 ● हम तेरे बिन जी ना पाएंगे सनम...ठाकुर 
    आशा भोंसले द्वारा जरनैल सिंह (1966)।
 ● ऐ दिलरुबा कल की बात कल के साथ गई... अंजाम 
    (1968) मुकेश, सुमन कल्याणपुर द्वारा
 ● बांका सिपाही आया मेरी गलियां...कुंदन (1972) 
    सुमन द्वारा  कल्याणपुर
 ● कैसे-कैसे काम किये... स्मगलर (1966) द्वारा 
    महेंद्र कपूर, आशा भोंसले
 ● नदी का किनारा मेंढक करे शोर... शरारत 
    (1972) मनहर उधास, मो.  रफ़ी, शमशाद 
    बेगम
 ● हम तो कोई भी नहीं... शरारत (1972) लता द्वारा 
    मंगेशकर
 ● दिल ने प्यार किया है एक बेवफा से... शरारत 
    (1972) मोहम्मद रफ़ी द्वारा
 ● तू प्यार मांगे प्यार दे दूं... सा रे गा मा पा 
    (1972) लता मंगेशकर द्वारा
 ● तुम ऐसे बेस मोर नैन...फिल्म (वर्ष) रट 
    रंगीली आई (1972) मोहम्मद द्वारा।  रफी
 ● दिल देके दर्द-ए-मोहब्बत...शेरा डाकू (1966) द्वारा 
    आशा भोसले
 ● मजा बरसात का चाहो तो... हुस्न और इश्क 
    (1966) आशा भोसले द्वारा
 ● दिल की फरियाद से दर... हुस्न और इश्क (1966) द्वारा 
    आशा भोसले
 ● ये जलते हुए लब... एक नन्हीं मुन्नी लड़की थी 
    (1970) आशा भोसले द्वारा
 ● हम ही जाने एक तोरे मनवा की पीर... एक नारी दो 
    रूप (1973) मोहम्मद द्वारा।  रफी
 ● यारो मुझे पाइन दो... धमकी (1973) आशा द्वारा 
    भोसले
 ● खामोशी जब हद से बढ़ी... दोज़ख (1987) द्वारा 
    सुरेश वाडकर, अनुराधा पौडवाल
 ● भैया फूल मैं फूलों की डाली...बदनाम (1976) 
    आशा भोसले द्वारा
 और भी कई यादगार गाने।

श्री नाथ त्रिपाठी (मृत्यु)

श्री नाथ त्रिपाठी🎂14 दिसंबर 1912⚰️28 मार्च 1988

 भारतीय सिनेमा के प्रतिभाशाली अभिनेता, निर्देशक, संगीतकार एस. एन. त्रिपाठी को उनकी जयंती पर याद करते हुए: एक श्रद्धांजलि 

 श्री नाथ त्रिपाठी, जिन्हें एस. एन. त्रिपाठी (14 दिसंबर 1912 - 28 मार्च 1988) के नाम से जाना जाता है, एक भारतीय संगीतकार थे, जो 1930 के दशक से 1980 के दशक तक सक्रिय रहे। एस. एन. त्रिपाठी के बहुमुखी कार्य में फ़िल्मों के संगीतकार, लेखक, अभिनेता निर्देशक शामिल थे। एक स्वतंत्र संगीतकार के रूप में उनकी पहली फ़िल्म "चंदन" (1942) थी। वे ब्रिटिश राज के अंत के दौरान फ़िल्मों के एक गीत में "जय हिंद" (भारत की जीत) का नारा इस्तेमाल करने वाले पहले संगीतकार थे। यह गीत फ़िल्म "मानसरोवर" (1946) का "जय हिंद, जय हिंद, जय हिंद, ये हिंद की कहानियाँ..." था।  उन्हें एक अभिनेता के रूप में लोकप्रियता तब मिली जब उन्होंने होमी वाडिया की हनुमान पाताल विजय (1951) और कई अन्य पौराणिक और धार्मिक फिल्मों में हनुमान की भूमिका निभानी शुरू की। 
एस. एन. त्रिपाठी ने 1957 में रानी रूपमती से निर्देशन की शुरुआत की। निरूपा रॉय और भारत भूषण के साथ उनकी दो फ़िल्में, रानी रूपमती (1959) और कवि कालिदास (1959) को सिनेमाई योग्यता और अविस्मरणीय संगीत के लिए उद्धृत किया जाता है।

एस. एन. त्रिपाठी का जन्म 14 दिसंबर 1912 को बनारस, रियासत, अविभाजित भारत, अब वाराणसी, भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश में हुआ था। उनके पिता दामोदर दत्त ठाकुर एक स्कूल के प्रिंसिपल थे। इलाहाबाद से बीएससी करने के बाद त्रिपाठी ने लखनऊ में पंडित वी. एन. भातखंडे के मॉरिस कॉलेज ऑफ़ म्यूज़िक से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा प्राप्त की।

1935 में त्रिपाठी बॉम्बे पहुँचे और बॉम्बे टॉकीज़ में संगीत निर्देशक सरस्वती देवी की सहायता करने वाले वायलिन वादक के रूप में काम किया।  संगीतकार के तौर पर उनकी पहली फ़िल्म चंदन (1942) थी। उन्होंने जनम जनम के फेरे (1957) जैसी फ़िल्मों के लिए संगीत रचना जारी रखी, जिसमें "ज़रा सामने तो आओ छलिए..." गीत बिनाका गीतमाला का शीर्ष गीत बन गया। शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में प्रशिक्षित त्रिपाठी ने रानी रूपमती, संगीत सम्राट तानसेन (1962) और अन्य फ़िल्मों के गीतों की लोकप्रियता का श्रेय शहनाई और मैंडोलिन जैसे संगीत वाद्ययंत्रों के साथ राजस्थानी लोकगीतों के मिश्रण को दिया है, जिसने कभी "संवेदनशीलता को ठेस नहीं पहुँचाई", फिर भी "धड़कन वाले नृत्य जैसी गुणवत्ता" थी। लाल किला (1960) फ़िल्म से "न किसी की आँख का नूर हूँ..." और "लगता नहीं है दिल मेरा..." जैसी उनकी "प्रयोगात्मक रचनाएँ" आज भी लोकप्रिय हैं।  राजू भारतन के अनुसार उस्ताद अमीर खान ने फिल्म संगीत रचनाकारों का उपहास करते हुए नौशाद, एस. एन. त्रिपाठी और वसंत देसाई तथा कुछ हद तक सी. रामचंद्र को उल्लेखनीय संगीतकार माना। उन्होंने कई पौराणिक और काल्पनिक फिल्मों के लिए संगीत दिया और उन्हें "पौराणिक संगीतकार" के रूप में टैग किया गया। 
एस. एन. त्रिपाठी को अभिनय में रुचि थी, उनकी पहली भूमिका फिल्म जीवन नैया (1936) में थी। उन्होंने उत्तरा अभिमन्यु (1946) में अभिनय किया, फिर होमी वाडिया निर्देशित राम भक्त हनुमान (1948) में हनुमान की भूमिका निभाई, जहाँ उन्होंने संगीत भी तैयार किया, अभिनेता के रूप में उनकी पहली प्रमुख भूमिका थी। उन्होंने होमी वाडिया की फिल्म हनुमान पाताल विजय (1951) सहित कई फिल्मों में हनुमान का किरदार निभाना जारी रखा। सुरेश सरवैया द्वारा संकलित

अभिनय और संगीत रचना के अलावा त्रिपाठी ने 1957 में फिल्मों का निर्देशन भी शुरू किया। उनका पहला निर्देशन उद्यम रानी रूपमती था जिसके लिए उन्होंने संगीत भी तैयार किया था।  1959 में, त्रिपाठी ने कवि कालिदास और पक्षीराज के साथ-साथ राम हनुमान युद्ध का भी निर्देशन किया।  उन्होंने बिदेसिया (1963) जैसी भोजपुरी फिल्मों का निर्देशन किया, जो बॉक्स-ऑफिस पर सफल रही।  उन्होंने 1976 तक फिल्मों का निर्देशन करना जारी रखा। उन्होंने निर्देशक के रूप में अपनी आखिरी फिल्म नाग चंपा का निर्देशन किया।

 एस.एन.त्रिपाठी का 28 मार्च 1988 को 75 वर्ष की आयु में मुंबई, महाराष्ट्र में निधन हो गया।

 🎷 संगीतकार के रूप में एस.एन.त्रिपाठी की फिल्मोग्राफी -
 1941 चंदन 
 1942 सेवा, दुनिया तुम्हारी है और 
           चूड़ियां 
 1943 पनघट 
 1944 शरारत 
 1945 बचपन, रामायणी, जी हान और अधर 
 1946 उत्तरा अभिमन्यु और मानसरोवर 
 1948 श्री राम भक्त हनुमान
1949 वीर घटोत्कच 
 1950 सौदामिनी और श्री गणेश महिमा 
 1951 लक्ष्मी नारायण एवं 
           हनुमान पाताल विजय 
 1952 अलादीन और जादूई चिराग 
 1953 नव दुर्गा 
 1954 तिलोत्तमा, दुर्गा पूजा एवं
           अलीबाबा और 40 चोर 
 1955 इनाम, रत्न मंजरी और
           चिराग-ए-चीन 
 1956 रूप कुमारी, पन्ना, सती नाग कन्या 
           राज रानी मीरा, हातिम ताई 
           दिल्ली दरबार और बजरंग बली 
 1957 रानी रूपमती, राम हनुमान युद्ध 
           परिस्तान, खुदा का बंदा और
           जनम जनम के फेरे 
 1959 भक्त प्रल्हाद, पक्षीराज,
           कवि कालिदास और जग्गा डाकू 
 1960 सिंहल द्वीप की सुंदरी, लाल किला
           चंद्रमुखी और दो आदमी 
 1961 पिया  मिलन की आस, राम लीला,
           जय चितोड़, जादू नगरी एवं 
           अमृत ​​मंथन 
 1962 शिव पार्वती, शेर खान,
           संगीत सम्राट तानसेन 
           नाग देवता, माया जाल और
           बिजली चमके जमना पार 
 1963 परीक्षा, देव कन्या, ज़िंगारो,
           कोबरा गर्ल और बिदेसिया  
 1964 महासती अनुसूया 
 1966 शंकर खान 
 1967 लव-कुश 
 1968 नादिर शाह, लहू पुकारेगा और
           हर हर गंगे 
 1971 श्री कृष्ण लीला 
 1972 महाशिवरात्रि 
 1973 बाल महाभारत 
 1974 सुभद्रा हरण 
 1975 श्री राम हनुमान युद्ध 
 1976 नाग चंपा 
 1977 जय अम्बे माँ 
 1978 जय गणेश 
 1981 सती सावित्री 
 1985 महासती तुलसी 
 1987 108 तीर्थयात्रा 

 🎬 एस.एन.त्रिपाठी अभिनेता के रूप में -
 1936 जीवन नैया 
 1946 उत्तरा अभिमन्यु 
 1947 वो जमाना 
 1948 राम भक्त हनुमान और
           जय हनुमान 
 1949 वीर घटोत्कच 
 1951 जय महाकाली 
 1952 भक्त पुराण एवं
           अलादीन और जादूई चिराग 
 1954 अलीबाबा और 40 चोर 
 1955 भागवत महिमा 
 1956 दिल्ली दरबार 
 1957 जनम जनम के फेरे 
 1959 कवि कालिदास 
 1961 पिया मिलन की आस 
 1963 बिदेसिया 
 1967 लव-कुश 
 1970 दीदार 
 1972 महाशिवरात्रि 
 1973 विष्णु पुराण और बनारसी बाबू  
 1975 पोंगा पंडित 
 1976 नाग चंपा 
 1979 हर हर गंगे 
 1981 महाबली हनुमान 
 1984 पान खाए साइयां हमार 
 1987 108 तीर्थयात्रा 

 🎬 एस.एन.त्रिपाठी निर्देशक के रूप में 
 1957 रानी रूपमती और
           राम हनुमान युद्ध 
 1959 पक्षीराज एवं कवि कालिदास 
 1961 पिया मिलन की आस और अमृत मंथन 1962 शिव पार्वती और 
           संगीत सम्राट तानसेन 
 1963 देव कन्या एवं बिदेसिया 
 1964 महासती अनुसूया 
 1965 महाराजा विक्रम 
 1966 कुंवारी 
 1967 लव-कुश 
 1968 नादिर शाह और लहू पुकारेगा 
 1969 सती सुलोचना
 1976 नाग चंपा (1976)  

🎧 संगीतकार एस. एन. त्रिपाठी के 5 सदाबहार गीत (पसंद के अनुसार सूची बढ़ाई जा सकती है)
● परवर दीगर-ए-आलम...' हातिमताई (1956) मोहम्मद रफी द्वारा गाया गया। अख्तर रोमानी द्वारा लिखित,
●  जरा सामने तो आओ छलिए...' जनम जनम के
फेरे (1957)। मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर द्वारा गाया गया और भरत व्यास द्वारा लिखा गया। यह गीत 1957 में लोकप्रिय रेडियो काउंटडाउन शो बिनाका गीतमाला में चार्ट के शीर्ष पर पहुंचा। 
 ● आ लौट के आजा मेरे मीत...' रानी रूपमती (1959)। इस गाने का पुरुष और महिला संस्करण क्रमशः मुकेश और लता मंगेशकर ने गाया था। भरत व्यास द्वारा लिखित। 
 ● श्याम भाई घनश्‍याम न आये...' कवि कालिदास 
     (1959)।  लता जी ने इस गाने को बहुत ही खूबसूरती से प्रस्तुत किया है 
     मंगेशकर और भरत व्यास द्वारा लिखित। 
 ● ना किसी की आंख का नूर हूं...' लाल किला (1960)। 
     मोहम्मद रफ़ी द्वारा गाया गया और भरत व्यास द्वारा लिखित।

Wednesday, March 26, 2025

प्रिय राजवंश (मृत्यु)



प्रिया राज वंश🎂30 दिसंबर 1936⚰️27 मार्च 2000
वेरा सुंदर सिंह
30 दिसंबर 1936, शिमला
मृत्यु की जगह और तारीख: 27 मार्च 2000, जुहू, मुम्बई
भांजा या भतीजा: सोहेल रेखी
भाई: कमल जीत, पदमजित सिंह
माता-पिता: सुंदर सिंह
🎂30 दिसंबर 1936
शिमला , पंजाब प्रांत , ब्रिटिश भारत
(अब शिमला , हिमाचल प्रदेश , भारत )
मृत
⚰️27 मार्च 2000 (आयु 63 वर्ष)
मुंबई , महाराष्ट्र , भारत

पेशा अभिनेत्री

साथी चेतन आनंद
प्रिया राजवंश का जन्म शिमला में वीरा सुंदर सिंह के रूप में हुआ था । उनके पिता सुंदर सिंह वन विभाग में संरक्षक थे। वह अपने भाइयों कमलजीत सिंह (गुलु) और पदमजीत सिंह के साथ शिमला में पली-बढ़ीं। उन्होंने ऑकलैंड हाउस , जहां वह स्कूल कैप्टन थीं, और कॉन्वेंट ऑफ जीसस एंड मैरी, शिमला में पढ़ाई की । उन्होंने 1953 में सेंट बेडे कॉलेज, शिमला से इंटरमीडिएट पास किया और भार्गव म्यूनिसिपल कॉलेज (बीएमसी) में शामिल हो गईं, इस अवधि के दौरान, उन्होंने शिमला के प्रसिद्ध गेयटी थिएटर में कई अंग्रेजी नाटकों में अभिनय किया ।

उनके पिता संयुक्त राष्ट्र के एक कार्य पर थे, इसलिए स्नातक स्तर की पढ़ाई के बाद वह लंदन , यूके में रॉयल एकेडमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट ( आरएडीए ) में शामिल हो गईं।
जब वह लंदन में थीं और 22 साल की थीं, तब लंदन के एक फोटोग्राफर द्वारा ली गई उनकी एक तस्वीर किसी तरह हिंदी फिल्म उद्योग तक पहुंच गई । उस समय के एक फिल्म निर्माता, ठाकुर रणवीर सिंह, जो कोटा के एक राजपूत परिवार से थे, को उनके बारे में पता चला। सिंह ने यूल ब्रायनर और उर्सुला एंड्रेस अभिनीत लोकप्रिय ब्रिटिश और हॉलीवुड फिल्में लिखी और बनाई थीं और वह पीटर ओ'टूल और रिचर्ड बर्टन से परिचित थे। रणवीर सिंह ने लोकप्रिय अभिनेता रणजीत को जिंदगी की राहें (जीवन की सड़कें) नामक फिल्म में अपना पहला प्रस्ताव भी दिया था , जिसे वह बनाना चाहते थे।
इसके बाद, रणवीर सिंह उन्हें 1962 में चेतन आनंद ( देव आनंद और विजय आनंद के भाई) से मिलवाने लाए और उन्होंने उन्हें अपनी एक फिल्म हकीकत (1964) में कास्ट किया। यह फिल्म हिट हुई और अक्सर इसे सर्वश्रेष्ठ भारतीय युद्ध-फिल्मों में गिना जाता है। जल्द ही वह अपने गुरु चेतन आनंद के साथ रिश्ते में थीं, जो हाल ही में अपनी पत्नी से अलग हुए थे। प्रिया चेतन से कई साल छोटी थी. इसके बाद, उन्होंने केवल चेतन आनंद की फिल्मों में अभिनय किया, जिसमें वह कहानी से लेकर स्क्रिप्टिंग, गीत और पोस्ट-प्रोडक्शन तक हर पहलू में शामिल थीं। चेतन ने भी कभी भी उनके मुख्य किरदार के बिना कोई फिल्म नहीं बनाई। अत्यधिक प्रतिभाशाली अभिनेत्री होने के बावजूद, उनका अंग्रेजी उच्चारण और पश्चिमी स्त्रीत्व भारतीय दर्शकों को पसंद नहीं आया।

उनकी अगली फिल्म, हीर रांझा 1970 में आई, जिसमें उन्होंने उस समय के लोकप्रिय अभिनेता राज कुमार के साथ अभिनय किया और फिल्म हिट रही। इसके बाद 1973 में 'हंसते ज़ख्म' आई , जो यकीनन उनके करियर की सबसे बेहतरीन फिल्म थी। उनकी अन्य प्रसिद्ध फ़िल्में राज कुमार के साथ हिंदुस्तान की कसम (1973) और राजेश खन्ना के साथ कुदरत (1981) थीं , जहाँ उनकी समानांतर भूमिका थी। हेमा मालिनी मुख्य भूमिका में हैं। उन्होंने 1977 में साहेब बहादुर में देव आनंद के साथ अभिनय किया। उनकी आखिरी फिल्म हाथों की लकीरें 1985 में रिलीज हुई थी, जिसके बाद उन्होंने अपना फिल्मी करियर खत्म कर दिया।
प्रिया राजवंश और चेतन आनंद के बीच व्यक्तिगत संबंध थे और वे एक साथ रहते थे, हालांकि उन्होंने पहले कालूमल एस्टेट में अपना फ्लैट रखा और बाद में मंगल किरण में एक बड़ा घर रखा। उनके दो भाई, कमलजीत सिंह (गुलु) और पदमजीत सिंह, क्रमशः लंदन और अमेरिका में रहते हैं, और उनका पैतृक घर चंडीगढ़ में है। 

1997 में चेतन आनंद की मृत्यु के बाद, उन्हें उनकी पहली शादी से जन्मे बेटों के साथ उनकी संपत्ति का एक हिस्सा विरासत में मिला। 27 मार्च 2000 को भारत के मुंबई के जुहू में चेतन आनंद के रुइया पार्क बंगले में उनकी हत्या कर दी गई थी । पुलिस ने चेतन आनंद के बेटों केतन आनंद और विवेक आनंद के साथ-साथ उनके कर्मचारियों माला चौधरी और अशोक चिन्नास्वामी पर उनकी हत्या का आरोप लगाया। उनका मकसद चेतन आनंद की संपत्ति पर अपना अधिकार जताना माना गया। राजवंश के हस्तलिखित नोट्स और उनके द्वारा विजय आनंद को संबोधित एक पत्र अभियोजन पक्ष द्वारा सबूत के रूप में अदालत में पेश किया गया था।पत्र और नोट्स राजवंश की रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु से पहले की अवधि के दौरान उसके डर और चिंता पर प्रकाश डालते हैं।

जुलाई 2002 में चारों आरोपियों को दोषी ठहराया गया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई लेकिन उन्हें नवंबर 2002 में जमानत दे दी गई। 2011 में, बॉम्बे हाई कोर्ट दायर अपीलों पर सुनवाई करने के लिए सहमत हो गया। ट्रायल कोर्ट के आदेश के खिलाफ आरोपी युगल द्वारा।
प्रिया राजवंश और चेतन आनंद के बीच व्यक्तिगत संबंध थे और वे एक साथ रहते थे, हालांकि उन्होंने पहले कालूमल एस्टेट में अपना फ्लैट रखा और बाद में मंगल किरण में एक बड़ा घर रखा। उनके दो भाई, कमलजीत सिंह (गुलु) और पदमजीत सिंह, क्रमशः लंदन और अमेरिका में रहते हैं, और उनका पैतृक घर चंडीगढ़ में है। 

1997 में चेतन आनंद की मृत्यु के बाद, उन्हें उनकी पहली शादी से जन्मे बेटों के साथ उनकी संपत्ति का एक हिस्सा विरासत में मिला। 
हिंदी सिनेमा में वैसे तो कई ऐसी अभिनेत्रियां हैं, जिनकी मौत काफी दुखद ढंग से हुई हैं। इस लिस्ट में दिव्या भारती, परवीन बाबी के अलावा अभिनेत्री प्रिया राजवंश का नाम भी शामिल जय है। प्रिया राजवंश ने हकीकत, हीर रांझा, हिंदुस्तान की कसम जैसी फिल्मों में काम किया है। प्रिया राजवंश की जिंदगी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं थी। प्रिया के फिल्मी करियर की शुरुआत जहां बेहद शानदार हुई थी, वहीं उनका अंत बेहद खौफनाक हुआ था। 27 मार्च 2000 को प्रिया की हत्या कर दी गई थी। 
27 मार्च 2000 को भारत के मुंबई के जुहू में चेतन आनंद के रुइया पार्क बंगले में उनकी हत्या कर दी गई थी । पुलिस ने चेतन आनंद के बेटों केतन आनंद और विवेक आनंद के साथ-साथ उनके कर्मचारियों माला चौधरी और अशोक चिन्नास्वामी पर उनकी हत्या का आरोप लगाया।उनका मकसद चेतन आनंद की संपत्ति पर अपना अधिकार जताना माना गया। राजवंश के हस्तलिखित नोट्स और उनके द्वारा विजय आनंद को संबोधित एक पत्र अभियोजन पक्ष द्वारा सबूत के रूप में अदालत में पेश किया गया था।पत्र और नोट्स राजवंश की रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु से पहले की अवधि के दौरान उसके डर और चिंता पर प्रकाश डालते हैं।

जुलाई 2002 में चारों आरोपियों को दोषी ठहराया गया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई  लेकिन उन्हें नवंबर 2002 में जमानत दे दी गई।2011 में, बॉम्बे हाई कोर्ट दायर अपीलों पर सुनवाई करने के लिए सहमत हो गया। ट्रायल कोर्ट के आदेश के खिलाफ आरोपी युगल द्वारा। काफी बाते सामने भी आई 

, पर यह पता नहीं चला कि आखिर हत्या किसने की थी?

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1986 हाथों की लकीरें 
1981 कुदरत
1977 साहेब बहादुर 
1973 हंसते ज़ख़्म 
1973 हिंदुस्तान की कसम 
1970 हीर रांझा 
1964 Haqeeqat

मीना कुमारी (मृत्यु)

मीना कुमारी 🎂जन्म 01 अगस्त, 1932 ⚰️मृत्यु 31 मार्च, 1972 मीना कुमारी महजबीं बानो प्रसिद्ध नाम मीना कुमारी 🎂जन्म 01 अगस्त, 1932 जन्म भूमि म...